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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्रभो आ

ओउम् |
अग्ने आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये|
नि होता सत्सि बर्हिषि ||
सामवेद(पूर्वाचिक‌)1.1.1

श्ब्दार्थ:

हे अग्ने = उन्नतिसाधक प्रभो
वीतये = प्रकाष के लिए

हव्यदातये = भोग शुद्धि के लिए
गृणान: = उपदेश करता हुआ
आयाहि = सब और से आ
होता = दाता होकर
बर्हिषि = हमारे ह्रृदय आसन पर
नि+ सत्सि = नितरा = बैठता है |

हे अग्ने उन्नतिसाधक प्रभो ! प्रकाष के लिए तथा भोग शुद्धि के लिए उपदेश करता हुआ तूं सब और से आ | दाता होकर तूं हमारे ह्रृदय आसन पर नितरा बैठता है |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)