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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (11)

तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो | धनानामिन्द्र सातये ||9||
ऋग्वेद 1|4|9||

पदार्थ -
हे असंख्यात वस्तुओं में विज्ञान रखनेवाले परम ऐश्वर्यवान जगदीश्वर ! हम लोग पूर्ण विद्या और राज्य को सिद्ध करनेवाले पदार्थों का सुखभोग वा अच्छे प्रकार सेवन करने के लिये युद्धादि व्यवहारों में विजय करानेवाले और उक्त गुणयुक्त आपको ही नित्य प्रति जानने और जनाने का प्रयत्न करते हैं ||9||

भावार्थ -
जो मनुष्य दुष्टों को युद्ध से निर्बल करता तथा जितेन्द्रिय वा विद्वान होकर जगदीश्वर की आज्ञा का पालन करता है, वही उत्तम धन वा युद्ध में विजय को अर्थात् सब शत्रुओं को जीतनेवाला होता है ||9||

आ त्वेता निषीदतेन्द्रमभि प्रगायत | सखायः स्तोमवाहसः ||1||
ऋग्वेद 1|5|1||

पदार्थ -
हे प्रशंसनीय गुणयुक्त वा प्रशंसा कराने और (सखायः) सब से मित्रभाव में वर्त्तनेवाले विद्वान लोगो ! तुम और हम लोग सब मिलके परस्पर प्रीति के साथ मुक्ति और शिल्पविद्या को सिद्ध करने में स्थित हों अर्थात् उसकी निरन्तर अच्छी प्रकार से यत्नपूर्वक साधना करने के लिये परमेश्वर वा बिजली से जुड़ा हुआ वायु को -- 'इन्द्रेण वायुना.' इस ऋग्वेद के प्रमाण से शिल्पविद्या और प्राणियों के जीवन हेतु से इन्द्र शब्द से स्पर्श गुणवाले वायु का भी ग्रहण किया है --(अभिप्रगायत) अर्थात उसके गुणों का उपदेश करें और सुनें कि जिससे कि वह अच्छी रीति से सिद्ध की हुई विद्या सबको प्रकट हो जावें, (तु) और उसी से तुम सब लोग सब सुखों को प्राप्त हो‍ओ ||1||

भावर्थ -
जबतक मनुष्य हठ, छल और अभिमान को छोड़कर सत्य प्रीति के साथ परस्पर मित्रता करके, परोपकार करने के लिए तन मन और धन से यत्न नहीं करते, तबतक उनके सुखों और विद्या आदि उत्तम गुणों की उन्नति कभी नहीं हो सकती ||1||

पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्य्याणाम् | इन्द्रं सोमे सचा सुते ||2||
ऋग्वेद 1|5|2||

पदार्थ -
हे मित्र विद्वान लोगो ! अत्यन्त उत्तम आकाश से लेके पृथिवी पर्य्यन्त असंख्यात पदार्थों को रचने में समर्थ दुष्ट स्वभाववाले जीवों को ग्लानि प्राप्त करानेवाले और श्रेष्ठ जीवों को सब ऐश्वर्य्य के देनेवाले परमेश्वर् के -- तथा अत्यन्त उत्तम आकाश से लेके पृथिवी पर्य्यन्त बहुत सी विद्याओं के साधक, दुष्ट जीवों वा कर्मों के भोग के निमित्त और, जीवमात्र को सुखदुख देनेवाले पदार्थों के हेतु भौतिक वायु के -- गुणों को अच्छी प्रकार उपदेश करो | और जो कि रस खींचने की क्रिया से प्राप्त वा उस विद्या से प्राप्त होने योग्य पदार्थों के निमित्त कार्य्य हैं, उनको उक्त विद्याओं से सब उप‌कार के लिये यथायोग्य युक्त करो ||2||

भावार्थ -
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | पीछे के मन्त्र से इस मन्त्र में 'सखायः ; तु ; अभिप्रगायत' इन तीन शब्दों को अर्थ के लिए लेना चाहिये | इस मन्त्र में यथायोग्य व्यवस्था करके उनके किए हुए कर्मों का फल देने से ईश्वर तथा इन कर्मों के भोग कराने के कारण वा विद्या और सब क्रियाओं के साधक होने से भौतिक अर्थात् संसारी वायु का ग्रहण किया है ||2||

स घा नो योग आभुवत्स राये स पुरन्ध्याम् | गमद्धाजेभिरा स नः ||3||
ऋग्वेद 1|5|2||

पदार्थ -
पूर्वोक्त इन्द्र परमेश्वर और स्पर्शवान् वायु हम लोगों के सब सुखों के सिद्ध करानेवाले और पदार्थों को प्राप्त करानेवाले योग तथा, वे ही उत्तम धन के लाभ के लिये, और वे अनेक शास्त्रों की विद्याओं से युक्त बुद्धि में प्रकाशित हों | इसी प्रकार वे उत्तम अन्न और विमान आदि सवारियों के सह वर्त्तमान, हम लोगों को उत्तम सुख होने का ज्ञान देता तथा यह वायु भी इस विद्या की सिद्धी में हेतु होता है ||3||

भावार्थ -
इस मन्त्र में भी श्लेषालङ्कार है | ईश्वर पुरुषार्थी मनुष्य का सहायकारी होता है आलसी का नहीं, तथा स्पर्शवान् वायु भी पुरुषार्थी ही से कार्य्यसिद्धि का निमित्त होता है क्योंकि किसी प्राणी को पुरुषार्थ के बिना धन वा वृद्धि का और इनके बिना उत्तम सुख का लाभ कभी नहीं हो सकता | इसलिये सब मनुष्यों को उद्योगी अर्थात् पुरुषार्थी अवश्य होना चाहिए ||3||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (11)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA