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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (12)

यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः |
तस्मा इन्द्राय गायत ||4||
ऋग्वेद 1|5|4||

पदार्थ - हे मनुष्यो ! तुम लोग (यस्य) जिस परमेश्वर व सूर्य्य के (हरी) पदार्थों को प्राप्त करानेवाले बल और पराक्रम तथा प्रकाश और आकर्षण (संस्थे) इस संसार में विद्यमान हैं, जिनके सहाय से (समत्सु) युद्धों में (शत्रवुः) वैरी लोग (न वृण्वते) अच्छी प्रकार बल नहीं कर सकते (तस्मै) उस (इन्द्राय) परमेश्वर वा सूर्य्यलोक को उनके गुणों की प्रशंसा कह और सुन के यथावत् जान लो ||4||

भावार्थ - इसमे श्लेषालङ्कार है | जबतक मनुष्य लोग परमेश्वर को अपना इष्ट देव समझनेवाले और बलवान् अर्थात् पुरुषार्थी नहीं होते तब तक उनको दुष्ट शत्रुओं की निर्बलता करने को सामर्थ्य भी नहीं होता ||4||

सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये |
सोमासो दध्याशिरः ||5||
ऋग्वेद 1|5|5||

भावार्थ - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है| जब ईश्वर ने सब जीवों पर कृपा करके उनके कर्मों के अनुसार यथायोग्य फल देने के लिये सब कार्य्यरूप जगत् को रचा और पवित्र किया है, तथा पवित्र करने करानेवाले सूर्य्य और पवन को रचा है, उसी हेतु से सब जड़ पदार्थ वा जीव पवित्र होते हैं | परन्तु जो मनुष्य पवित्र गुणकर्मों के ग्रहण से पुरूषार्थी होकर संसारी पदार्थों से यथावत् उपयोग लेते तथा सब जीवों को उनके उपयोगी कराते हैं, वे ही मनुष्य पवित्र और सुखी होते हैं ||5||

त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः |
इन्द्र ज्यैष्ठयाय सुक्रतो ||6||
ऋग्वेद 1|5|6||

भावार्थ - ईश्वर जीव के लिए उपदेश करता है कि - हे मनुष्य ! तू जब तक विद्या में वृद्ध होकर अच्छी प्रकार परोपकार न करेगा, तबतक तुझ को मनुष्यपन और सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति कभी न होगी, इससे तू परोपकार करनेवाला सदा हो ||6||

आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः |
शन्ते सन्तु प्रचेतसे ||7||
ऋग्वेद 1|5|7||

पदार्थ - हे धार्मिक (गिर्वणः) प्रशंसा के योग्य कर्म करनेवाले (इन्द्र) विद्वान जीव ! (आशवः) वेगादि गुण सहित सब क्रियाओं से व्याप्त (सोमासः) सब पदार्थ (त्वा) तुझ को (आविशन्तु) प्राप्त हों तथा इन पदार्थों को प्राप्त हुए, (प्रचेतसे) शुद्ध ज्ञानवाले (ते) तेरे लिये (शम्) ये सब पदार्थ मेरे अनुग्रह से सुख करनेवाले (सन्तु) हों ||7||

भावार्थ - ईश्वर ऐसे मनुष्यों को आशीर्वाद देता है कि जो मनुष्य विद्वान परोपकारी होकर अच्छी प्रकार नित्य उद्योग करके इन सब पदार्थों से उपकार ग्रहण करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है, वही सदा सुख को प्राप्त होता है अन्य कोई नहीं ||7||

त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो |
त्वां वर्धन्तु नो गिरः ||8||
ऋग्वेद 1|5|8||
भावार्थ - जो विश्व में पृथिवी सूर्य्य आदि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रचे हुए पदार्थ हैं, वे सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाले तथा धन्यवाद देने के योग्य परमेश्वर ही को प्रसिद्ध करके जनाते हैं कि जिससे न्याय और उपकार आदि ईश्वर के गुणों को अच्छी प्रकार जान के विद्वान् भी वैसे ही कर्मों में प्रवृत हों ||8||

अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्त्रिणम् |
यस्मिन विश्वानि पौंस्या ||9||
ऋग्वेद 1|5|9||

पदार्थ - जो (अक्षितोतिः) नित्य ज्ञानवाला (इन्द्रः) सब ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर है, वह कृपा करके हमारे लिये (यस्मिन्) जिस व्यवहार में (विश्वानि) सब (पौंस्या) पुरुषार्थ से युक्त बल है (इमम्) इस (सहस्त्रिणम्) असंख्यात सुख देनेवाले (वाजस्) पदार्थों के विज्ञान को (सनेत्) सम्यक् सेवन करावे, कि जिससे हम लोग उत्तम उत्तम सुखों को प्राप्त हों ||9||

भावार्थ - जिसकी सत्ता से संसार के पदार्थ बलवान होकर अपने अपने व्यवहारों में वर्त्तमान हैं, उन सब बल आदि गुणों से उपकार लेकर विश्व के नाना प्रकार के सुख भोगने के लिए हम लोग पूर्ण पुरुषार्थ करें, तथा ईश्वर इस प्रयोजन में हमारा सहाय करे, इसलिए हम लोग ऐसी प्रार्थना करते हैं ||9||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (11)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA