करिष्मा एक कुदरत का ,हमें प्रभु ने दिया था
बस खाली इक लिफाफा था , न कुछ उसमें पड़ा था
सिवा कागज के टुकड़े के, न जिस पर कुछ लिखा था
न तो मजमून मालुम था ,न आता ही था कुछ लिखना
ये कैसा था तमाशा, जो कुदरत ने किया था
लिफाफा जब मिला हमको , तो चोड़े हो गये हम
न लिखा कुछ भी उसमें , बस मारी फूँक उसमें
उड़ाने फिर लगे हम , कि जैसे हों गुब्बारे
लगी फिर दौड़ ऐसी , मची कुछ होड़ ऐसी
बढ़ें आगे सभी से, सभी हों हमसे पीछे
वह कैसे पहुँचा आगे, निकालो फूँक उसकी
लगे तिकड़म लगाने, बुने फिर ताने बाने
बढ़ी जब मारामारी, हुआ फिर युद्ध भारी
हुए सब धाराशायी , निकल गई फूँक सारी
लिफाफा जो मिला था, वह पूरा फट चुका था
था कागज का जो टुकड़ा , वह पूरा गल चुका था
करिष्मा था ये कुदरत का जो पूरा घट चुका था
अब बारी थी नए की , या फिर पुनरावृती की
लिफाफा और पाने की , नई चाहत जगाने की
मानो या न मानो , यही वह था करिष्मा
जो कुदरत ने किया था
बस खाली इक लिफाफा
हमें प्रभु ने दिया था ||
Bakshi jee Your Kavita
Bakshi jee
Your Kavita करिष्मा is very nice. I enjoy it very well. Thanks
Tilak Grover Mckinney TX
धन्यवाद
धन्यवाद ग्रोवर जी, लिखते ,लिखते कभी हम लोग भी कवि बन जाएंगे |आप साथ ,साथ बने रहियेगा |
नमस्ते जी,
नमस्ते जी,
आप की कविता मे थी बहुत गहराई,
हमारी तो आँख ही भर आई|
आप की कविताये और लेख पढ़ने मे बहुत आनन्द प्राप्त होता है|
बहुत बहुत
बहुत बहुत धन्यवाद, आपकी कविता का आनन्द कम नहीं |समय निकाल कर अवष्य लिखें |
आनन्द