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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय (4)

(गतांक से आगे)

सामाजिक सुधार : -‍ महर्षि दयानन्द ने देश में होने वाली सामाजिक कुरीतियों, अन्धविश्वासों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया था | उनके आने से पहले अन्धविश्वासों नें हमारी पुरातन संसकृति को भस्मप्राय कर दिया था | महर्षि के अथक प्रयत्न से फिर से प्रकाश के प्रभाव दीखने लगे | वेदों की ज्योति तो प्रज्वलित कर दी पर उनको इतना समय न मिला कि उसे दिग्दिगन्त तक फैला सकें | यह कार्य उन्होंने आर्य समाज पर छोड़ दिया | आर्यसमाज उनका उत्त‌राधिकारी था | आर्यजनों ने यथाशक्ति वह प्रकाश फैलाने का प्रयत्न किया | म. नारायण स्वामी भी ऋषि के उन शिष्यों में से थे जिन्होंने आजन्म धर्म, देश व जाति की सेवा करते हुए वेद ज्योति को प्रज्वलित रखा | सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान होने के कारण वैसे भी आप पर बहुत जिम्मेदारियां थीं | आर्यसमाजों की आपसी गुटबाजी या बाहरी झगड़ों को सद्भावनापूर्वक निपटाना भी आपके कार्यक्षेत्र में आता था | कइं बार तो अन्न त्याग की धमकी भी देनी पड़ी | ऐसा ही एक झगड़ा आर्य समाज चावड़ी बाजार, दिल्ली के स्कूल (दयानन्द नैशनल स्कूल) के प्रधानाध्यापक एवं कमेटी में हो गया | झगड़ा बढ़ता देखकर ‌महात्मा नारायण स्वामी को मध्यस्थता के लिए बुलाया गया | आपने अत्यन्त चतुरतापूर्वक दोनों का समझौता करा सामंजस्य स्थापित किया | इसी प्रकार भारतीय शुद्धि सभा के सदस्यों में आपसी विरोध दूर किया | परन्तु यह सभा अधिक दिन न चल सकी |

सन् 1933 ई. में अलमोड़ा में आर्यसमज के साथ आर्य कन्या पाठशाला का शुभारम्भ किया | वहां ही बाद में एक अनाथालय की भी स्थापना की गई | डा. केदारनाथ जी को वानप्रस्थ की दीक्षा देकर पाठशाला व अनाथालय व्यवस्था उनके अधीन कर दी ग‍ई |

ग्वालियर यात्रा में आपने सात..आठ युवकों का यज्ञोपवीत कराया | बाद में सर्वधर्म सम्मेलन का भी आयोजन किया गया | इसमें ईसाई, पादरी व मुसलमान मौलवी भी शामिल हुए |उन्होंनें हिन्दुओं के जातिवाद की निंदा की | बाद में
‌महात्मा नारायण स्वामी का अध्यक्षीय भाषण हुआ | उन्होंने कहा कि हिदुओं के जातिवाद से कहीं भयंकर पश्चिम का जाति वाद है | वहां अंग्रेज, फ्रांसिसी, जर्मन व डच जातियां हैं | जिनमें सदा वैमनस्य रहत है व युद्ध होते रहते हैं | ये जातियां आपस में घृणा करती हैं व एक दूसरे को नीचा दिखाने को तत्पर रहती हैं | हिन्दुओं की जातियां भी परस्पर वैमनस्य पैदा करती हैं | कोई नीची है कोई ऊंची | परन्तु राष्ट्रों का जातिवाद अत्यन्त भयंकर एवं विनाशकारी है | दोनों को ही दूर करके भातृभाव पैदा करना चाहिए | "वसुधैव कुटुम्बकम्" |

सन् 1936 ई. में आपने कन्या गुरुकुल की कार्यकारिणी सभा, गुरुकुल वृन्दावन के प्रधान पद से, तथा 1937 में सार्वदेशिक के प्रधान पद से इस्तीफा देकर अपने को स्वतन्त्र कर लिया | आप सार्वदेशिक सभा के लगातार चीदह वर्ष तक प्रधान रहे | आप निस्चिन्त होकर धर्म एवं जनता की सेवा में लग गये |

इसके बाद आप कुछ वर्ष प्रचार यात्राओं पर जाते रहे | सिन्ध में आप 10-12 दिन रहे | जिसमें कराची, कैमारी, हैदराबाद, सिन्ध, सक्खर, लड़काना मोहनजोदड़ो व शिकारपुर मुख्य थे |

हैदराबाद सत्याग्रह : - हैदराबाद भारत के दक्षिण में स्थित, निजाम के अधीन एक बड़ी रियासत थी | रियासत में हिन्दुओं की संख्या 75 प्रतिशत थी | राजा के मुसलमन होने से उन्हें तरह-तरह के अत्याचार सहने पड़ते | हैदराबाद में भी आर्यसमाज की स्थापना हो चुकी थी | वहां दबाव डालकर व सुविधाएं देकर हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का षड्यन्त्र चल रहा था | जो एक बार इसलाम धर्म स्वीकार करले, वह वापस हिन्दु नहीं बन सकता था | आर्यसमाज ने शुद्धि का कार्य आरम्भ किया | कट्टर मुसलमानों का गुस्सा भड़क उठा | क्योंकि शुद्धि का कार्य आर्यसमाज करता था | अतः आर्य समाज को ही निशाना बनाया गया | आर्यसमाज के सत्संगों के लिएसरकारी आज्ञा लेनी पड़ती थी | "सत्यार्थ प्रकाश" पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | पहले तो सरकार को पत्र लिखकर अपना कष्ट बताया गया और यह प्रतिबन्ध हटाने की मांग की ग‍ई | परन्तु सरकार पर कोई असर न पड़ा | मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों..दवा की | अब और भी सख्ती की जाने लगी |

हैदराबाद के आर्य नेताओं नें देहली आकर सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के सामने अपना कष्ट रखा | सभा का बृहत् अधिवेशन बुलाया गया | जिसमें शान्तिपूर्ण सत्याग्रह करने का प्रस्ताव 15 अक्टूबर सन् 1938 को पारित हो गया और इस बृहत् कार्य का गुरुभार महात्मा नारायण स्वामी को सौंपा गया, जिसे उन्होंनें सहर्ष स्वीकार कर लिया |

महात्मा जी अपने कुछ साथियों के साथ शोलापुर पहुंचे | शोलापुर में हैडक्वार्टर बनाया गया | रास्ते में बम्बई [मुम्ब‍ई] रुक कर वहां के लोगों से भी सहायता का वचन लेते आए | 29 अक्टूबर को स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी व आर्य रक्षा समिति के मन्त्री के साथ शोलापुर पहुंचे | स्टेशन पर स्वागत के बाद उन्हें एक किराए के मकान में ठहरा दिया गया | हिन्दुओं की बहुसंख्या होने पर भी लगभग सारी सरकारी नौकरियां (छोटी..बड़ी) मुसलमानों के लिए सुरक्षित थीं | योग्यता होनी भी आवश्यक नहीं थी | स्कूलों में मुसलमान मौलवी ही शिक्षक होते | वे पढ़ाते कम , धर्मप्रचार अधिक करते थे, व बच्चों का धर्म परिवर्त्तन करते | मन्दिरों, आर्यसमाजों पर "ओउम्" का झण्डा नहीं लगा सकते थे | हिन्दुओं को धार्मिक कृत्यों व नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था | 10 प्रतिशत् मुसलमानों के फन्दे में 86 प्रतिशत् हिन्दु बंधे हुए थे | कोई हिन्दू समाचार पत्र न तो प्रकाशित कर सकता था, न ही बाहर से मंगा सकता था | उन पर भी प्रतिबन्ध था | उधर जहां अंग्रेजी राज्य था वहां सब धार्मिक कृत्यों की व लिखने पढ़ने की स्वतन्त्रता थी | इसलिये हैदराबाद के आर्यों में असन्तोष पैदा हुआ और अपने अधिकार के लिये लड़ने का उत्साह भी |

(क्रमशः)