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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदनित्यत्व‌विषयः (5/5)

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's RIGVED-ADI-BHASHYABHUMIKA

प्र. - मनुष्यों की स्वभाव से जो चेष्टा है, उसमें सुख और दुःख का अनुभव भी होता है, उससे उत्तर उत्तर काल में क्रमानुसार से विद्या की वृद्धि भी अवश्य होगी, तब वेदों को भी लोग रच लेंगे, फिर ईश्वर ने वेद रचे, ऐसा क्यों मानना ?

उ. - इसका समाधान वेदोत्पत्ति के प्रकरण में कर दिया है | वहां यही निर्णय किया है कि जैसे इस समय में अन्य विद्वानों से पढ़े बिना कोई भी विद्यावान् नहीं होता और इसी के बिना किसी पुरुष में ज्ञान की वृद्धि भी देखने में नहीं आती, वैसे ही सृष्टि के आरम्भ में ईश्वरोपदेश की प्राप्ति के बिना किसी मनुष्य की विद्या और ज्ञान की बढ़ती कभी नहीं हो सकती | इसमें अशिक्षित बालक और वन-वासियों का दृष्टान्त दिया था, कि जैसे उस बालक और वन में रहने वाले मनुष्य को यथावत् विद्या का ज्ञान नहीं होता, तथा अच्छी प्रकार उपदेश के बिना उनको लोक व्यवहार का भी ज्ञान नहीं होता, फिर विद्या की प्राप्ति तो अत्यन्त कठिन है | इससे क्या जानना चाहिये कि परमेश्वर के उपदेश वेदविद्या आने के पश्चात ही मनुष्यों को विद्या और ज्ञान की उन्नति करनी भी सहज हुई है, क्योंकि उसके सभी गुण सत्य [नित्य] हैं | इससे उसकी विद्या जो वेद हैं वह भी नित्य ही हैं |

जो नित्य वस्तु है उसके नाम गुण और कर्म भी नित्य ही होते हैं, क्योंकि उनका आधार नित्य है | और बिना आधार के नाम, गुण और कर्मादि स्थिर नहीं हो सकते, क्योंकि वे द्रव्यों के आश्रय सदा रहते हैं | जो अनित्य वस्तु है , उसके नाम, गुण और कर्म भी अनित्य होते हैं | सो नित्य किसको कहना ? जो उत्पत्ति और विनाश से पृथक है | तथा उत्पत्ति क्या कहाती है ? कि जो अनेक द्रव्यों के संयोग विशेष से स्थूल पदार्थ का उत्पन्न होना | और जब वे पृथक् पृथक् होके उन द्रव्यों के वियोग से जो कारण में उनकी परमाणुरूप अवस्था होती है, उसको विनाश कहते हैं | और जो द्रव्य संयोग से स्थूल होते हैं वे चक्षु आदि इन्द्रियों से देखने में आते हैं | फिर उन स्थूल द्रव्यों के परमाणुओं का जब वियोग हो जाता है, तब सूक्ष्म के होने से वे द्रव्य देख नहीं पड़ते, इसका नाम नाश है | क्योंकि अदर्शन को ही 'नाश' कहते हैं | जो द्रव्य स‍योग और वियोग से उत्पन्न और नष्ट होता है , उसी को कार्य्य और अनित्य कहते हैं, और जो संयोग वियोग से अलग है उसकी न कभी उत्पत्ति और न कभी विनाश होता है | इस प्रकार का पदार्थ एक परमेश्वर और दूसरा जगत का कारण है, क्योंकि वह सदा अखण्ड एकरस ही बना रहता है | इसी से उसको 'नित्य' कहते हैं | इसमें कणादमुनि के सूत्र का भी प्रमाण है -

(सदकार...) जो किसी का कार्य्य है कि कारण से उत्पन्न होके विद्यमान होता है उसको अनित्य कहते हैं | जैसे मट्टी से घड़ा होके वह नष्ट भी हो जाता है | इसी प्रकार परमेश्वर के सामर्थ्य कारण से सब जगत् उत्पन्न होके विद्यमान होता है, फिर प्रलय में स्थूलाकार नहीं रहता किन्तु वह कारणरूप तो सदा ही बना रहता है | इससे क्या आया कि जो विद्यमान हो और जिसका कारण कोई भी न हो अर्थात् स्वयं कारणरूप ही हो, उसको 'नित्य' कहते हैं |

क्योंकि जो जो संयोग से उत्पन्न होता है सो सो बनाने वाले की अपेक्षा अवश्य रखता है | जैसे कर्म, नियम और कार्य्य ये सब कर्त्ता, नियन्ता और कारण को ही सदा जनाते हैं | और जो कोई ऐसा कहे कि कर्त्ता को भी किसी ने ब‌नाया होगा तो उससे पूछना चाहिये उस कर्त्ता के कर्त्ता को किसने बनाया है ? इसी प्रकार यह अनवस्था प्रसंग अर्थात् मर्यादा रहित होता है | जिसकी मर्यादा नहीं है, वह व्यवस्था के योग्य नहीं ठहर सकता | और जो संयोग से उत्पन्न होता है, वह प्रकृति और परमाणु आदि के संयोग करने में समर्थ ही नहीं हो सकता | इससे क्या आया कि जो जिससे सूक्ष्म होता है वही उसका आत्मा होता है, अर्थात् स्थूल में सूक्ष्म व्यापक होता है | जैसे लोहे में अग्नि प्रविष्ट होके उसके सब अवयवों में व्याप्त होता है, और जैसे जल पृथ्वी में प्रविष्ट होके उसके कणों के संयोग से पिंड करने में हेतु होता है तथा उसका छेदन भी करता है, वैसे ही परमेश्वर सब संयोग वियोग से पृथक, सब में व्यापक, प्रकृति और परमाणु आदि से भी अत्यन्त सूक्ष्म और चेतन है, इसी कारण से प्रकृति और परमाणु आदि द्रव्यों के संयोग करके जगत् को रच सकता है | जो ईश्वर उनसे स्थूल होता तो उनका ग्रहण और रचन कभी नहीं कर सकता, क्योंकि जो स्थूल पदार्थ होते हैं वे सूक्ष्म पदार्थों के नियम करने में समर्थ नहीं होते | जैसे हम लोग प्रकृति और परमाणु आदि के संयोग और वियोग करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि जो संयोग वियोग के भीतर है, वह उसके संयोग वियोग करने में समर्थ नहीं हो सकता |

तथा जिस वस्तु से संयोग वियोग का आरम्भ होता है वह वस्तु संयोग और वियोग से अलग ही होता है, क्योंकि वह संयोग और वियोग के नियमों का कर्त्ता और आदिकारण होता है, तथा आदिकारण के अभाव से संयोग और वियोग का होना ही असम्भव है | इससे क्या जानना चाहिये कि जो सदा निर्विकारस्वरूप, अज, अनादि, नित्य, सत्यसामर्थ्य से युक्त और अनन्तविद्यावाला ईश्वर है, उसकी विद्या से वेदों के प्रकट होने और उसके ज्ञान में वेदों के सदैव वर्त्तमान रहने से वेदों को सत्यार्थयुक्त और नित्य सब मनुष्यों को मानना योग्य है | यह संक्षेप से वेदों के नित्य होने का विचार किया |

इति वेदानां नित्यत्वविचारः ||

महर्षि दयानन्द सरस्वती
(महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत् ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षेप में उद्दृत्)