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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदनित्यत्व‌विषयः (2)

गतांक से आगे -

प्र. - जब सब जगत के परमाणु अलग अलग होके कारणरूप हो जाते हैं तब जो कार्यरूप सब स्थूल जगत् है उसका अभाव हो जाता है, उस समय वेदों के पुस्तकों का भी अभाव हो जाता है, फिर वेदों को नित्य क्यों मानते हो ?

उ. - यह बात पुस्तक, पत्र, मसी और अक्षरों की बनावट आदि पक्ष में घटती है, तथा हम लोगों के क्रिया पक्ष में भी बन सकती है, वेदपक्ष में नहीं घटती, क्योंकि वेद तो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध-स्वरूप ही हैं, मसी, कागज, पत्र, पुस्तक और अक्षरों की बनावटरूप नहीं हैं | यह जो मसी आदि द्रव्य और लेखनादि क्रिया है सो मनुष्यों की बनाई है, इससे यह अनित्य है | और ईश्वर के ज्ञान में सदा बने रहने से वेदों को हम लोग नित्य मानते हैं | इससे क्या सिद्ध हुआ कि पढ़ना पढ़ाना और पुस्तक के अनित्य होने से वेद अनित्य नहीं हो सकते, क्योंकि वे बीजाङ्कुर न्याय से ईश्वर के ज्ञान में नित्य वर्त्तमान रहते हैं |सृष्टि की आदि में ईश्वर से वेदों की प्रसिद्धि होती है और प्रलय में जगत के नहीं रहने से उनकी अप्रसिद्धी होती है, इस कारण से वेद नित्यस्वरूप ही बने रहते हैं |

जैसे इस कल्प की सृष्टि में शब्द, अक्षर, अर्थ और सम्बन्ध वेदों में हैं इसी प्रकार से पूर्व कल्प में थे और आगे भी होंगे, क्योंकि जो ईश्वर की विद्या है सो नित्य एक ही रस बनी रहती है | उनके एक अक्षर का भी विपरीत भाव कभी नहीं होता | सो ऋग्वेद से लेके चारों वेदों की संहिता अब जिस प्रकार की हैं कि इनमें शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, पद और अक्षरों का जिस क्रम से वर्त्तमान है इसी प्रकार का क्रम सब‌ दिन बना रहता है , क्योंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है, उसकी वृद्धि, क्षय और विपरीतता कभी नहीं होती | इस कारण से वेदों को नित्यस्वरूप ही मानना चाहिए |
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इसी प्रकार वैशेषिक शास्त्र में कणाद मुनि ने भी कहा है - .. वेद ईश्वरोक्त हैं, इनमें सत्यविद्या और पक्षपात रहित धर्म का ही प्रतिपादन है, इससे चारों वेद नित्य हैं | ऐसा ही सब मनुष्यों को मानना उचित है क्योंकि ईश्वर नित्य है | इससे उसकी विद्या भी नित्य है |
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इस विषय में योगदर्शन के कर्त्ता पतञ्जलि मुनि भी वेदों को नित्य मानते हैं, (स एष.) जो कि प्राचीन अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा और ब्रह्मादि पुरुष सृष्टि की आदि में उत्पन्न हुए थे, उनसे लेके हम लोग पर्यन्त और हमसे आगे जो होने वाले हैं, इन सबका गुरु परमेश्वर ही है, क्योंकि वेद द्वारा सत्य अर्थों का उपदेश करने से परमेश्वर का नाम गुरु है | सो ईश्वर नित्य ही है, क्योंकि ईश्वर में क्षणादि काल की गति का प्रचार ही नहीं है, और वह अविद्या आदि क्लेशों से और पापकर्म तथा उनकी वासनाओं के भोगों से अलग है | जिसमें अनन्त ज्ञान एकरस बना रहता है, उसी के रचे वेदों का भी सत्यार्थपना और नित्यपना भी निश्चित है, ऐसा ही सब मनुष्यों को जानना चाहिए |

(क्रमशः)

महर्षि दयानन्द सरस्वती
(महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत् ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षेप में उद्दृत्)
From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's RIGVED-ADI-BHASHYA-BHUMIKA