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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) चतुर्थःखण्डः से (3)

(गतांक से आगे)

तद्ध‌‌ तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स व एतदेवं वेदाSभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ||6||

अर्थ :-

(तत्) वह ब्रह्म (ह) निश्चय से सबको (तद्वनं) वन्दनीय = उपास्य होने से (तद्वनं) तद्वन नाम से (प्रसिद्ध हैं) | (इति) और (उपासितव्यं) उपासना करने योग्य है | (स, यः) सो जो कोई (एतत्) इस ब्रह्म को (एवम्) इसी प्रकार (वेद) जानता है (एनम्) उसकी (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणी (अभिसंवाञ्छन्ति) चाहना करते हैं |

व्याख्या

जो कोई ईश्वर को वन्दनीय और उपासनीय समझकर उसकी वन्दना और उपासना करता है , उसकी सब प्राणी क्यों चाहना करते हैं, यह प्रश्न है, जिसका उत्तर ही, इस उपनिषद् वाक्य की व्याख्या होगी | वह उपासक उपासक नहीं समझा जा सकता, जिसका हृदय प्रेम से लचकीला न हो चुका हो | प्रेम से भरपूर हृदय में प्राणीमात्र की मंगल कामना के सिवा, दूसरा भाव नहीं आ सकता | फिर भला जिस व्यक्ति में प्राणी मात्र के लिए प्रेम और मंगलकामना के सिवा और कुछ न हो, कैसे सम्भव है कि, उसकी चाहना सब न करें ? कहा जाता है कि एक बार बुद्ध ने देखा कि एक राजा सहमे हुए हरिण को खदेड़े जा रहा था और इच्छा कर रहा था कि तीक्ष्ण वाण से उसका काम तमाम करदे | बुद्ध दुख से पीड़ित होकर राजा के पास गया और बड़ी नम्रता और विनय से बोला कि राजा यह तीर तू मेरे मार दे, परन्तु निरपराध हरिण को न मार | राजा का हृदय बुद्ध के इस प्रेम को देखकर पिघल गया और उसने हरिण को छोड़ दिया, बुद्ध के इस प्रेम का हजारों वर्ष बीतने पर भी करोड़ों हृदयों पर राज्य है परन्तु नैपोलियन, नैलसन, कैसर और किचनर का प्रकाश, अभी से धीमा पड़ने लगा है |

नोट - एक एक बात हमेशा के लिए समझ लेनी चाहिए कि उपनिषद् में जहाँ कहीं इस प्रकार का प्रयोग हो 'स य एतदेव वेद' अर्थात् सो जो कोई इस ब्रह्म को ऐसा जानता है, तो इस जानने के अन्तर्गत तदनुकुल आचरण भी सम्मिलित हुआ करता है | केवल जानने (ज्ञान) अथवा केवल करने (कर्म) का उपनिषद् की शिक्षा में कोई स्थान नहीं है | केवल ज्ञान अथवा केवल कर्म का सेवन करने के लिए उपनिषद् ने खुले तौर से कह दिया है कि वे (अन्धन्तमः प्रविशन्ति - इशोपनिषद् मन्त्र 9) अन्धकार में पड़ते हैं |

उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद् |
ब्राह्मीं बाव त उपनिषदमब्रूमेति ||7||

अर्थ :-

शिष्य ने कहा था कि (भोः) हे आचार्य .. (उपनिषदं) ब्रह्मविद्या को (ब्रूहि, इति) (मेरे लिए) कहिये (आचार्य कहता है कि) (ते) तेरे लिये (उपनिषद्) ब्रह्मविद्या (उक्ता) कही गई (वाव) निश्चय (ते) तेरे लिये (ब्राह्मीम् उपनिषदम्) ब्रह्मविद्या सम्बन्धी उपनिषद् (अब्रूम) कह दी गई |

तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः |
सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ||8||

अर्थ :-

(तस्यै) आ (ब्रह्मविद्या की प्राप्ति) के लिये (तपः) तप. (दमः) इन्द्रिय निग्रह (कर्म) और निष्काम कर्म (इति) साधन हैं, (वेदा सर्वाङ्गानि) जो वेद और उनके सम्पूर्ण अंगों में (प्रतिष्ठाः) प्रतिष्ठित है और जिअनका (आयतनम्) आधार (सत्यम्) सत्य है

यो वा एतामेवं वेदाSपहत्य पाप्मानमन‌न्ते |
स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ||9||

इति चतुर्थः खण्डः ||

अर्थ :-

(यः) जो कोई (वै) निश्चय से (एताम्) इस ब्रह्मविद्या को (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है, (वह) (पापमानत्य) पापों को (अपहयत्य) दूर कर (अनन्ते) अनन्त (ज्येये) श्रेष्ठ (स्वर्गे, लोके) आनन्दमय पद में (प्रतितिष्ठति) प्रतिष्ठत होता है |

व्याख्या

उपर्युक्त 3 वाक्यों में से पहला वाक्य स्पष्ट है | दूसरे वाक्य में, उपनिषद् के पहले वाक्य में जिस ब्रह्मविद्या के कह दिए जाने की बात कही गई है, उसी (ब्रह्मविद्या) के साधन बतलाये गये हैं | वे साधन 3 हैं - (1) तप (2) दम (3) कर्म | इन साधनों को बतला देने का अभिप्राय यह है कि, इन साधनत्रय पर आचरण करने ही से कोई ब्रह्मविद्या को प्राप्त कर सकता है | इनमें से (1) तप* कठोरताओं के सहन करने का नाम है | योगदर्शन में कहा गया है कि तप से अशुद्धियों का क्षय और अशुद्धि-क्षय से देह और इन्द्रियों की सिद्धी होती है |

(क्रमशः)