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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदनित्यत्व‌विषयः (3)

गतांक से आगे -

इसी प्रकार से वेदान्तशास्त्र में वेदों के नित्य होने के विषय में व्यास जी ने भी लिखा है, (शास्त्र..) | इस सूत्र के अर्थ में शंक‌राचार्य ने भी वेदों को नित्य मान के व्याख्यान किया है कि - 'ऋग्वेदादि जो चारों वेद हैं, वे अनेक विद्याओं से युक्त हैं, सूर्य के समान सब सत्य अर्थों के प्रकाश करने वाले हैं | उनका बनाने वाला सर्वज्ञादि गुणों से युक्त परब्रह्म है, क्योंकि सर्वज्ञ ब्रह्म से भिन्न कोई जीव सर्वगुणयुक्त इन वेदों को बना सकें, ऐसा सम्भव कभी नहीं हो सकता | किन्तु वेदार्थविस्तार के लिये किसी जीवविशेष पुरुष से अन्य शास्त्र बनाने का संभव होता है | जैसे पाणिनि आदि मुनियों ने व्याकरणादि शास्त्रों को बनाया है | उनमें विद्या के एक एक देश का प्रकाश किया है | सो भी वेदों के आश्रय से बना सके हैं | और जो सब विद्याओं से युक्त वेद हैं, उनको सिवाय परमेश्वर के दूसरा कोई भी नहीं बना सकता, क्योंकि परमेश्वर से भिन्न सब विद्याओं में पूर्ण कोई भी नहीं है | किञ्च परमेश्वर के बनाये वेदों के पढ़ने, विचारने और उसी के अनुग्रह से मनुष्यों को यथाशक्ति विद्या का बोध होता है, अन्यथा नहीं' ऐसा शंक‌राचार्य ने भी कहा है | इससे क्या आया कि वेदों के नित्य होने में सब आर्य लोगों की साक्षी है | और यह भी कारण है कि जो ईश्वर नित्य और सर्वज्ञ है उसके किये वेद भी नित्य और सर्वज्ञ होने के योग्य हैं | अन्य का बनाया ऐसा ग्रन्थ कभी नहीं हो सकता |

(अत एव..) इस सूत्र से भी यही आता है कि वेद नित्य हैं, और सब सज्जन लोगों को भी ऐसा ही मानना उचित है | तथा वेदों के प्रमाण और नित्य होने में अन्य शास्त्रों के प्रमाणों को साक्षी के समान जानना चाहिये, क्योंकि वे अपने ही प्रमाण से नित्य सिद्ध हैं | जैसे सूर्य के प्रकाश में सूर्य का ही प्रमाण है, अन्य का नहीं, और जैसे सूर्य्य प्रकाशस्वरूप है, पर्वत से लेके त्रसरेणु पर्यन्त पदार्थों का प्रकाश करता है, वैसे वेद भी स्वयंप्रकाश हैं और सब सत्यविद्याओं का भी प्रकाश कर रहे हैं |

..ऐसे ही परमेश्वर ने अपने और अपने किये वेदों के नित्य और स्वतः प्रमाण होने का उपदेश किया है सो आगे लिखते हैं - (सपर्यगात्..) यह मन्त्र ईश्वर और उसके किये वेदों का प्रकाश करता है, कि जो परमेश्वर सर्वव्यापक आदि विशेषणयुक्त है सो सब जगत् में परिपूर्ण हो रहा है, उसकी व्याप्ति से एक परमाणु भी रहित नहीं है | सो ब्रह्म सब जगत का करनेवाला और अनन्तविद्यादि बल से युक्त है, जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों के संयोग से रहित है, अर्थात् वह कभी जन्म नहीं लेता, जिसमें एक परमाणु भी छिद्र नहीं कर सकता, इसी से वह सर्वथा छेदरहित है, वह नाड़ियों के बन्धन से अलग है, जैसा वायु और रुधिर नाड़ियों में बंधा रहता है , ऐसा बन्धन परमेश्वर में नहीं होता, जो अविद्या अज्ञानादि क्लेश और सब दोषों से पृथक् है, सो ईश्वर पापयुक्त वा पाप‌ करनेवाला कभी नहीं होता, क्योंकि वह स्वभाव से ही धर्मात्मा है, जो सबका जानने वाला है , जो सबका अन्तर्यामी है , और भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान इन तीनों कालों के व्यवहारों को यथावत् जानता है, जो सबके ऊपर विराजमान हो रहा है, जो कभी उत्पन्न नहीं होता और उसका कारण भी कोई नहीं है, किन्तु वही सबका कारण, अनादि और अनन्त है, इससे वही सबका माता पिता है, और अपने ही सत्य सामर्थ्य से सदा विद्यमान रहता है, इत्यादि लक्षणों से युक्त जो सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर है, उसने सृष्टि की आदि में अपनी प्रजा को, जो कि उसके सामर्थ्य से सदा से वर्त्तमान है, उसके सब सुखों के लिये सत्य अर्थों का उपदेश किया है | इसी प्रकार जब जब परमेश्वर सृष्टि को रचता है, तब तब प्रजा के हित के लिये सृष्टि की आदि में सब विद्याओं से युक्त वेदों का भी उपदेश करता है, और जब जब सृष्टि का प्रलय होता है तब तब वेद उसके ज्ञान में सदा बने रहते हैं, इससे इनको सदैव नित्य मानना चाहिये |

(क्रमशः)

महर्षि दयानन्द सरस्वती
(महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत् ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षेप में उद्दृत्)
From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's RIGVED-ADI-BHASHYA-BHUMIKA