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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

लोककर्ता भगवान ही सच्चा पिता

ओ३म्
त्राता नो बोधि दद्दशान आपिरभिख्याता मर्डिता सोम्यानाम् |
सखा पिता पितृतमा: पितृणां लोकमुशते वयोध: ||
ऋग्वेद् 4.17.17

शब्दार्थ :
दद्दशान: पुन: पुन: दर्शन देता हुआ वह
त्राता = रक्षक होकर
न: = हमें
बोधि = सुझाता है
आपि: = बन्धु
अभिख्याता = सामने से बताने वाला है
सोम्यानाम् = सौम्य = शान्त स्वभावों को
मर्डिता = तृप्त् करने वाला है
सखा = सखा = मित्र
पिता = पिता
पितृणां = पालकों में से
पितृतमा: = सबसे अधिक पालक है
वयोधा: = जीवनदाता, कान्तिधारक, प्रकाशदाता
उशते = अभिलाषी को
लोकम् = प्रकाश
कर्त्ता+इम्+उ = देता ही है
वयोधा: = जीवनदाता प्रभु
उ = ही
उशते = भोग मोक्ष के अभिलाषी के लिए
लोकम् = संसार को
कर्त्ता+इम = बनाता ही है ||

पुन: पुन: दर्शन देता हुआ वह रक्षक होकर हमें सुझाता है | वही बन्धु सामने से बताने वाला है और वही सौम्य = शान्त स्वभावों को तृप्त करने वाला है, सखा, पिता, पालकों में से सबसे अधिक पालक है, वह् जीवनदाता, कान्तिधारक, प्रकाशदाता अभिलाषी को प्रकाश देता ही है अथवा जीवनदाता प्रभु ही भोग मोक्ष के अभिलाषी के लिए संसार को बनाता ही है ||

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)