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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (10)

अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् |
मा नो अतिख्य आगहि ||3||
ऋग्वेद 1|4|3||

भावार्थ -

सब मनुष्य लोग इन धार्मिक श्रेष्ठ विद्वानों के समागम से शिक्षा और विद्या को प्राप्त होते हैं, तभी पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्य्यन्त पदार्थों के ज्ञान द्वारा नाना प्रकार से सुखी होके फिर से अन्तर्यामी ईश्वर के उपदेश को छोड़कर कभी इधर उधर नहीं भ्रमते ||3||

परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम् |
यस्ते सखिभ्य आ वरम् ||4||
ऋग्वेद 1|4|4||

भावार्थ -

सब मनुष्यों को यही योग्य है कि प्रथम सत्य का उपदेश करनेहारे वेद पढ़े हुए और परमेश्वर की उपासना करनेवाले विद्वानों को प्राप्त होकर अच्छी प्रकार उनके साथ प्रश्नोत्तर की रीति से अपनी सब शंका निवृत करें; किन्तु विद्याहीन मूर्ख मनुष्य का सङ्ग व उन‌के दिए हुए उत्तरों में विश्वास कभी न करें ||4||

उत ब्रवन्तु नो निदो निरयन्तश्चिदारत | दधाना इन्द्रइद्दुवः ||5||
ऋग्वेद 1|4|5||

भावार्थ -

सब मनुष्यों को उचित है कि आप्त धार्मिक विद्वानों का सङ्ग कर मूर्खों के सङ्ग को सर्वदा छोड़ के ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे सर्वत्र विद्या की वृद्धि, अविद्या की हानि, मानने योग्य श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार, दुष्टों को दण्ड, ईश्वर की उपासना आदि शुभ कर्मों की वृद्धि और अशुभ कर्मों का विनाश नित्य होता रहे |

उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टय:ह् | स्यामेदिन्द्रस्य शर्माणि ||6||
ऋग्वेद 1|4|6||

भावार्थ -

जब सब मनुष्य विरोध को छोड़कर सब के उपकार करने में प्रयत्न करते हैं तब शत्रु भी मित्र हो जाते हैं; जिससे सब मनुष्यों को ईश्वर की कृपा से निरन्तर उत्तम आनन्द प्राप्त होते हैं ||6||

एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम् | पतयन्मंदयत्सखम् ||7||
ऋग्वेद 1|4|7||

पदार्थ -

हे इन्द्र परमेश्वर ! आप अपनी कृपा करके हम लोगों के अर्थ यानों में सब सुख वा वेगादि गुणों की शीघ्र प्राप्ति के लिये जो वेग आदि गुणवाले अग्नि वायु आदि पदार्थ, चक्रवर्त्ति राज्य के महिमा की शोभा जल और पृथिवी आदि जो कि मनुष्यों को अत्यन्त आनन्द‌ देनेवाले तथा स्वामिपन को करनेवाले वा जिसमें आनन्द को प्राप्त होने वा विद्या को जनानेवाले मित्र हों ऐसे विज्ञान आदि धन को हमारे लिये धारण कीजिये ||7||

भावार्थ -

ईश्वर पुरुषार्थी मनुष्य‌ पर कृपा करता है आलस करने वाले पर नहीं, क्योंकि जब तक मनुष्य ठीक ठीक पुरुषार्थ नहीं करता तब तक ईश्वर की कृपा और अपने किए हुए कर्मों से प्राप्त हुए पदार्थों की रक्षा भी करने में समर्थ कभी नहीं हो सकता | इसलिए मनुष्यों को पुरुषार्थी होकर ही ईश्वर की कृपा के भागी होना चाहिए ||7||

अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः |
प्रावो वाजेषु वाजिनम् ||8||
ऋग्वेद 1|4|8||

पदार्थ -

हे पुरुषोत्तम ! जैसे यह मूर्तिमान होके सूर्य्यलोक जलरस को वर्षाके सब ओषधी आदि पदार्थों को पुष्ट करके सब की रक्षा करता है वैसे ही हे असंख्यात कर्मों को करनेवाले शूर‌वीरो ! सब रोग और धर्म के विरोधी दुष्ट शत्रुओं को नाश करनेहारे होकर इस जगत् के रक्षा करनेवाले हूजिये | इसी प्रकार जो दुष्टों के साथ युद्ध में प्रवर्त्तमान, धार्मिक और शूर‌वीर पुरुष हैं, उसकी अच्छी प्रकार रक्षा सदा करते रहिये ||8||

भावार्थ -

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है | जैसे जो मनुष्य दुष्टों के साथ धर्मयुद्ध करता है उसी का ही विजय होता है; और का नहीं | तथा परमेश्वर भी धर्मपूर्वक युद्धकरनेवाले मनुष्यों का ही सहाय करनेवाला होता है औरों का नहीं ||8||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (10)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA