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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय (2)

(गतांक से आगे)

सन 1926 के 23 दिसम्बर को एक धर्मांध मुसलमान द्वारा स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या कर दी गई | आर्यजगत् में हाहाकार मच गया | उस समय वे आर्यजगत के सर्वमान्य सर्वोच्च नेता थे | देशभर से आर्यजन देहली में एकत्र हो गए | उस समय महात्मा नारायण स्वामी ने उस शवयात्रा का नेतृत्व किया | उन्हीं के शब्दों में "शव के साथ जो जलूस था, वह असाधारण था | उसमें एक लाख से कम आदमी न होंगे | जलूस को शमशान तक पहुँचाने में सात घण्टे लगे | उत्तम रीति से पुष्कल घृत सामग्री से उनकी अन्त्येष्टि की ग‍ई | अन्त्येष्टि के बाद महात्मा नारायण स्वामी ने उन्हें श्रद्धाञ्जली दी |

स्वामी श्रद्धानन्द जी की स्मृति में "स्वामी श्रद्धाननद स्मृति ट्रस्ट स्थापित किया गया | जिस किराये के मकान में स्वामी जी रहते थे , उस मकान को खरीदकर उसका नाम "श्रद्धानन्द बलिदान भवन" रखा गया | स्वामी जी उस समय "आर्य शुद्धि सभा" के प्रधान थे | उनके बाद महात्मा नारायण स्वामी को शुद्धि सभा का प्रधान चुन लिया गया और वे बलिदान भवन में रहने लगे | गर्मियों में आप रामगढ़ तल्ला कुछ महीनों के लिए अवश्य जाते |

color="orange">आर्य विरक्त (वानप्रस्थ एवं संन्यास) आश्रम की स्थापना -
क‍ई वर्षों से महात्मा नारायण स्वामी जी की इच्छा थी कि हरिद्वार में कोई अच्छी भूमि खरीद कर "आर्य वानप्रस्थ आश्रम" की स्थापना की जाय | बहुत से आर्य सज्जन इस शुभ कार्य में सहायता करने को उत्सुक थे | श्री खुशीराम जी, रिटायर्ड पोस्ट मास्टर (लाहोर), श्री तुलसी राम जी, श्री गंगाराम जी, चीफजज (टिहरी) ने आपके साथ पूरा सहयोग दिया व भूमिचयन में सहायता की | काफी विचार विमर्श के बाद गंग नहर के पश्चिमी तट पर सन् 1926 ई. में भूमि खरीद ली ग‍ई | नहर के दूसरी और गुरुकुल कांगड़ी का विस्तार हो चुका था | इस भूमि की रजिस्ट्री आर्य प्रतिनिधि सभा संयुक्त प्रांत के नाम से करा दी ग‍ई |

सर्वप्रथम महात्मा नारायण स्वामी जी व अन्य तीन महानुभावों ने कुटिया का निर्माण किया | इस समय कुछ आधारभूत नियम बनाए गए : -
1. भूमि आर्यप्रतिनिधि सभा सं.प्रा. की है | पर अन्य सब आन्तरिक अधिकार आश्रम प्रधान व अन्तरंग सभा वहन करेगी |
2. कुटी निर्माता के उत्तराधिकार को केवल एक पीढ़ी तक सीमित कर दिया गया | उसके बाद वह आश्रम की हो जाएगी |
3. इसके अतिरिक्त वानप्रस्थियों की दिनचर्या एवं आचार संहिता भी बनाई ग‍ई | इन नियमों पर चलकर वानप्रस्थी आर्यजन अपना समय, भलीभांति ईश्वर साधना, सेवा आदि कार्यों में लगा सकें | आज आर्य वानप्रस्थ आश्रम में लगभग 400 कुटिया हैं तथा अन्य बहुत सी सुविधाएं उपलब्ध है |

इस प्रकार सन् 1926 में महात्मा जी ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं आरम्भ कीं : -

font color="orange">आर्यवीर दल की स्थापना : - अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धाननद की हत्या से आर्यजनता में बहुत रोष व्याप्त हो गया था | यह निश्चय था कि उनकी हत्या एक बड़े षड़य‌न्त्र के अन्तर्गत कराई ग‍ई थी | जनता चाहती थी इस षड्यन्त्र का पर्दाफाश करके, दोषियों को पकड़ा जाय | सरकार ने इस विषय में कोई कदम नहीं उठाया | उसके विपरीत आर्यसमाज की सभाओं, नगर कीर्तनों में भी बाधाएं डालनी आरम्भ कर दीं | इन कारणों से आर्यजनों में असन्तोष उत्पन्न होना स्वभाविक था | इन सब कारणों से आर्य सार्वदेशिक सभा को कुछ निर्णय लेने पड़े | इन बातों पर विचार विनिमय करने के लिये आर्य महासम्मेलन करने का निश्चय किया गया |

पहला आर्य सम्मेलन देहली में आयोजित हुआ | इसमें समस्त देश की आर्य समाजों के प्रतिनिधि उपस्थित हुए |

इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ निर्णांयक कदम उठाए जाएं, जिसमें धरना, सत्याग्रह आदि शामिल हों | साथ ही इस कार्य के लिए 50,000 रु. एवं 10,000 स्वयं सेवक भी तैयार किये जायें | इन सब कार्यों को करने के लिए महात्मा नारायण को सर्वाधिकार दे दिया गया |

एक वर्ष के भीतर ही 10,000 से अधिक आर्यवीर तैयार हो गए | इनको बकायदा शिक्षित किया और अनुशासन की ट्रेनिंग दी ग‍ई | इस प्रकार से विधिवत् आर्यवीर दल की स्थापना हो ग‍ई |

आर्यसमाज बरेली : - जुलाई सन् 1925ई. में महात्मा जी ने प्रचारार्थ काश्मीर की यात्रा की | वहां का कार्य बीच में ही छोड़कर आना पड़ा क्योंकि बरेली आर्यसमाज पर पुलिस ने ताला लगा दिया था | कारण, ईद के दिन आर्यसमाज मन्दिर के सामने से गुजरते हुए जलूस ने आर्यसमाज में घुसकर तोड़फोड़ की थी | मुसलमान दरोगा ने इसमें आर्यसमाज का ही दोष माना और ताला लगाकर पहरा बिठा दिया | स्थानीय नेताओं को लेकर महात्मा जी नें वहां के बड़े-बड़े अधिकारियों से भेंट की और धमकी दी अगर कल तक आर्यसमाज मन्दिर से पहरा नहीं उठाया गया तो वे भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे | चार घण्टे में ही पहरा उठा लिया गया, ताला खोल दिया गया |

बिहार प्रान्त में : - बरेली का झगड़ा निपटा कर महात्मा जी बिहार की प्रचार यात्रा के लिए निकल पड़े | रांची में आर्यसमाज की और से उरांव जाति के उत्थान के लिए, उनके अन्धविश्वास मिटाने के लिए आर्य उपदेशक लगे हुए थे | उनको मदिरा मांस के दुर्गुण बताकर उन कुरीतियों से विमुख करने का भी प्रयास हो रहा था | विद्यार्थियों के लिए छात्रावास भी खोले गए थे | उरांवो में जागृति पैदा करने का प्रयास धीरे-धीरे असर कर रहा था | बिहार के अन्य कुछ आर्यसमाज मन्दिरों में उपदेश करके वे लौटे |

बिजनोर जिले के धामपुर कस्बे में पहुँचे | वहां उनकी भेंट पुलिस चौकी के एक चौकीदार से हुई | उसका नाम बहाल सिंह गूजर था | वह अनपढ़ था परन्तु आर्यसमाज के सत्संगों में जाने का शौक था | वहां उपदेश सुनसुन कर वह दृढ़ आर्य बन गया था | रात को गश्त लगाते हुए वह चिल्लाता "पांच सौ वर्षों से सोने वालो जागो" जब लोग इसका तात्पर्य पूछते तो कहता "इसका उत्तर तुम्हें सत्यार्थ-प्रकाश में मिलेगा" उस समय सत्यार्थ प्रकाश की कीमत ढ़ाई आने थी अर्थात दस पैसे थी उसने सैकड़ों सत्यार्थ प्रकाश मंगाकर बांटे | उसने क‍ईं आर्यसमाजों की स्थापना कराई | महात्मा नारायण स्वामी उसकी लगन व श्रद्धा देखकर बहुत प्रभावित हुए |

आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य‌ : - सन् 1930 ई. में दीपावली पर ऋषि निर्वाणोत्सव, चावड़ी बाजार, दिल्ली आर्यसमाज में खूब धूमधाम से मनाया गया | वहीं "आर्य नेताओं को राजनीति में आना चाहिये कि नहीं" इस विषय पर विचार विनिमय हुआ | कुछ महानुभावों का मत था कि आर्यसमाज को कंग्रेस के साथ मिलकर काम करना चाहिए | दूसरों का मत था कि आर्य समाज को राजनीति से पृथक रहना चाहिये |

उत्सव के प्रधान की हैसियत से महात्मा नारायण स्वामी जी ने आर्यसमाज की स्थिती के विषय में स्पष्ट दिशा निर्देश दिये |

"आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य" जैसा कि उसके नियमों में वर्णित है, संसार की शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करना है | इन तीनों में उन्नत होने के पश्चात मनुष्य उच्चकोटि का बन जाता है | अगर दूसरे शब्दों में कहा जाय तो आर्यसमाज का कार्य समस्त मनुष्यों को उन्नत बनाने का है अर्थात् आर्यसमाज को राजनीति में नहीं पड़ना चाहिये | इतने उच्च विचार और उद्देष्य रखते हुए, किस प्रकार आर्य समाज किसी देश विशेष व समुदाय में सिर न झुका कर अपने आपको समाविष्ट कर सकता है | आर्य समाज के नियमों पर चल कर शुद्ध पवित्र हृदय होने पर, आर्य समाज मनुष्य को पूरी स्वतन्त्रता देता है कि वह अपनी इच्छा और पुरुषार्थ के अनुसार कार्य करे | आर्यसमाज उनके किसी कार्य में बाधा नहीं डालता | वह चाहे राजनीति हो या धर्मप्रचार | कांग्रेस ने क्रान्तिकारियों के लिए अपने द्वार बन्द कर रखे हैं | हम उनका भी स्वागत करते हैं | वे जब चाहे आएं और आत्मा को शान्त एवं दृढ़ बनाने का प्रयत्न करें" |

(क्रमशः)

(आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर, (उतरांचल) के सौजन्य से)