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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय (1)

परम पूज्य महात्मा नारायण स्वामी जी का जीवन आर्यसमाज के इतिहास में एक कर्मशील का उज्ज्वल अध्याय है | उनका जीवन कर्त्तव्यनिष्ठा, तप, साहस एवं आत्म विश्वास का एक ऐसा उदाहरण है जो प्रत्येक पथिक को सुमार्ग पर चलने का पथनिर्देश कर सकता है | वे महर्षि दयानन्द के उन अनुयायियों में से थे जिन्होंने महर्षि के मनतव्यों का आंख बन्द कर अनुसरण न कर उन्हें समझा, परखा और स्वविवेक की तुला पर तोला और फिर उनको लेकर, जनसाधारण के उपकार हेतु, उन मंतव्यों के प्रचार-प्रसार का दृड़ व्रत लेकर संसार संग्राम में उतर पड़े | इस प्रयास में वे सफल भी हुए, इसमें सन्देह नहीं |

जन्म : - महात्मा नारयण स्वामी का जन्म सन् 1865 ई. में अलीगढ़ में हुआ था | उनके पूर्वज धौलपुर में श्रृंगारपुर ग्राम के रहने वाले थे | उनके परम पितामह श्री सुखलाल जी बनारस के महाराज बेतसिंह जी के मन्त्रियों में से थे | इनके जन्म के समय इनके पिता जी अलीगढ़ में सरकारी नौकरी कर रहे थे | आप का जन्म का नाम नारायण प्रसाद था |

शिक्षा : - उस समय की प्रथा के अनुसार आपने सात वर्ष की अवस्था के बाद फारसी के मकतब में शिक्षाभ्यास आरम्भ किया | कुछ वर्ष बाद अंग्रेजी भी पढ़ी | हिन्दी पढ़ने की बारी बाद में आई | जिन दिनों वे स्कूल में पढ़ रहे थे, महर्षि दयानन्द अलीगढ़ आये | उनका जलूस सामने से गुजर रहा था | उत्सुकतावश बच्चे उस जलूस को देखने जाने लगे तो संस्कृत के अध्यापक ने यह कह कर रोक दिया कि यह व्यक्ति अधर्मी है और इसे देखने से भी पाप लगेगा | जिस व्यक्ति के देखने से ही पाप लगता हो उस व्यक्ति का व्याख्यान सुनने का तो कोई अर्थ ही नहीं | बाद में महात्मा नारायण स्वामी को सदा इस निर्णय पर दुख रहा | इसके बाद वे महर्षि दयाननद के दर्शन कभी न कर सके |

विवाह एवं गृहस्थ : - तेइस वर्ष की अवस्था में आपका विवाह हुआ | उस समय आप मुरादाबाद में कलैक्टर के दफ्तर में क्लर्क लगे हुए थे | उस समय की प्रथा के अनुसार आप मुरादाबाद में व उनकी पत्नी, उनकी माता जी के पास अलीगढ़ में रहती थी | सन् 1896 में उनके पिताजी का देहावसान हो गया |

सन् 1899 में उनकी माता जी का भी देहान्त हो गया | तब आप अपनी पत्नि को अपने पास ले आए | आपकी पत्नी एक आदर्श पत्नी थी | गृहकार्य में अत्यन्त निपुण एवं कर्मढ थी | साथ ही अपने पति के आदर्शों के प्रति भी पूरी तरह समर्पित थी | आपने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैंने अपने को सौभाग्यवान समझा कि विवाह में अपनी आवाज न होने पर भी मुझे एक समझदार, कर्त्तव्यपरायणा देवी की संगति प्राप्त हुई | परन्तु गृहस्थी का सुख उनके भाग्य में नहीं था | सन् 1909 में उनके यहां प्रथम संतान हुई और वह पुत्र दो महीने में चल बसा | इसके बाद दो वर्ष बाद दूसरी संतान के होने पर पत्नी व बच्चे दोनों का देहान्त हो गया | उस समय नारायण प्रसाद जी की आयु 43 वर्ष की थी | इस समय तक वे आर्यसमाज के क्षेत्र में पहचाने जाने लगे थे |

आर्य समाज के प्रति रुचि एवं कार्य : - परम्परागत सनातनी परिवार में उत्पन्न होने के कारण, प्रारम्भ में ही उन पर धार्मिक संस्कारों का प्रभाव रहा | उस समय पाप-पुण्य की परिभाषा बड़ी जटिल थी | महर्षि के दर्शन न कर सके क्योंकि अध्यापक ने कह दिया "पाप लगेगा" | विवाह पर यज्ञोपवीत धारण तो किया पर बाद में उतार दिया क्योंकि पण्डित जी ने कहा "पाप लगेगा" |

जो व्यक्ति जिज्ञासु होते हैं वे अपने लिये सुमार्ग पा ही लेते हैं | नारायण प्रसाद जी आर्यसमाजियों के विषय में जो सुनते थे उसके अनुसार "उनका अपना कोई सिद्धान्त नहीं होता | वे केवल खंडन करना जानते हैं |" एक दिन मुरादाबाद अपने मित्र के घर गए | वहां उन्हें आर्यसमाज के दस नियमों को पढ़ने का अवसर मिला | उन्होंने देखा कि नियमों में न कोई खंडन है, न मंडन | आर्यसमाज के प्रति उनकी धारणा कितनी गलत थी | उसी मित्र से सत्यार्थ प्रकाश लेकर पढ़ा, और उनके ज्ञान चक्षु खुल गए | वहीं से प्रेरणा लेकर उन्होंने नियमित यज्ञोपवीत धारण करना आरम्भ कर दिया | साथ "सत्यार्थप्रकाश से प्रेरित होकर, बहुत विचार कर उन्होंनें अपने लिए कुछ नियमों का निर्धारण किया और निश्चय किया कि इन नियमों का पालन आजीवन करूंगा |

नियम निम्न थे : -

1. कभी मांस-मदिरा का सेवन नहीं करूंगा |
2. कभी थियेटर, सिनेमा न देखूंगा |
3. नियमपूर्वक संध्या और हवन करूंगा |
4. ईमानदारी व परिश्रम से जीविका उपार्जन करूंगा |
5. यत्न करूंगा कि एक सद् गृहस्थ की भांति जीवन यापन करूं |
6. संस्कृत व अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का पूरा प्रयत्न करूंगा |

यहां से आपके सार्वजनिक जीवन की यात्रा आरम्भ हो गई | पहले उनका कार्यक्षेत्र मुरादाबाद व उसके आस पास के समाजों तक ही सीमित था | धीरे-धीरे उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत होता गया |

गुरुकुल वृन्दावन : - पत्नी की मृत्यु के बाद आपने नौकरी छोड़ दी और अपना सारा समय आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में लगा दिया | सन् 1911 ई. में फर्रूखाबाद में एक गुरुकुल की स्थापना हो चुकी थी | उसके लिए वृन्दावन में भूमि उपलब्ध होने पर उसे वृन्दावन लाना था | यह कार्य मुश्किल व परिश्रम-साध्य था | वहाँ विद्यार्थियों के लिए आवास बनाने थे | यह कठिन कार्य महात्मा नारायण प्रसाद जी को सौंपा गया जिसे उन्होंने पूरी योग्यता से निभाया और गुरुकुल वृन्दावन में आ गया |

बाद में आप वहां के मुख्याधिष्ठाता नियुक्त हुए | आपके समय में गुरुकुल वृन्दावन ने चहुंमुखी उन्नति की | दस वर्ष तक आप वहां सेवा कार्य करते रहे | उसे पूरी तरह सुरक्षित करके, आपने और अधिक विस्तृत सामाजिक, धार्मिक कार्यक्षेत्र में प्रवेश किया |

गुरुकुल छोड़ते समय आपको भावभीनी विदाई दी गई व अभिनन्दन किया गया | अब आपका विचार स्वाध्याय एवं योगाभ्यास में कुछ समय बिताने का था | उसके लिए एकान्तवास चाहिये | ऐसा स्थान जहां आराम से शान्तिपूर्वक स्वाध्याय कर सकें, ढूढ़ना आरम्भ किया और अन्त में जिला अलमोड़ा में रामगढ़ तल्ला में एक स्थान आपको पसन्द आया | इस प्रकार सन् 1920 के दिसम्बर मास में रामगढ़ तल्ला में नारायण आश्रम का श्री गणेश हुआ | यह स्थान अत्यन्त सुरम्य एवं प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण था | आश्रम के नीचे नदी की कलकल करती धारा, चारों और हरियाली भरी पर्वतमाला, एकान्त साधना के लिए उपयुक्त स्थान मिल गया और धीरे-धीरे वहां रहने के लिए कमरे भी बन गए |

संयास आश्रम में प्रवेश‌ : - 22 मई 1922 के दिन, नारायण आश्रम में ही आपने स्वामी सर्वदानन्द जी से संन्यास की दीक्षा ली | आपने नाम न बदल कर अपने नाम के पीछे स्वामी लगाना आरम्भ कर दिया | अब आप आर्यजगत् में महात्मा नारायण स्वामी जी के नाम से प्रसिद्ध हुए |

मथुरा में दयानन्द शताब्दि : - सन् 1923 में आप सर्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान चुन लिए गए | इस दायित्व के साथ ही सन् 1925 ई. में होनेवाली दयानन्द शताब्दि के प्रबन्ध का दायित्व भी आपको सौंप दिया गया | इस समय तक महात्मा नारायण स्वामी आर्यजगत के एक कर्मठ एवं समर्थ नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे | महर्षि की जन्मशताब्दि के प्रबन्ध का उत्तरदायित्व आपने अत्यन्त प्रसन्नता से ग्रहण किया और अत्यन्त कुशलता और सफलता से निभाया भी |

यह एक महान आयोजन था | सम्पूर्ण भारत ही नहीं अपितु विदेशों से भी आर्यजनों का इस सम्मेलन में सम्मिलित होना निश्चित था | मथुरा नगर के स्टेशन के पास ही भूमि ली गई और उस पर बृहत् दयानन्द नगर का निर्माण किया गया | हर एक प्रान्त से आने वाले आर्यजनों के लिए पृथक्-पृथक् आवास स्थान बनाए गये | अन्य आवश्यक सुविधाएं भी उसी प्रकार जुटाई गई | आने वालों की सुविधा के लिए दुकानें भी लगाई गई | एक सर्वसुविधा-युक्त नगर की स्थापना करना सरल कार्य नहीं था | उस कार्य को सुचारु रूप से चलाने का कार्य आर्य स्वयं-सेवक ही सम्हाल रहे थे | पुलिस की ओर से व्यवस्था करने के आग्रह को अस्वीकार कर दिया गया | अनुशासन व व्यवस्था की दृष्टि से यह आयोजन अभूतपूर्व रहा |

लगभग एक लाख आर्यजन इस आयोजन में सम्मिलित हुए और अत्यन्त व्यवस्थित ढंग से सारा कार्य सम्पन्न हुआ | नगर की दुकानों पर बीड़ी सिगरेट आदि बेचने का निषेध था | इलाहाबाद से आए एक वकील साहब को विश्वास नहीं हुआ | उनका विचार था कि सिगरेट चोरी छुपे तो अवश्य मिलता होगा | वे स्वयं बाजार गए और प्रयत्न किया | पर निराश रहे, कहीं भी सिगरेट बीड़ी नहीं मिली |

उत्सव में पुलिस का कोई प्रबन्ध नहीं था | सारी व्यवस्था आर्यवीरों के हाथ में थी | इतनी भीड़ में इन दिनों न तो कोई चोरी हुई, न लड़ाई-झगड़ा | इस प्रकार यह इतना बड़ा आयोजन शान्तिपूर्वक सफल हुआ |

इस समारोह का प्रारम्भ नगर कीर्तन एवं शोभायात्रा से हुआ | स्वामी श्रद्धानन्द जी उस समय सार्वदेशिक सभा के संरक्षक प्रधान थे | इसके अतिरिक्त वे आर्यजगत के सबसे वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित नेता भी थे | शोभायात्रा में सबसे आगे काषाय वस्त्रों में, स्वामी श्रद्धानन्द जी, हाथ में ओउम् ध्वज लिए नेतृत्व कर रहे थे | उनके पीछे अन्य संन्यासीगण व बैण्ड बाजा था | उसके पीछे अपने अपने बैनर लिए हजारों आर्य नर-नारी भजन गाते हुए अनुशासन में चल रहे थे | यह दृष्य अभूतपूर्व था |

इतने बड़े आयोजन के लिए धन एकत्र करने में महात्मा नारायण स्वामी जी को अथक परीश्रम करना पड़ा था | सब कार्य सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गए | पर महात्मा जी का स्वास्थ्य खराब हो गया | जांच के बाद पता चला कि अपैंडिक्स का आपरेशन‌ करना पड़ेगा | आपको बरेली लाया गया और वहां डा. भाटिया ने आपका आपरेशन किया |

महर्षि की जन्मशताब्दि टंकारा में भी मनाई गई और महात्मा जी वहां भी पहुंचे और ग्राम में आर्यसमाज की स्थापना की | बाद में सन् 1926 ई. में रामगढ़ तल्ला में भी आर्यसमाज बनाया |

(क्रमशः)

(आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर, (उतरांचल) के सौजन्य से)