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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय (3)

(गतांक से आगे)

उस समय देश के स्वतन्त्रता-संग्राम का नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथ में था | बहुत से आर्य नेता कांग्रेस के साथ मिलकर स्वतन्त्रता की लड़ाई में बराबर लडते रहे और बलिदान भी हुए | पर यह भी सत्य है कि आर्य समाज राजनीति से अलग रहा |

महात्मा नारायण स्वामी एवं अन्तरंग सभा का यह निर्णय समयोपयोगी एवं सही था |

महात्मा जी निरन्तर देश भर में आर्यसमाज के प्रचार व प्रसार कर्ते यात्राएं करते रहे | जहां भी आवश्यक्ता होती स्वास्थ्य का विचार किये बिना सेवा हेतु जा पहुँचते | बीच बीच में अस्वस्थता, विश्राम करने को बाधित करती थी | अगर कहा जाए तो कर्मठता का दूसरा नाम "नारायण स्वामी" था |

बिहार में भूकम्प : - 15 फरवरी सन् 1934 ई. को बिहार में भयंकर भूकंप आया | इस भूकंप में बिहार के अनेक नगर नष्ट हो गए | हजारों की जानें गई व करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो ग‍ई | उस समय महात्मा जी बरेली में बहुत बिमार थे | जाकर सेवा करने की बहुत इच्छा होने पर भी, अच्छा होने तक उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ी | लगभग एक महीने के बाद डाक्टर की आज्ञा लेकर, आपने बिहार के लिए प्रस्थान किया | वहां के हालात देखकर महात्मा जी को अतीव कष्ट हुआ, वहाँ की आर्यसमाज द्वारा किये गये राहत कार्यों को देखकर संतोष भी हुआ | स्थान स्थान पर कैम्प लगे थे व भोजन, दवाईयों की व्यवस्था की जा रही थी | रहने के लिए घरों का निर्माण किया गया था, शुद्ध पानी कि व्यवस्था की ग‍ई व अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय खोले गये थे |

महात्मा नारायण स्वामी ने वहां पन्द्रह दिन रहकर सब व्यवस्था देखी और संतोष अनुभव किया कि आर्यसमाजी भी इसप्रकार निष्ठा से सेवा व्यवस्था सुचारु रूप से कर सकते हैं |

उन्हीं दिनों महात्मा गांधी भी बिहार आए हुए थे | जगह-जगह पर उनकी सभाएं हो रही थीं | अपने भाषण में वे कहा करते थे कि यह भूकंप बिहार वासियों के कर्मों का फल है अर्थात् सवर्णों द्वारा अछूतों पर किए गए अत्याचारों का फल" |

नारायण स्वामी जी को महात्मा गांधी का यह कथन न्याय, तर्क और शास्त्रों के विरुद्ध लगा | उनकी सम्मति में तीन प्रकार के दुख (आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक) में से केवल आध्यात्मिक दुःख मनुष्योंके कर्मों का फल हुआ करते हैं, बाकी दो प्राकृतिक नियमों की गतिविधियों से हुआ करते हैं | उनमें मनुष्य के कर्म का कोई भी हिस्सा नहीं होता | अगर यह उच्चजाति के लोगो‍ं के अत्याचार का फल था, तो नीची जाति वालों को यह कष्ट क्यों झेलने पड़े | बल्कि नीची गरीब जातियों को ऊंची जातियों की अपेक्षा अधिक ही कष्ट सहने पड़े | उसके बाद महात्मा नारायण स्वामी ने महात्मा गांधी के इस कथन का कि "यह भूकंप बिहार की जनता का कर्मफल है", अपने भाषणों में जमकर खंडन किया और इसे अन्धविश्वास से प्रेरित बताया |

महात्मा जी के इस कथन को बंगाल एवं बिहार के क‍ई समाचार पत्रों नें विस्तार से छापा | उनके इन विचारों की प्रतिक्रिया अच्छी रही |

अल्मोड़ा में आर्यसमाज की स्थापना व विस्तार‌ : - 20 म‍ई 1920 में रामगढ़ तल्ला में नारायण आश्रम की नींव रखी ग‍ई थी | उसके बाद प्रतिवर्ष कुछ महीनों के लिए वे नारायण आश्रम अवश्य जाते और अपना समय स्वाध्याय, पठन, पाठन, लेखन व योगाभ्यास में बिताते थे | साथ ही पहाड़ के छोटे-बड़े शहर, गावों में जाकर लोगों को समझाने का कार्य भी करते | स्थान स्थान पर निमन्त्रित किये जाते रहे | इन्हीं दिनों आपने अलमोड़ा में आर्य समाज की स्थापना की | अन्य क‍ई स्थानों पर साप्ताहिक सत्संगों द्वारा आर्यसमाज का प्रचार किया करते | उन गावों में उन्होंने सामाजिक कुरीतियां उखाड़ फैंकने का प्रयत्न किया और विधवा विवाह स्वयं कराये |

नारायण आश्रम में वे जब रहने जाते तो गांव के बच्छों को पढ़ाया भी करते | सब श्रेणियों के, विविध विषयों के विद्यार्थी अपनी जिज्ञासा शान्त करने करने हेतु उनके पास आया करते | प्रारम्भ से ही आपकी शिक्षा के प्रति रुचि रही | आपने क‍ई ब्रह्मचारियों की अर्थिक सहायता भी की | उनके आवास व भोजन की व्यवस्था भी की |

युवकों पर प्रभाव‌ : - एक बार वे फैजाबाद आर्यसमाज गये | वहां आपके सामने एक समस्या रखी ग‍ई | वहां के आर्यजन उसका समाधान नहीं कर पा रहे थे | समस्या यह थी कि एक साधारन हिन्दू परिवार का लड़का रामचन्द्र, आजमगढ़ मिशन स्कूल में पढ़ रहा था | विद्यार्थी मेधावी था | वहीं के प्रिंसिपल पादरी जे. एल. एलन ने उसे ऐसा समझाया कि वह ईसाई धर्म स्वीकार करने को तत्पर हो गया | उसके पिता उसे आर्यसमाज ले आए | रामचन्द्र के मन में जो शंकाएं थी वह उनका उत्तर चाहता था | पर वहां कोई उसकी शंकाओं का समुचित समाधान न कर सका | महात्मा जी ने देखा कि लड़के के दिमाग में हिन्दू धर्म के लिए विष घोला गया है | उसके पिता से आज्ञा लेकर वे उसे आजमगढ़ से फैजाबाद ले आए |

पादरी को रामचन्द्र के ईसाई होने पर इतना विश्वास था कि उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर कोई रामचन्द्र का विश्वास इसाई धर्म से उठा देगा तो वे मिशन का काम छोड़ देंगे |

महात्मा नारायण स्वामी रामचन्द्र को अपने साथ गुरुकुल वृन्दावन ले आए | वहां आकर उन्होंने उसे दोनों धर्मों के बारे में बताया व अन्तर समझाया | वैदिक धर्म की विशेषताएं ह्रदयांकित करवा दी | वह ईसाई धर्म को भूल गया | जब पादरी साहब को यह पता चला तो महात्मा जी से आज्ञा लेकर रामचन्द्र से मिलने आए और समझा-बुझाकर साथ ले जाना चाहा | पर रामचन्द्र पर अब वैदिक धर्म का रंग इतना चढ़ चुका था कि उसने जाने से साफ इन्कार कर दिया | महात्मा जी ने उसे शिक्षा के लिए मुल्तान भेज दिया | वहां उसने शास्त्री तक की पढ़ाई की | उसका सारा व्यय महात्मा जी वहन करते रहे |

ऐसे ही एक विद्यार्थी मनुदत्त महात्मा जी के पास आया | उसकी आयु पन्द्रह..सोलह वर्ष रही होगी | उसके पिता उसका विवाह उन्नीस वर्ष की कन्या से कर रहे थे, वह अभी पढ़ना चाहता था | महात्मा जी ने पहले तो उसके पिता को बहुत समझाना चाहा, जब वे राजी नहीं हुए तो उन्होंने उस लड़के को छात्रवृत्ति देकर लाहोर भेज दिया | वहीं से उसने शास्त्री परीक्षा पास की | घर लौटकर विवाह किया |

(क्रमशः)
(आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर, (उतरांचल) के सौजन्य से)