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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

विद्वान् भगवान का ध्यान करते हैं

ओउम् | यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण |
तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम् ||
ऋग्वेद 4|50|1

शब्दार्थ ‍-

यः.............................जिस
त्रिषधस्थः.....................त्रिलोकी में रहनेवाले
बृहस्पतिः.....................महान लोक-लोकान्तरों के पालक भगवान् ने
सहसा.........................शक्ति तथा
रवेण..........................आदेश से
ज्मः...........................संसार के
अन्ताऩ्.......................सिरों को
वि.............................विशेष रूप से
तस्तम्भ......................थाम रखा है
प्रत्नासः.........................पुराने, सनातन व्यवहारकुशल
ऋषयः.........................यथार्थदर्शी
विप्रा...........................मेधावी, ज्ञानी
दीध्यानाः......................ध्यान करते हुए
तम्...........................उस
मन्द्रजिह्वम्...................मस्ती के उपदेशक को
पुरः...........................आगे
दधिरे..........................धरते हैं, अर्थात् उसका ध्यान करते हैं |

व्याख्या -

मनुष्य का आदर्श बहुत ऊँचा होना चाहिए | छोटे आदर्शवाले मनुष्य छोटे ही रहते हैं | वेद में उपदेश आता है - उत्क्रामातः पुरुष‌ हे मनुष्य ! इस अवस्था से ऊपर उठ अर्थात् वर्त्तमान अवस्था पर ही सन्तोष करके नहीं रहना चाहिए, वरन् और अधिक उन्नति के लिए चेष्टा करनी चाहिए | अल्प में सुख नहीं है, अतः बड़ा बनने का, बड़ाई प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए | महात्मा सनत्कुमार ने नारद को ठीक ही बताया था - यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति (छान्दोग्य उपनिषद् 7|23|1) जो सबसे बड़ा है, वही सुख है, थोड़े में तो सुख है ही नहीं |

आओ ! महान् का अनुसन्धान करें | कोई छोटा-सा मिट्टी का ढेला हाथ में ले लो, फिर हाथ से ऊपर की और फैंक दो | क्या वह वहाँ रुक जाएगा ? नहीं नीचे ही आएगा | क्यों ? आकर्ष‌ण-शक्ति इसकी व्याख्या नहीं | जड़ पृथिवी आदि में यह सामर्थ्य कहाँ, यह ज्ञान कहाँ ? संसार में व्यवस्था तथा नियम सूचित कर रहे हैं कि कोई ऐसा नियामक है जो इस सारे संसार का संचालन कर रहा है और जिसमें सबको वश में रख‌ने का सामर्थ्य है, जिसे इस सबका यथार्थ ज्ञान भी है अर्थात् वह सर्ववशी, सर्वव्यापक तथा सर्वज्ञ है | मन्त्र के पूर्वाद्ध में उस महान का बखान है - यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण जिस त्रिषधस्थ बृहस्पति ने शक्ति तथा आदेश् से संसार के सिरों को विशेष रूप से थाम रखा है |

बृहस्पति=सबसे बड़े रक्षक ने लोकों के सिरों को थाम रखा है अर्थात् लोकों के अन्तों तक जिसकी पहुँच है | कैसे पहुँच है ? यह त्रिषधस्थः तीनों लोकों में एक-साथ रहता है अर्थात् वह सदा सर्वव्यापक है , कारण व कार्य्य दोनों में वह एक-समान विराजमान है | इससे भगवान् एकदेशी नहीं, वरन् सर्वदेशी है, यह सिद्ध हुआ | वह यह कार्य्य अपने सहज सामर्थ्य से कर रहा है | वह मन्द्रजिह्व है - मधुर उपदेशक है, उसके उपदेश मस्ति देते हैं | उपदेश ज्ञान के बिना नहीं हो सकता \ सर्वत्र रहनेवाले का ज्ञान भी सर्वव्यापक होना चाहिए | सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान् से अधिक महान् कौन है ? अतः सुखाभिलाषी ऋषि उसी का ध्यान करते हैं - तं प्रत्नासः ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम् | इसका एक भाव और भी है | पुरोधान् ‍- आगे धरने का एक अर्थ है - नेता बनाना, आदर्श बनाना | आदर्श जिसे बनाओ, वह मन्द्रजिह्व=मीठी जबानवाला हो | सचमुच भगवान् के उपदेश में कहीं भी कटुपन नहीं है | चारों वेद पढ़ जाइए, मिठास वहाँ मिलेगी | आलोचकों का कहना है, वेद के युद्ध सूक्तों में भी एक मिठास है, एक रस विशेष है |

क्या प्रत्येक मनुष्य भगवान् का ध्यान कर सकता है ? ध्यान करनेवाले में दो गुण होने चाहिएँ - एक ऋषित्व, दूसरा विप्रत्व | ऋषि का अर्थ है - ऋषिर्द‌र्शनात् - जिसको पदार्थों का यथार्थ ज्ञान हो गया है, जिसने प्रकृति के सत्व, रजस् और तमस् के बन्धन करने के गुण को देख लिया है, वह कैसे इस पाश में फँसेगा ? किन्तु होता यह है कि मनुष्य बार बार भूल जाता है | प्रकृति तथा प्रकृतिजन्य संसार में इतनी मोहकता, इतना आकर्षण है कि प्राकृतिक विषयों के सामने आने पर मनुष्य को सारा ज्ञान भूल जाता है, अतः केवल एक बार जान लेना ही पर्य्याप्त नहीं है वरन् उस ज्ञान को धारण करने का गुण भी होना चाहिए | उस गुण का नाम है विप्रत्व | विप्र कहते हैं मेधावी को, मेधा-बुद्धि वाले को | मेधा का अर्थ है धारणावती बुद्धि | इसी कारण यजुर्वेद (32|14) में अनेक स्थानों पर मेधा-बुद्धि-प्राप्ति के लिए प्रार्थना है - यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते | तया मामद्य मेधयाग्ने मेधविनं कुरु स्वाहा - जिस मेधा-बुद्धि का सेवन निष्काम विद्वान् तथा सकाम ज्ञानी करते हैं, हे उन्नतिदायक प्रभो ! उस मेधा-बुद्धि से युक्त करके मुझे भी मेधावी कीजिए | मेधा के बिना संसार का कार्य भी नहीं चल सकता | सच्चे मेधावी की पहचान ही यह है कि वह भगवान् का ध्यान करता हो |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)