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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (13)

युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः | रोचन्ते रोचना दिवि ||

ऋग्वेद 1|6|1||

पदार्थ -
.....
जो मनुष्य (अरुष‌म्) दृष्टिगोचर में रूप का प्रकाश करने तथा अग्निरूप होने से लाल गुणयुक्त (चरन्तम्) सर्वत्र गमन करने वाले (ब्रध्नम्) महान सूर्य्य और अग्नि को शिल्पविद्या में (परियुञ्जन्ति) सब प्रकार से युक्त करते हैं वे जैसे (दिवि) सूर्य्यादि के गुणों के प्रकाश में पदार्थ प्रकाशित होते हैं, वैसे (रोचना) तेजस्वी होके (रोचन्ते) नित्य उत्तम उत्तम आनन्द से प्रकाशित होते हैं ||1||

भावार्थ -

जो लोग विद्यासम्पादन में निरन्तर उद्योग करने वाले होते हैं, वे ही सब सुखों को प्राप्त होते हैं | इसलिए विद्वान् को उचित है कि पृथिवी आदि पदार्थों से उपयोग लेकर सब प्राणियों को लाभ पहुंचावे कि जिस से उनको भी सम्पूर्ण सुख मिलें ||1||

युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे | शोणा धृष्णु नृवाहसा ||2||
ऋग्वेद 1|6|2||

पदार्थ -

जो विद्वान (अस्य) सूर्य्य और अग्नि के (काम्या) सब के इच्छा करने योग्य (शोणा) अपने अपने वर्ण के प्रकाश करनेहारे व गमन के हेतु (धृष्णु) दृढ़‌ (विपक्षसा) विविध कला और जल के चक्र घूमनेवाले पांखरूप यन्त्रों से युक्त (नृवाहसा) अच्छी प्रकार सवारियों में जुड़े हुए मनुष्यादिकों को देशदेशान्तर में पहुँचानेवाले (हरी) आकर्षण और वेग तथा शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष‍रूप दो घोड़े जिनसे सब का हरण किया जाता है , इत्यादि श्रेष्ठ गुणों को पृथिवी, जल और आकाश में जाने आने के लिए अपने अपने रथों में (युञ्जन्ति) जोड़ें ||2||

भावार्थ -

ईश्वर उपदेश करता है कि - मनुष्य लोग जबतक भू जल आदि पदार्थों के गुण और उनके उपकार से भू जल और आकाश में जाने आने के लिये अच्छी सवारियों को नहीं बनाते, तब तक उनको उत्तम राज्य और धन आदि उत्तम सुख नहीं मिल सकते ||2||

केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्य्या अपेशसे | समुषद्भिरजायथाः ||3||
ऋग्वेद 1|6|3||

पदार्थ -

(मर्य्याः) हे मनुष्य लोगो ! जो परमात्मा (अकेतवे) अज्ञानरूपी अन्धकार के विनाश के लिये (केतुम्) उत्तम ज्ञान और (अपेशसे) निर्धनता दारिद्र्य तथा कुरूपता विनाश के लिये (पेशः) सुवर्ण आदि धन और श्रेष्ठ रूप को (कृण्वन्) उत्पन्न करता है, उसको तथा सब विद्याओं को (समुषद्भिः) जो ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्तनेवाले हैं उनसे मिल मिल कर जान के (अजायथाः) प्रसिद्ध हूजिये | तथा हे जानने की इच्छा करनेवाले मनुष्य ! तू भी उस परमेश्वर के समागम से (अजायथाः) इस विद्या को अवश्य प्राप्त हो ||3||

भावार्थ -

मनुष्यों को प्रति रात्रि के चौथे प्रहर में आलस्य छोड़कर फुरती से उठ कर अज्ञान और दरिद्रता के विनाश के लिए प्रयत्नवाले होकर तथा परमेश्वर के ज्ञान और संसारी पदार्थों से उपकार लेने के लिये उत्तम उपाय सदा करना चाहिये ||3||

आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे | दधाना नाम यज्ञियम् ||4||
ऋग्वेद 1|6|4||

पदार्थ -

जैसे (मरुतः) वायु (नाम) जल और (यज्ञियम्) यज्ञ के योग्य देश को (दधाना:) सब पदार्थों को धारण किये हुए (पुनः) फिर फिर (स्वधामनु) जलों में (गर्भत्वम्) उनके समूहरूपी गर्भ को (एरिरे) सब प्रकार से प्राप्त होते कंपाते, वैसे (आत्) उसके उपरान्त वर्षा करते हैं; ऐसे ही बार बार जलों को चढ़ाते वर्षाते हैं ||4||

भावार्थ -

जो जल सूर्य्य वा अग्नि के संयोग से छोटा छोटा हो जाता है, उसको धारण कर और मेघ के आकार का बना के वायु उसे फिर वर्षाता है, उसी से सबका पालन और सबको सुख होता है ||4||

बीळु चिदारूजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र बह्निभिः | अविन्द उस्त्रिया अनु ||5||
ऋग्वेद 1|6|5||

पदार्थ -

(चित्) जैसे मनुष्य लोग अपने पास के पदार्थों को उठाते धरते हैं, (चित्) वैसे ही सूर्य्य भी (बीळु) दृढ़ बल से (उस्त्रियाः) अपनी किरणों करके संसारी पदार्थों को (अविन्दः) प्राप्त होता है, (अनु) उसके अनन्तर सूर्य्य उन‌को छेदन करके (आरुजत्नुभिः) भंग करने और (बह्निभिः) आकाश आदि देशों में पहुँचानेवाले पवन के साथ ऊपर नीचे करता हुआ (गुहा) अन्तरिक्ष अर्थात् पोल में सदा च‌ढ़ाता गिराता रहता है ||5||

भावार्थ -

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | जैसे बलवान् पवन अपने वेग से भारी-भारी दृढ़ वृक्षों को तोड़ फोड़ डालते और उनको ऊपर नीचे गिराते रहते हैं , वैसे ही सूर्य्य भी अपनी किरणों से उनका छेदन करता रहता है , इससे वे ऊपर नीचे गिरते रहते हैं | इसी प्रकार ईश्वर के नियम से सब पदार्थ उत्पति और विनाश को भी प्राप्त होते रहते हैं ||5||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (13)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA