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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप(1) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *

उपासना शब्द भगवान के नाम कीर्तन में प्रसिद्ध है | नाम कीर्तन कई प्रकार से किया जाता है | रागी लोग उसे गा गा कर और बाजे बजा बजा कर करते हैं | एकान्त में आसन लगा कर जप को भी उपासना का साधन माना जाता है | जप भी मानसिक वाचिक दो प्रकार से किया जाता है | मानसिक जप ही 'अजपा जाप' के नाम से प्रसिद्ध है | महर्षि पतङ्जलि ने नाम के जप के स्थान में अर्थ की पुनरावृति को महत्व दिया है | उन्होंने लिखा है : - "तज्जप‌स्तदर्थ भावनम्" || योग समाधि पाद 28|| प्रणव के अर्थ का बार बार मनन करना ही जप है | 'प्रणव' ओउम् अक्षर को कहते हैं | 'ओउम्' ही 'ईश्वर का नाम है' ऐसा महर्षि पतङ्जलि का मन्त‌व्य है | उन्होंने लिखा है 'तस्य वाचकः प्रणवः' || योग समाधि पाद 27 || ईश्वर का नाम प्रणव है | तो क्या इस नाम का बार बार उच्चारण करें तो जप का लक्ष्य पूरा हो जायेगा | इसके उत्तर में ही महर्षि ने ऊपर के सूत्र में प्रकाश डाला है | उन्होंने उत्तर दिया है कि 'प्रणव' के नाम का उच्चारण ही नहीं 'प्रणव' के अर्थ का बार बार मनन करोगे, उस अर्थ से अन्तःकरण को भावित करोगे तो जप का लक्ष्य पूरा होगा |

इस प्रकार महर्षि पतङ्जलि ने जप नाम के उपासना के क्षेत्र में आमूल चूल परिवर्तन कर दिया है | नाम कीर्तन के स्थान पर ईश्वर के गुणों से आत्मा को विभूषित करना ही उन्होंने उपासना का प्रकार निश्चित किया है | यद्यपि नाम कीर्तन और नाम के भावार्थ का ज्ञान ये दोनों भी उपासना के भेद हैं | परन्तु ये दोनों विधियें इस तीसरी अवस्था तक पहुँचने की साधन मात्र हैं | महर्षि पतङ्जलि के इस विचार का आधार हम वेद को मानते हैं | तथा उसी आधार को पाठकों के सामने उपस्थित करने के लिए ऋग्वेद का एक प्रसंग उद्धृत करते हैं | वेदों में इस भाव को स्पष्ट करने वाले अनेक स्थानों पर अनेक प्रसंग मिलते हैं | उनमें से इस एक प्रसंग को ही हम यहां उपस्थित करने का प्रयत्न करेंगे | मन्त्र है : -

गायन्ति त्वा गायत्रिणोSर्चन्त्यर्कमर्किणः |
ब्रह्मास्त्वा शत क्रत उद्वंश मिवयेमिरे ||ऋ. 1|10|1||

अर्थ - (शतक्रतो) हे अनन्त कर्म करने वाले तथा अनन्त ज्ञान के भण्डार, भगवन् ! (त्वा) तेरी (गायत्रिणः) स्तोत्रगान के जानने वाले (गायन्ति) स्तोत्र गान द्वारा उपासना करते हैं | (अर्किणः) ऋचाओं के अर्थों के विशेषज्ञ (अर्कम्) पूज्य आपकी (अर्चन्ति) अर्थ ज्ञान के द्वारा उपासना करते हैं | (ब्राह्मणः) ब्रह्मविद्या से विभूषित लोग (त्वा) तेरी उपासना कर (वशंम्) ब्रह्मविद्या के कुलों अर्थात् संस्थानों को (उद्येमिरे इव) मानो उद्यमी बना रहे हैं - अर्थात् उन्हें उ‍ँचे उठा रहे हैं |

इस मन्त्र में तीन प्रकार के उपासकों का वर्णन है | तीनों के नाम हैं गायत्रिणः, अर्किणः और ब्रह्माणः | इनमें से गायत्री लोग मन्त्रों के गान के द्वारा भगवान के नाम का गान करते हैं | अर्की लोग ऋचाओं के अर्थ का का ज्ञान प्राप्त कर भगवान् के नाम के महत्व को जान उस महत्व का ज्ञान रूप ही भगवान् का पूजन करते हैं | और ब्रह्मा अर्थात् वे लोग जिन्होंने ब्रह्मविद्या अर्थात् ब्रह्म के गुणों से अपनी आत्मा को अलंकृत कर लिया है वे न केवल अपना ही निर्माण कर रहे हैं प्रत्युत ब्रह्मविद्या के कुलों अर्थात् संस्थानों का भी उत्थान कर रहे हैं |

इन उपासकों में प्रथम श्रेणी के उपासक की उपासना का कोई विशेष फल मन्त्र में नहीं आया | परन्तु गान के द्वारा उपासना का निर्देश अवश्य किया गया है | इससे प्रतीत होता है कि उपासक की यह प्रथम अवस्था उसे आगे बढ़ने का सन्देश दे रही है | वह अब मन्त्र गान से आगे बढ़ कर मन्त्रों के अर्थ का ज्ञान प्राप्त करने का यत्न कर रहा है | और यह ही इसके इस गान का फल है |

उपासक ने अपनी इस दूसरी अवस्था में पहुँच कर मन्त्रों के अर्थ का ज्ञान आरम्भ कर दिया है | मन्त्रों के अर्थ जानने पर ही उसे भगवन के गुणों का बोध होता है, और वह बोध ही उसका भगवान का पूजन है | परन्तु उपासक की इस उपासना के फल का निर्देश भी मन्त्र में नहीं दिया गया | इससे प्रतीत होता है कि उपासक की यह अवस्था भी इसे आगे बढ़ने का आदेश दे रही है | और वह आगे बढ़ना है भगवान् के गुणों से अपनी आत्मा को अलंकृत करना, और वह ही उपासक की दूसरी अवस्था अर्थात् उस के मन्त्रार्थ ज्ञान का फल है |

उपासक का तीसरी अवस्था में ब्रह्मा नाम होता है | यहां वह न गाता है और न केवल नाम के अर्थों का ज्ञान ही कर रहा है | यहां वह अपने जाने हुए भगवान् के एक एक गुण से अपनी आत्मा को अलंकृत करता हुआ आगे बढ़ रहा है | यह ही है इसकी वास्तविक उपासना | इसी के द्वारा अपने प‌रम् उत्थान के लिए इसकी आत्मा का निर्माण होता है | इस उपासक की उपासना के यहां दो फल दिखालाये गये हैं | उनमें से एक यह कि उसको ब्रह्मा की उपाधी मिल ग‍ई है यह उसका एक सार्थक नाम है | 'ब्रह्म' के गुणों को धारण करने से ही उसका नाम 'ब्रह्मा' पड़ा है | और दूसरा फल है ब्रह्म विद्या के वंश कुलों अर्थात् संस्थानों का उत्थान |

(क्रमशः)