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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'ईश्वर पूजा का वैदिक स्वरूप'(5) लेखक - शास्त्रार्थ महारथी स्व.पं.रामचन्द्र देहलवी जी

गतांक से आगे -

प्रकृति से हम ले रहे हैं, लेते आए हैं और लेते रहेंगे | क्योंकि वह पूर्ण है | आज की आधुनिक साज-सज्जा की सामग्री रेडियो, ग्रामोफोन, टेलीविजन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज आदि सभी प्राकृतिक पदार्थ हैं जो हमने प्रकृति से प्राप्त किए हैं |

प्राकृतिक वस्तुओं के दो प्रकार के प्रयोग या उपयोग किए जा सकते हैं सही उपयोग (Right use) और गलत उपयोग (Wrong use) यदि हम सही उपयोग करेंगे, हमारे लिए वस्तुएँ लाभकारी होंगी यदि गलत इस्तेमाल करेंगे तो हमें हानी हो जाएगी |

जिस चीज का भी गलत इस्तेमाल किया जाएगा वह हमारे लिए जहर होगा | इसी प्रकार यदि भगवान को ठीक प्रकार हमने न समझा तो वह हमारे लिए बजाय लाभदायक होने के अत्यन्त हानिप्रद हो जायेगा | लोगों ने ईश्वर को समझने में बड़ी गलती की है और किये जा रहे हैं | इस गलत विश्वास और नासमझी ने ऐसों को ही हानि पहुँचाई है | लोग धर्म के नाम पर अब तक ठगे जा रहे हैं और हानि उठा रहे हैं |

आचार एक शब्द है | उसके पहले अति लगाने से वह अत्याचार बन जाता है | जिस चीज के साथ भी अति होगी वह बिगड़ जाएगी |

टामस पेन का यह वाक्य कि We can not serve God in the manner we serve those, who can not do without such service. ईश्वर की उपासना का जो ढंग मैंने बताया है यह उसी और संकेत करता है | मनुष्य की सेवा जैसे की जाती है वैसे भगवान वा ईश्वर की नहीं की जा सकती | जो लोग ईश्वर की भी मनुष्य की तरह सेवा करना चाहते हैं वह गलत रास्ते पर जा रहे हैं | उन्हें उससे कुछ लाभ न होगा | ऋषि दयानन्द ने जब शिव पर चूहे चढ़ते देखे तो उन्हें यही तो ख्याल हुआ कि जो शिव चूहे को अपने ऊपर से नहीं हटा सकता वह जगत् की कैसे रक्षा कर सकेगा ? इस ख्याल से सारी आगे की घट्नाएँ सम्बद्ध हैं |

तो मैं आपको बता रहा हूँ कि मूर्तियों का सही उपयोग कीजिए, गलत इस्तेमाल छोड़ दीजिए |

हमको ईश्वर व प्रकृति दोनों का सही उपयोग करना चाहिए | ईश्वर के गुणों को हम धारण करें और श्रेष्ठ बनें | प्रकृति के पदार्थों का मनुष्यमात्र के भले के लिए प्रयोग करें | प्रकृति का गलत प्रयोग हमें नुकसान पहुँचाएगा | किसी फारसी के शायर ने लिखा है :
अगर सदसाल गब्र आतिश फरोजद,
चूं यकदम अन्दराँ उफतद विसेजद |

गब्र कहते हैं आग के पुजारी को | यदि आग का पुजारी सौ साल तक आग को रोशन रखता रहे और एकदम उसमें कूदे तो आग उसे फौरन जला देगी | आग वहाँ जरा भी लिहाज नहीं करेगी | आग प्राकृतिक पदार्थ है | उसका गलत प्रयोग किया गया तो उसने नतीजा दे दिया |

प्रतिदिन लोग अन्धविश्वास या यूँ कहिए कि नासमझी से काम करने के कारण अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं | क्या ऐसे लोग गंगा और यमुना मैया की जय बोलते हुए नहीं चले जाते हैं जो तैरने की विद्या सीखे भी नहीं हैं और नदियों के पानी में घुस जाते हैं, बड़े जोर जोर से, गंगा मैया या जमना मैया ऐसे नासमझ लोगों की प्रतीक्षा में है कि वे आवें और बिना तैरने की विद्या सीखे मुझमें घुसें | वह उन्हें पानी में ही दबोच लेगी और अपने बेटों, जल-जन्तुओं, मछली, कछुओं आदि को खिला देगी | अपने नादान व नासमझ बेटों का वह थोड़ा सा भी लिहाज नहीं करेगी, उन्हें छोड़ेगी नहीं, सैंकड़ों बार ऐसे दुखद समाचार सुने जाते हैं कि अमुक युवक डूब गया, इस मोहल्ले का इकलौता बच्चा डूब गया | प्राकृतिक चीजों के दुरपयोग या नासमझी से किये उपयोगों का यही फल है |

इसके विपरीत यदि कोई कस्साब पशुओं का वध करके आया है खून में सना हुआ है, यमुना को मैया नहीं कहता है बल्कि उसे कुछ और ही नाम से पुकारता है, किन्तु तैरने की विद्या जानता है और उसे जानकर पानी में घुसता है तो उसको जमना या गंगा मैया अपनी छाती पर तैरा देगी और वह बाखूबी पानी में अपने करतब दिखाता रहेगा | कभी चित तैरेगा, कभी पट | गंगा या यमुना उसका कुछ न बिगाड़ सकेगी | क्यों ? क्योंकि वह तैरने की विद्या सीख कर पानी में घुसा है | वह उसका भक्त नहीं है | तो भी नदी उसका लिहाज करती है | परन्तु जो नासमझ श्रद्धालु हैं, चाहे वे दशाब्दियों से उसके भक्त हों उनके साथ कोई लिहाज नहीं करेगी और उन्हें डुबो देगी |

इसी प्रकार जो ईश्वर की उपासना, बिना उसके गुण, कर्म व स्वभाव जाने, अन्धाधुन्ध करते हैं उनको किञ्चित् मात्र भी ईश्वर से लाभ प्राप्त नहीं हो सकता | कहा भी है "बेइल्म नतवां खुदाराशनाख्त" | इसलिए ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव से परिचित होकर अपने को लाभान्वित करना चाहिए | यही उसकी सच्ची उपासना है, पूजा है और यही उसकी भक्ति है |

जड़ मूर्ति को पूजने से तो जड़ता के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं हो सकता |

|| ओउम् शान्तिश्शान्तिश्शान्ति ||

(सरस्वती साहित्य संस्था, 295, जागृति एन्क्लेव, विकास मार्ग, दिल्ली के सौजन्य से)