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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन सूक्त‌' पर टीका - ‍परिशिष्ट‌ (1)

|| ओउम् ||
अथर्ववेदान्तर्गत, केन सूक्त‌
(अथर्व. 10|2)

केन पार्ष्णी आभृते पुरुषस्य केन मांसं संभूतं केन गुल्फौ | केनांगुलीः पेशनीः केन् खानि केनोच्छलंखौ मध्यतः कः प्रतिष्ठाम् ||1||

अर्थ - किसने मनुष्य की एड़ियाँ बनाई ? किसने (उनमें) मांस भर दिया ? किसने (गुल्फौ) दोनों टखने बनाए ? किसने सुन्दर उँगलियाँ, किसने (खानी) इन्द्रियाँ, किसने (उच्छलंखौ) दोनों पावों के तलवे जोड़ दिये ? बीच में किसने आधार बनाया ?

कस्मान्नु गुल्फावधरावकृण्वन्नष्ठीवन्तावुत्तरौ पुरुषस्य | जंघे निर्ऋत्य न्यदधुःक्वस्विज्जानुनो: संघी क उ तच्चिकेत ||2||

अर्थ ..- किस (पदार्थ) से मनुष्य के (अधरौ) नीचे के दोनों टखने (नु) और मनुष्य के (उत्तरौ अष्ठीवन्तौ) ऊपर के घुटने (अकृण्वन्) बनाये गये ? जाँघें (निर्ऋत्य) अलग-अलग बनाकर (क्वस्विन्) क्योंकर (न्यदधुः) जमा दी गईं ? (जानुनोः सन्धी) जानुओं की सन्धि का (कौ) किसने (तत् चिकेत) ढाँचा बनाया ?

चतुष्टयं युज्यते संहितान्तं जातुभ्यामूर्ध्वं शिथिरं कबन्धम् | श्रोणी यदूरू क उ तज्जजान याभ्याँ कुसिन्धं सुदृढ़ं ब‌भूव ||3||

अर्थ - (चतुष्टयम्) चार प्रकार से (संहिन्तान्तं) जुड़े हुए सिरों वाला (जानुभ्यां उर्ध्व) दोनों घुटनों के ऊपर (शिथिर) ढीला (कबन्ध) धड़ (युज्यते) जोड़ा गया है, (यत् श्रोणौ) जो दोनों कूल्हे और (ऊरू) दोनों जाघें हैं (क उ) किसने (तत्+ज‌जान) उनको बनाया है ? (याभ्यां) जिन दोनों के साथ (कुसिन्धम्) (सुदृढ़ बभूव) बड़ा दृढ़ हुआ है |

कति देवा कतमे त आपन् य उरो ग्रीवाश्चिक्युः पुरुषस्य | कति स्तनौ व्यदधुः कः कफोडौ कति स्कन्धान कति पृष्टीरचिन्वन् ||4||

अर्थ - वे कितने और कतमे देवाः कौन से देव (प्रकृत्यवयव) थे, जिन्होंने मनुष्य की (उर‍ः) छाती और गले (चिक्युः) एकत्र किया ? (कति स्तनौ व्यदधुः) कितनों के स्तनों को बनाया ? (कः कफोडो) किसने कुहनियाँ बनाईं ? (कति-‍स्कन्धान्, किसने कन्धों को बनाया ? कति पृष्टीः अचिन्वन्) किसने पसलियों को जोड़् दिया ?

(क्रमश:)