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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदनित्यत्व‌विषयः (4)

‍गतांक से आगे -

जैसे शास्त्रों के प्रमाणों से वेद नित्य हैं, वैसे ही युक्ति से भी उनका नित्यपन सिद्ध होता है, क्योंकि 'असत् से सत् का होना अर्थात् अभाव से भाव का होना कभी नहीं हो सकता, तथा सत् का अभाव भी नहीं हो सकता | जो सत्य है उसी से आगे प्रवृति भी हो सकती है, और जो वस्तु ही नहीं है उससे दूसरी वस्तु किसी प्रकार से नहीं हो सकती |' इस न्याय से भी वेदों को नित्य ही मानना ठीक है | क्योंकि जिसका मूल नहीं होता है, उसकी डाली, पत्र, पुष्प और फल आदि भी कभी नहीं हो सकते | जैसे कोई कहे कि वन्ध्या के पुत्र का विवाह मैंने देखा, यह उसकी बात असम्भव है, क्योंकि जो उसके पुत्र होता तो वह वन्ध्या ही क्यों होती, और जब पुत्र ही नहीं है तो उसका विवाह और दर्शन कैसे हो सकते हैं ? वैसे ही जब ईश्वर में अनन्त विद्या है, तभी मनुष्यों को विद्या का उपदेश भी किया है | और जो ईश्वर में अनन्त विद्या न होती तो वह उपदेश कैसे कर सकता, और वह जगत् को भी कैसे रच सकता ? जो मनुष्यों को ईश्वर अपनी विद्या का उपदेश न करता तो किसी मनुष्य को विद्या, जो यथार्थ ज्ञान है सो कभी नहीं होता, क्योंकि इस जगत् में निर्मूल का होना व बढ़ना सर्वथा असम्भव है | इससे यह जानना चाहिये कि परमेश्वर‌ से वेदविद्या मूल को प्राप्त होके मनुष्यों में विद्यारूप वृक्ष विस्तृत हुआ है |

इसमें और भी युक्ति है कि जिसका सब मनुष्यों को अनुभव और प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, उसी का दृष्तान्त देते हैं - देखो कि जिनका साक्षात् अनुभव होता है उसी का ज्ञान में संस्कार होता है, संस्कार से स्मरण, स्मरण से इष्ट में प्रवृति और अनिष्ट से निवृति होती है, अन्यथा नहीं | जो संस्कृत भाषा को पढ़ता है उस के मन में उसी का संस्कार होता है, अन्य भाषा का नहीं, और जो किसी देशभाषा को पढ़ता है उसको देशभाषा का संस्कार होता है, अन्य का नहीं | इसी प्रकार जो वेदों का उपदेश ईश्वर न करता तो किसी मनुष्य को विद्या का संस्कार नहीं होता, जब विद्या का संस्कार न होता तो उसका स्मरण भी नहीं होता, स्मरण के बिना किसी मनुष्य को विद्या का लेश भी न हो सकता | इस युक्ति से क्या जाना जाता है कि ईश्वर के उपदेश से सुन पढ़ के और विचार के ही मनुष्यों को विद्या का संस्कार आज पर्यन्त होता चला आया है, अन्यथा कभी नहीं हो सकता |

(क्रमशः)

महर्षि दयानन्द सरस्वती
(महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत् ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षेप में उद्दृत्)
From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's RIGVED-ADI-BHASHYABHUMIKA
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