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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (37)

प्रार्थना विषय

सोम रारन्धि नो ह्रदि गावो न यवसेष्वा | मर्य‌ इव स्व ओक्ये ||37||

व्याख्यान -

हे "सोम" सौम्य सौख्यप्रदेश्वर ! आप कृपा करके "रारन्धि, नः, ह्रदि" हमारे ह्रदय में यथावत् रमण करों | (दृष्टान्त) जैसे सूर्य की किऱण‌ विद्वानों का मन और गाय, पशु अपने-अपने विषय और घासादि में रमण करते हैं , वा जैसे "मर्यः, इव, स्व, ओक्ये" मनुष्य अपने घर में रमण करता है, वैसे ही आप सदा स्वप्रकाशयुक्त हमारे हृदय (आत्मा) में रमण कीजिये, जिससे हमको यथार्थ सर्वज्ञान और आनन्द हो ||37||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'