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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महान सौभाग्य के लिए बल लगा

ओउम् | अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु |
सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभितिष्ठा महाँसि ||

ऋग्वेद 5|28|3||

शब्दार्थ ..
हे अग्ने.................हे नेतः !
महते...................महान्
सौभगाय...............सौभाग्य के लिए
शर्ध.....................बल लगा
तव.....................तेरी
द्युम्नानि................कीर्तियाँ
उत्तमानि................उत्तम
सन्तु...................हों |
जास्पत्यम्.............पति-पत्नि के व्यवहार को
सम्.....................भली प्रकार
सुयमम्.................सुनियन्त्रित, सुसंयत, उत्तम संयमयुक्त
आ+कृणुष्व.............कर और
शत्रूयताम्...............शत्रुता करनेवालों के
महांसि..................बलों को , तेजों को
अभि+तिष्ठ.............दबा दे, अपने अधिकार में कर ले |

व्याख्या -
मनुष्य जितने भी कार्य्य करता है, सबमें थोड़ा बहुत बल अवष्य लगाना पड़ता है | वेद कहता है जब बल लगाना ही है तो - अग्ने शर्ध महते सौभगाय = हे ज्ञानी ! तू महान सौभाग्य के लिए बल लगा | वेद में एक अन्य स्थान पर कहा है - उच्छ्रयस्व महते सौभगाय (ऋग्वेद 3|8|2) = महान सौभाग्य के लिए उठ, अथवा उन्नति का आश्रय‌ ले | अपने से किसी बड़े का सहारा लेने लगो, तो किसी महान् आदर्श के लिए लो | जब तू महान् आदर्श को लेकर बल लगाएगा तो -‍ तव द्युम्नानि उत्तमानि सन्तु = तेरी कीर्त्तियाँ उत्तम होंगी | सौभाग्यशाली की कीर्त्ति अवश्य ही सुकीर्त्ति होती है | सौभाग्य प्राप्ति में एक बड़ी भारी बाधा है, और वह बहुधा मनुष्य को च्युत कर देती है | वह है विलास | विलास और विनाश का सहवास है | विलास को बुलाओ, विनाश बिन बुलाये आ जाएगा | विलास से सब प्रकार का नाश होता है , रूपनाश, सम्पत्तिनाश, कान्तिनाश, कीर्त्तिनाश आदि | अतः वेद सावधान करता हुआ कहता है - सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व = दाम्पत्य व्यवहार को सुनियन्त्रित रख | विवाह का उद्देष्य सामने रख | विवाह का एकमात्र उद्देष्य सन्तान है | भोग तो उस उद्देष्य का एक साधन है | यदि उद्देष्य पूरा न हो, तो साधन दूषित माना जाता है | वेद कह रहा है - दाम्पत्य को दूषित मत करो | मत समझो विवाह ने तुम्हें भोग का पट्टा दे दिया है, वरन् एक पुनीत, समाज-वर्द्धक कार्य्य के लिए तुमको दम्पती बनाया गया है |

सचमुच विवाह के सम्बन्ध में ऐसी पवित्र भावना तथा संयम का उपदेश वेद के समान अन्यत्र कहीं नहीं है | गृहस्थ भी एक छोटा-मोटा राज्य होता है, इसमेँ अनेक विघ्न-बाधाएँ आती रहत्ती हैं | भगवान का उपदेश है , इससे उदास मत हो, वरन् उठ और - शत्रूयतामभितिष्ठा महाँसि = शत्रुओं के तेज को दबा दे | उनके तेज तेरे सामने फीके पड़ जाएँ | जो विलासी है वह दूसरों के तेज का अभिभव क्या करेगा ? संयमी के तेज की जो ज्वाला होती है वह चक्रवर्तियों को भी चकित कर देती है, अतः संयमी बनकर शत्रुओं को दबा |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)