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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

पाप का मूल अज्ञान

ओउम् | यच्चिद्धि ते पुरुषत्रा यविष्ठाचित्तिभिश्चकृमा कच्चिदागः |
कृधी ष्व‌1स्माँ अदितेरनागान व्येनांसि शिश्रथो विष्व‌गग्ने ||

ऋग्वेद 4|12|4

शब्दार्थ -

हे यविष्ठ.......................अतिशय बलवन् !
अचित्तिभिः.....................अज्ञानों के कारण
यत्+चित्......................जो कुछ भी
पुरुषत्रा.........................पुरुषों में
ते...............................तेरा
कच्चित्........................कदाचित्
आगः...........................अपराध, पाप
चकृमा..........................हम करते हैं,
अस्माऩ्.......................हमे‍,
अदितेः..........................अदिति का
सु...............................अच्छी प्रकार
अनागाऩ्.......................अनपराधी
कृधि...........................बना | हे
अग्ने..........................अग्ने ! हमारे
एनांसि..........................पापभावों को
विष्वक्.........................सब प्रकार से
वि+शिश्रिथः....................विशेष रूप से शिथिल कर |

व्याख्या -

अज्ञान=उल्टे ज्ञान अथवा ज्ञान के अभाव के कारण मनुष्य पाप-गर्त में गिरता है | ज्ञान के अभाव की अपेक्षा उल्टा ज्ञान भयंकर होता है | वह विपर्य्य‌य, विपरीत ज्ञान, मिथ्या ज्ञान, अविद्या आदि कई नामों से पुकारा जाता है |अविद्या का लक्षण योगदर्शन में इस प्रकार किया गया है -

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या || योग दर्शन 2|5

अनित्य को नित्य समझना, अपवित्र को पवित्र मानना, दुख में सुख का भान करना और अनात्मा में आत्मा का ज्ञान करना अविद्या है | धन-धान्य, महल-अटारी, पर्वत, नदी-नाले, सूर्य्य-चन्द्र, पृथिवी आदि नाशवान् ! अतएव अनित्य पदार्थों को नित्य मानना मूर्खता नहीं तो क्या है ? ऐसे ही नित्य जीव आदि को अनित्य मानना अविद्या है | अपवित्र पदार्थों-मलमूत्रादि को पवित्र मानना अज्ञान है | शरीर अपवित्र है किन्तु पामरजन इसे पवित्र मानते हैं | स्त्री पुरुष का मुख चाटती है और पुरुष स्त्री पर मोहित होकर अकरणीय कार्य करता है | शरीर के अन्दर और बाहर की स्थिति पर तनिक विचार कीजिए | इसके गन्देपन का निश्चय हो जाएगा | मलमूत्र, विष्ठा का थैला पवित्र कैसे ? किन्तु संसार का अधिक भाग इसे पवित्र मान विपर्य्यय ज्ञान में फँस‌ रहा है | इसी प्रकार पवित्र को अपवित्र मानना भी उल्टा ज्ञान है | संसार में कितना दुख है , जन्म-मरण के चक्कर में कितनी पीड़ा है, किन्तु कितनों को इसका भान होता है ? कितने इससे छुटकारा पाने की चेष्ठा करते हैं ? इस दुःखबहुल को सुख मानना भी अविद्या है |

किसी का धन चोरी हो जाय तो वह कहता है, मैं लुट गया | लुटा तो धन किन्तु मान बैठा वह अपने-आप को लुटा हुआ | 'मैं काणा हूँ' - काणापन तो आँख में है, किन्तु कह रहा है, 'मैं काणा हूँ' | 'मैं रोगी हूँ' - रोग शरीर में है किन्तु अपने आप को रोगी मान रहा है | धन, इन्द्रिय‌, शरीर सभी अनात्मा है , किन्तु अविद्या की महिमा देखो, इन सबको आत्मा मान रहा है | यह महती अविद्या है | इसी प्रकार आत्मा को न मानना, उसे जन्य किन्तु अमर न मानना आदि अनेक प्रकार की अविद्या है | अज्ञान के कारण हिंसा आदि पापों को लोग पाप नहीं मानते, वरन् कई मूढ़ इनको परमेश्वर की प्रसन्नता का साधन मानकर पुण्य समझते हैं | कितनी दयनीय है उनकी दशा ! संसार में जितने पाप होते हैं , उन सबका मूल है यह अविद्या | भगवान् ही यथार्थ ज्ञान दे, पापभावना का नाश करे | ज्ञान होने पर भी क‍ई मनुष्य पाप करते हैं | उनके अन्दर पापों की वासनाएँ प्रबल होती हैं | भगवत्कृपा से ही वासनाओं का नाश हो सकता है, अतः उसी से प्रार्थना की है - व्येनांसि शिश्रथो विष्व‌गग्ने हे ज्ञानाग्नि से पापवासना को दग्ध करनेवाले ! मेरी पापभावनाओं को सर्वथा शिथिल कर दे |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)