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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अपने पुरुषार्थ से कच्चों में परिपक्वता डाल

ओउम् | तव क्रत्वा तव तद्दंसनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीधः |
और्णोर्दुर उस्रियाभ्यो वि द्द‌ळदोहदूर्वाद् गा असृजो अङ्गिरस्वान् ||

ऋग्वेद 6|17|6||

तू, तव......................तू अपने
क्रत्वा.......................बुद्धि से , कर्म से, पुरुषार्थ से तथा
तव.........................अपने
दंसनाभिः...................दृष्टान्तों से
आमासु.....................कच्चों में
शच्या.......................बुद्धिपूर्वक
तत्.........................प्रसिद्ध
पक्वम्......................सर्वथा परिपक्वता
नि-दीधः.....................डाल |
उस्रियाभ्यः..................किरणों के लिए अथवा किरणों पर
दृढ़ा दुरः....................दृढ़ प्रतिबन्धकों को
वि+और्णोः.................खोल दे, दूर कर दे और
अङ्गिरस्वाऩ्..............ज्ञानवान होकर
उर्वात्.......................हिंसावृत्ति से
गाः..........................इन्द्रियों को
उत्+असृजः................मुक्त कर |

व्याख्या

किसी को कोई उपदेश देना है | वाणी की अपेक्षा क्रिया द्वारा दिया वह उपदेश अधिक प्रभावशाली होता है | गुरु अपरिपक्व मति, कच्चे विचारवाले शिष्यों में परिपक्वता लाना चाहता है, य‌ह कथनमात्र से नहीं आएगी, करके समझानी होगी - तव क्रत्वा तव तद्दंसनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीधः = अपने कर्म तथा दृष्टान्तों से बुद्धिपूर्वक कच्चों में प्रसिद्ध परिपक्वता डाल | परिपक्वता लाने वाले कर्म्म स्वयं भी करते रहना चाहिए | उनको देखकर शिष्य को उत्साह मिलेगा | अपने उत्कर्ष की सिद्धि के साधन भी बनाते रहना चाहिए |

एक बात का विचार करना आवश्यक है , वह यह कि कच्चों को परिपक्व करते हुए उनके सामर्थ्य और योग्यता की परीक्षा कर लेनी चाहिए | दूसरे की योग्यता की परीक्षा के लिए बुद्धि चाहिए, अतः वेद कहता है - शच्या निदीधः बुद्धि से परिपक्वता डालनी चाहिए | आग अधिक हो तो जल जाता है | कम हो तो क्च्चा रह जाता है | यह ज्ञान से निर्णय करना होगा कि किसमें कितनी आँच दी जाए | कच्चे पात्र तक जाने के लिए तपानेवाली किरणों के मार्ग में प्रबल बाधाएँ हैं, अतः वेद आदेश करता है - और्णोर्दुर उस्रियाभ्यो वि दृढ़ा = किरणों पर से प्रबल, कठोर प्रतिबन्धकों=द्वारों को खोल दो | जन्मजन्मान्तरों के संस्कार मनुष्य को सत्यज्ञान प्राप्त नहीं करने देते | आलस्य, प्रमाद, सुखलिप्सा आदि अनेक विघ्न हैं जिनसे ज्ञानप्रकाश होने में बाधा रहती है | उन सबको हटाये बिना ज्ञानकिरण रुकी रहेगी | मनुष्यों के सभी दोषों में हिंसा प्रधान दोष है | वेद इनसे इन्द्रियों को बचाना चाहता हुआ कहता है - उर्वाद् गा असृजो अंगिरस्वान् = ज्ञानवान् होकर हिंसावृत्ति से इन्द्रियों को मुक्त करना है | अङ्गिरस्वान् का अर्थ है - प्राणवान | प्राण को वश करके इन्द्रियों को हिंसा से बचाना चाहिए|

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)