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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) चतुर्थःखण्डः से (4)

.....उपर्युक्त 3 वाक्यों में से पहला वाक्य स्पष्ट है | दूसरे वाक्य में, उपनिषद् के पहले वाक्य में जिस ब्रह्मविद्या के कह दिए जाने की बात कही गई है, उसी (ब्रह्मविद्या) के साधन बतलाये गये हैं | वे साधन 3 हैं - (1) तप (2) दम (3) कर्म | इन साधनों को बतला देने का अभिप्राय यह है कि, इन साधनत्रय पर आचरण करने ही से कोई ब्रह्मविद्या को प्राप्त कर सकता है | इनमें से (1) तप* कठोरताओं के सहन करने का नाम है | योगदर्शन में कहा गया है कि तप से अशुद्धियों का क्षय और अशुद्धि-क्षय से देह और इन्द्रियों की सिद्धी होती है |

(अब गतांक से आगे)

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तम व्यसः || (योग. 2|43)

एक उपनिषद् में कहा गया है : -

एतद्वै परमं तपो यदयाहितस्यप्यते |
एतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति |
एतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति ||
(बृहदारण्यकोपनिषद् 5|11|1)

अर्थात् रोग के कष्टों का सहना, प्रेत (मरे हुए की लाश) को शमशान में ले जाना, चिता में अग्नि लगाना ये महान तप हैं | योग दर्शन और उपनिषद् के इन वाक्यों से स्पष्ट है कि तप कठोरताओं के सहने, अशुद्धियों को दूर करके शरीर और इन्द्रियों पर अधिकार रखने तथा कठिन समयों पर जनता की सेवा करने का नाम है |

(2) दम - इन्द्रियों के निग्रह को कहते हैं | इन्द्रियों का ऐसा बना देना 'दम' है, जिससे वे कोई अनुचित काम न कर सकें |

(3) कर्म - ब्रह्मविद्या का साधक कर्म निष्काम कर्म है, जिस को गीता में कर्म योग कहा गया है | क्यों कर्म से निष्काम कर्म ही का तात्पर्य समझा जावे इसका कारण यह है कि सकाम कर्म से वासना की उत्पत्ति होती है | जिसको उपनिषदों में हृदय-ग्रन्थि** कहा गया है | इस वासना के चित्त पर बने रहने से मनुष्य आवागमन के चक्र से नहीं छूट सकता | परन्तु निष्काम कर्म से बन्धन में लाने वाली वह वासना पैदा नहीं होती | यही निष्काम कर्म की विशेषता है |

इन साधनों को बतलाते हुए, उपनिषत्कार ने उनका महत्व प्रकट करने के लिए, प्रकट किया है कि वे साधन वेद और वेदांगों में प्रतिष्ठित हैं | और वेद वेदांगों के लिए कहा है कि, उनका आयतन (आधार) सत्य है इस सत्य को आधार बतलाने का कारण यह है कि वेद और वेदांग चाहते हैं कि उनमें वर्णित (तप, दम, कर्म) सत्य पर निर्भर हों | यदि इन साधनों में सच्चाई न हो तो फिर वह साधन, केवल दिखावट की बात रह जाते हैं |नीति में एक जगह कहा गया है : -

इज्याSध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा |
अलोभ इति मार्गोSयं धर्मस्याष्टविधि: स्मृतः ||
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते |
उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ||

अर्थात यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, धृति और अलोभ यह आठ प्रकार का धर्म का मार्ग है | इनमें से प्रारम्भ के चार दम्भ के लिए भी प्रयुक्त होते हैं परन्तु अन्त के चार (दिखावट से शून्य) महात्माओं में ही होते हैं | अन्त के चार सत्य, धृति, क्षमा और अलोभ हैं | स्पष्ट है कि सदाचार दम्भ से शून्य हुआ करता है | इसलिये यदि ब्रह्मविद्या के साधन तप, दम और कर्म सत्य पर निर्भर हों तो फिर उनके भीतर दम्भ और दिखावट नहीं हो सकती | उनमें वास्तविक्ता (Reality) होगी और इस प्रकार वे ब्रह्मविद्या और ब्रह्म की प्राप्ति के असंदिग्ध साधन होंगे | यही भाव उपनिषद् के उपर्युक्त द्वितीय‌ वाक्य का है |

तीसरा और उपनिषद् का अन्तिम वाक्य फल-श्रुति के रूप में है | उसमें बताया गया है जो जिज्ञासु उपर्युक्त भांति ब्रह्मविद्या को जानकर उसकी प्राप्ति के साधनों को काम में लाते हैं, वे निष्पाप होकर चिरकाल तक प्राप्त रहने वाले स्वर्ग (ब्रह्म) लोक को प्राप्त कर लेते हैं |

इति चतुर्थः खण्डः ||
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* 'तप ऐश्वर्य' धातु से तप ऐश्वर्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ करता है |
** देखो कठोपनिषद् 6|15||