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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (38)

स्तुति विषय

गयस्फानो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः |
सुमित्रः सोम नो भव ||38||

व्याख्यान -

हे परमात्मभक्त जीवो ! अपना इष्ट जो परमेश्वर, सो "गयस्फानः" प्रजा, धन, जनपद और सुराज्य का बढ़ाने वाला है, तथा "अमीवहा" शरीर, इन्द्रियजन्य और मानस रोगों का हनन, विनाश करनेवाला है | "वसुवित्" सब पृथिव्यादि वसुओं का जाननेवाला है अर्थात् सवज्ञ और विद्यादि धन का दाता है, "पुष्टिवर्द्धनः" हमारे शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा की पुष्टि का बढ़ाने वाला है | "सुमित्रः, सोम, नो, भव" सुन्दर यथावत् सब का परममित्र वही है | सो हम उससे यह माँगें कि हे सोम सर्वजगुत्पादक । आप ही कृपा करके हमारे सुमित्र हो और हम भी सब जीवों के मित्र हों तथा अत्यन्त मित्रता आपसे भी रक्खें ||38||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'