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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन सूक्त' पर टीका - ‍परिशिष्ट (2)

को अस्य बाहू समभरद् वीर्य करवादिति |
अंसौ को अस्य यद् देव कुसिन्धे अध्यादधौ ||5||

अर्थ - (वीर्य करवात् इति अस्य बाहू कः समभरत्) यह पराक्रम करे इसलिए इसके बाहू किसने भर दिये ? (कः देव:अस्य तत् अंसौ कुसिन्धे अध्यादधौ) किस देव ने इस (पुरुष) के उन कन्धो को धड़ में धर दिया है ?

कः सप्त खानि विततर्द शीर्षणि कर्णाविमौ नासिके चक्षण मुखम् |
येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्म‌नि चतुष्पादा द्विपदो यन्ति यायम् ||6||

अर्थ - (इमौ कर्णौ, नासिके चक्षणी मुखं सप्त खानि शीर्षणि कः विततर्द |) ये दोनो कान, दो नाक (के छिद्र), दो आंख और एक मुख मिलकर सात इन्द्रियगोलक सिर में किसने खोदे बनाये हैं ? (येषां विजयस्य मह्म‌नि चतुष्पादः द्विपदः यामंपुरुत्रा यति) जिनके विजय की महिमा में चार और दो पैर वाले प्राणी अनेक प्रकार से मार्ग चलते हैं |

हन्वोहिं जिह्वामदधात् पुरूचीमधा महिमधि शिश्राय वाचम् |
स आ वरीवति भुवनेष्वन्तरपो वसानः क उ तच्चिकेत ||7||

अर्थ - (हि पुरुचीं जिह्वा हन्वोः अदधात्) बहुत ही चलने वाली जीभ को दोनो जबड़ों के बीच में रख दिया है | (अधामहीं वाचं अधिशिश्राय) और प्रभावशाली वाणी को उसमें आश्रित किया है | (अपः वसानः स भुवनेषु अन्तः आवरीवर्ति) आकाश को आच्छादित करता हुआ वह सब भुवनों में परिपूर्ण हो रहा है | (क उ तत् चिकेत) कौन भला उसे जानता है ?

मस्तिष्कमस्य यतमो ललाटं ककाटिकां प्रथमो यः कपालम् |
चित्वा हन्वोः पुरुषस्य दिवं रुरोह कतमः स देवा ||8||

अर्थः - इस मनुष्य का मस्तिष्क, (ललाट माथा) (ककाटिकां) शिर का पिछला भाग, कपाल, (हन्वोःचित्यं) और दोनों जबड़ों के संचय को (यतमः प्रथमः चित्वा) जिस पहले देव ने बनाया | (य दिवं रुरोह) और जो दिव्य प्रकाश में चढ़ा हुआ है, (स देवः कतमः) वह देव कौन-सा है ?

प्रियाSप्रियाणि बहुला स्वपनं संबाधतन्द्रयः |
आनन्दानुग्रो नन्दांश्च कस्माद् वहति पुरुषः ||9||

अर्थ - बहुत प्रिय और अप्रिय फलों, निद्रा, (तन्द्रयः) थकावट, (संबाध) विघ्न-बाधाओं, आनन्दों (तन्दान् च) और प्रसन्नताओं को (उग्रः पुरुषः) तेजस्वी पुरुष (कस्माद् वहति) किस कारण से पाता है ?

आर्तिरवर्तिर्निर्ऋतिः कुता नु पुरुषेSमति |
राद्धिः समृद्धिरव्यृद्धिमतिरुदितयः कुतः ||10||

अर्थः - (आर्तिः) पीड़ा, (अवर्तिः) दरिद्रत:, (निर्ऋतिः) बीमारी, (अमतिः) कुमति, (पुरुषे कुतःनु) मनुष्य में कहाँ से आती है ? (राद्धिः) पूर्णता, (समृद्धिः) ऐश्वर्य, (अ+वि*ऋद्धिः) अन्यूनता=पूर्णता, (मतिः) बुद्धि और (उदितयः) उदयः=अभ्युदय की प्रवृति (कुतः) कहां से आयी है ?

(क्रमशः)