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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सत्य को पहचान

ओउम् | ऋतं चिकित्व ऋतमिच्चिकिद्ध्यृतस्य धारा अनु तृन्धि पूर्वीः |
नाहं यातुं सहसा न द्वयेन ऋतं सपाम्यरुषस्य वृष्णः ||
ऋग्वेद 5|12|2

शब्दार्थ -

हे ऋतं, चिकित्वः............सत्यज्ञानभिलाषिन् !
ऋतम्, इत्...................ऋत् को ही, सत्य को ही
चिकिद्धि.......................बार-बार जान |
ऋतस्य.......................ऋत की, सत्य की
पूर्वीः..........................पुरातन, सनातन से चली आई
धाराः.........................धाराओं को
अनु तृन्धि....................अनुकूलता से फोड़ |
अहम्.........................मैं
यातुम्........................यातु = राक्षस को
न.............................न तो
सहसा........................बल से और‌
न.............................न ही
द्वयेन.........................दोगली चाल से प्राप्त होता हूँ, वरन् मैं
अरुषस्य......................रोषर‌हित
वृष्णः.........................सुखवर्षक भगवान् के
ऋतम्........................ऋत् = सत्य-सृष्टिनियम को
सपामि.......................धारण करता हूँ |

व्याख्या -

मनुष्य को सम्बोधन करते हुए भगवान् ने उसे ऋतं चिकित्वः सत्यज्ञानाभिलाषी कहा है | जो मनुष्य इस मनुष्य-तन को पाकर सत्य का अनुसन्धान नहीं करता, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है | मनुष्य के सामने सत्यासत्य दोनों आते हैं, जैसा कि वेद कहता है - सुविज्ञानां चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते | [ऋ. 7|104|12] उत्तम ज्ञान के अभिलाषीजन के सामने सत्य और असत्य वचन एक-दूसरे को दबाते हुए आते हैं | समझदार मनुष्य असत्य को अमङ्गल मान त्याग देता है | तयोर्यत्सत्यं यतरदृजीयस्तदित्सोमोSवति हन्त्यासत् [ऋ. 7|104|12] उनमें जो सत्य है, जो अधिक सरल है, शान्ति का अभिलाषी उसे पसन्द करता है और असत्य को त्याग देता है | सत्य की पहचान भी भगवान् नें बता दी | सत्य ऋजु होता है, सरल है, अर्थात् असत्य टेढ़ा होता है, कुटिल होता है |

इस अशान्ति के सागर में जिसे शान्ति की कामना हो वही सुविज्ञान् का अभिलाषी है | सुविज्ञान के अभिलाषी को, शान्ति की कामनावाले को सत्य पसन्द करना चाहिए | पसन्द से पूर्व सत्य का ज्ञान भी तो होना चाहिए, अतः प्रकृत मन्त्र कहता है - ऋतमिच्चिकिद्धि ऋत को ही, सत्य को ही बार-बार जान | सत्य आज की वस्तु नहीं है, यह सनातन है, सदा से चला आता है, अतः वेद कहता है - ऋतस्य धारा अनुतृन्धि पूर्वीः | ऋत की सनातन धाराओं को अनुकूलता से फोड़, अर्थात् ऋत का रहस्य जान, सत्य का मर्म पहचान | वेद नीतियुक्त, असत्यमिश्रित सत्य का विरोधी है और नितान्त निर्भ्रान्त सत्य का प्रचारक है, अतः शब्द का प्रयोग करता है | ऋत=सृष्टिनियम सदा से है और एकरस है | धार्मिकजन कभी भी दोरुखी चाल नहीं ‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍चला करते, वरन् वे सदा सत्य का अनुगमन करते हैं | इसी बात को अतीव सुन्दर शब्दों में उतरार्ध में कहा गया है -

नाहं यातुं सहसा न द्वयेन ऋतं सपाम्यरुषस्य वृष्णः ||

न मैं हठ से और न दोरुखी चाल से, राक्षस को अपनाता हूँ, वरन् मैं तो रोषरहित सुखवर्षक के ऋत को धारण करता हूँ | भगवान् सुखवर्षक हैं, वे रोषरहित हैं | उनका ऋत भी सुखवर्षक तथा रोषरहित है | इस ऋत को, अबाधित सत्य को जानना, पहचानना, मानना तथा धारण करना चाहिए |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
( स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)