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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (9)

इन्द्रायाहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः |
अण्वीभिस्तना पूतासः ||4||
ऋग्वेद 1|3|4||

पदार्थ -
(दूसरा अर्थ) - जो सूर्य्य अपने गुणों से सब पदार्थों को प्राप्त होता है, वह अपनी किरणों से संसार में विस्तृत उसके निमित्त से जीनेवाले पवित्र संसार के पदार्थ हैं, वही इन उनको प्रकाशयुक्त करता है ||4||

भावार्थ -
यहां श्लेषालङ्कार समझना | जो जो इस मन्त्र में परमेश्वर और सूर्य्य के गुण और कर्म प्रकाशित किये गये हैं, इनसे परमार्थ और व्यवहार की सिद्धि के लिए अच्छी प्रकार उपयोग लेना सब मनुष्यों को योग्य है ||4||

इन्द्रायाहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः | सुते दधिष्व नश्चनः ||6||
ऋग्वेद 1|3|6||

पदार्थ -
जो वेगादिगुणयुक्त शीघ्र चलनेवाला भौतिक वायु है, वह प्रत्यक्ष उत्पन्न वाणी के व्यवहार में हमारे लिये वेद के स्त्रोतों को अच्छी प्रकार प्राप्त करता है, तथा वह हम लोगों के अन्नादि व्यवहार को धारण करता है ||6||

भावार्थः -
जो शरीरस्थ प्राण है वह सब क्रिया का निमित्त होकर खाना पीना पकाना ग्रहण करना और त्यागना आदि क्रियाओं से कर्म का कराने तथा शरीर में रुधिर आदि धातुओं के विभागों को जगह जगह में पहुंचाने वाला है, क्योंकि वही शरीर आदि की पुष्टि और नाश‌ का हेतु है ||6||

ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत |
दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ||7||
ऋग्वेद 1|3|7||

पदार्थ -
जो अपने गुणों से संसार के जीवों की रक्षा करने, ज्ञान से परिपूर्ण, विद्या और उपदेश में प्रीति रखने, विज्ञान से तृप्त, यथार्थ निश्चययुक्त, शुभ गुणों को देने और सब विद्याओं को सुनाने, परमेश्वर के जानने के लिये पुरुषार्थी, श्रेष्ठ विद्या के गुणों की इच्छा से दुष्ट गुणों के नाश करने, अत्यन्त ज्ञानवान् सत्य उपदेश से मनुष्यों के सुख के धारण करने और कराने, अपने शुभ गुणों से सब को निर्भय करनेहारे सब विद्वान लोग हैं, वे सज्जन मनुष्यों के सामने सोम आदि पदार्थ और विज्ञान का प्रकाश नित्य करते रहें ||7||

भावार्थः -
ईश्वर विद्वानों को आज्ञा देता है कि - तुम लोग एक जगह पाठशाला में अथवा इधर उधर देशदेशान्तरों में भ्रमते हुए अज्ञानी पुरुषों को विद्यारूपी ज्ञान देके विद्वान करो, कि जिससे सब मनुष्य लोग विद्या धर्म और श्रेष्ठ शिक्षायुक्त होके अच्छे अच्छे कर्मों से युक्त होकर सदा सुखी रहैं ||7||

विश्वे देवासो प्तुप्तुरः सुतमागंत तूर्णयः | उस्त्रा इव स्वसराणि ||8||
ऋग्वेद 1|3|8||

पदार्थ -
हे मनुष्यों को शरीर और विद्या आदि का बल देने और उस विद्या आदि के प्रकाश के करने में शीघ्रता करनेवाले सब विद्वान लोगो ! जैसे दिन को प्रकाश करने के लिये सूर्य्य की किरण आती जाती है, वैसे ही तुम भी मनुष्यों के समीप कर्म उपासना और ज्ञान को प्रकाश करने के लिये नित्य आया जाया करो |

भावार्थः -
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | ईश्वर ने जो आज्ञा दी है इसको सब विद्वान निश्चय करके जान लेवें कि विद्या आदि शुभ गुणों के प्रकाश करने में किसी को कभी थोड़ा भी विलम्ब वा आलस्य करना योग्य नहीं है | जैसे दिन की निकासी में सूर्य्य सब मूर्त्तिमान पदार्थों का प्रकाश करता है, वैसे ही विद्वान लोगों को भी विद्या के विषयों का प्रकाश सदा करना चाहिये ||8||

महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना |
धियो विश्वा वि राजति ||12||
ऋग्वेद 1|3|12||

पदार्थ -
जो वाणी शुभ कर्म अथवा श्रेष्ठ बुद्धि से अगाध शब्दरूपी समुद्र को जनानेवाली है, वही मनुष्यों की सब बुद्धियों को विशेष करके प्रकाश करती है ||12||

भावार्थः -
इस मन्त्र में वाचकोपमेयलुप्तोपमालङ्कार दिखलाया है | जैसे वायु से तरङ्गयुक्त और सूर्य्य से प्रकाशित समुद्र अपने रत्न और तरङ्गों से युक्त होने के कारण बहुत उत्तम व्यवहार और रत्नादि की प्राप्ति से बड़ा भारी माना जाता है, वैसे ही जो आकाश और वेद का अनेक विद्यादि गुणवाला शब्दरूपी महासागर [उस] को प्रकाश करानेवाली वेदवाणी और विद्वानों का उपदेश है, वही साधारण मनुष्यों की यथार्थ बुद्धि को बढ़ानेवाला होता है ||12||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (9)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA