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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

न तत्र सूर्य्यो भाति

ओउम् | यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्यु: |
न त्वा वज्रिन्त्सहस्त्रं सूर्य्या अनु न जातमष्ट रोदसी ||
सामवेद उत्तरार्चिक 4|4|1|1 (862)

शब्दार्थ -

हे इन्द्र...................हे परमैश्वर्यसम्पन्न ! अनन्त शक्ति-सम्पन्न भगवन् |
यत्.......................चाहे तो
ते.........................तेरे
शतम्.....................सैकड़ों
द्यावः......................द्यु-लोक, प्रकाशपुञ्ज हों
उत........................अथवा
शतम्.....................सैकड़ों
भूमोः......................भूमियाँ भी
स्युः.......................हों किन्तु हे
वज्रिऩ्....................वारक-शक्तिवाले प्रभो ! ये सब
रोदसी....................लोक-लोकान्तर तथा
सहस्त्रम्..................हजारों
सूर्याः.......................सूर्य्य
जातम्....................सर्वत्र विद्यमाऩ्
त्वा........................तुझको
न..........................नहीं
अनु + अष्ट..............पहुँच पाते |

व्याख्या -

संसार में दो प्रकार के लोक हैं - 1. स्वतः-प्रकाश और 2. परतः-प्रकाश | सूर्य्य स्वतः-प्रकाश है ; और भूमि-चन्द्रादि परतः-प्रकाश हैं, ये सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं | वेद की परिभाषा में इन्हें द्यौ और पृथिवी, द्यावापृथिवी, द्यौ और भूमि, द्यावाभूमि, सूर्य्य और चन्द्र आदि विविध नामों से पुकारा जाता है | इनकी महिमा तो देखिए | भूमि पर से करोड़ों वर्षों से मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट‍-पतंग, सरीसृप, व्याल, भुजंग आदि नाना प्राणी अपनी भोग्य सामग्री ले रहे हैं, किन्तु माता वसुन्धरा आज तक भी विश्वम्भरा बनी हुई है, आगे भी बनी रहेगी | भूमि का एक नाम 'रसा' है, सचमुच मधुर, तिक्त, अम्ल, कटु, कषाय, आदि सारे रस भूमि में हैं | सोना-चांदी-लोहादि धातु-उपधातुओं की खान भी यही है | कहीं मरमर पत्थर है, कहीं चिकनी मिट्टी है, कहीं रेत है | कहीं छह मील ऊँचा पर्वत मानो आकाश से बातें करने को सिर उठाये खड़ा है, कहीं उतना ही गहरा सागर है | कहीं नदी-नालों की कलकल ध्वनि है, तो कहीं समुद्र में उत्तुङ्ग तरङ्गें उठ रही हैं | कहीं सस्यश्यामला मनोहारिणी रम्या मही है तो कहीं तृणविहीन बालुकामय जलशून्य प्रदेश है | संसार के आरम्भ से लेकर आजतक के सारे वैज्ञानिक अपनी शक्ति लगा रहे हैं, किन्तु इस ससीम, परिछिन्न, सान्त एक भूमि की सीमा = परिच्छेद = अन्त नहीं पा सके और यदि वे सैकड़ों हों तो फिर इनकी कितनी महिमा, कितनी गरिमा होगी ? मनुष्य इसकी कल्पना नहीं कर सकता |

आओ, द्यौ का तनिक विचार करें | भूमि जहाँ एक क्षुद्र सा टापू है वहाँ द्यौ एक विशाल सागर है | हमारा प्रतिदिन का परिचित सूर्य्य भार में पृथिवी से साढ़े चार लाख गुना भारी बताया जाता है | कहा जाता है, इस सूर्य्य में हमारी पृथिवी की-सी तेरह लाख पृथिवियाँ समा सकती हैं | वह महान सूर्य्य जिससे हमारी पृथिवी उत्पन्न हुई है, द्यौरूपी विशाल सागर में एक तुच्छ कमल सा है | ऐसे क्या इससे भी बड़े असंख्य सूर्य्य इस द्यौ-सागर में टिमटिमा रहे हैं कहो, या चमचमा रहे हैं कहो |

क्या इनकी शक्ति की कल्पना कर सकते हो ? आः ! वेद कहता है, अनन्त द्यौ और अनन्त भूमि तथा असंख्य सूर्य और लोक मिलकर भी उस महान् भगवान् को नहीं पहुँच पाते अर्थात् उसके सामने यह सारा विशाल संसार तुच्छ है | वेद ने स्पष्ट कहा है -

एतावानस्य महिमाSतो ज्यायांश्च पूरुषः यजुर्वेद 31|6| यह सारा संसार उसकी महिमा का पसारा है, वह पूर्ण तो है, इससे बड़ा और न्यारा भी है |

भगवान् ने इस जहान को पैदा किया है, जैसा कि वेद ने कहा है -

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् |
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः || ऋग्वेद 10|190|3

जगन्निर्माता ने पूर्व की भाँति सूर्य्य, चाँद, द्यौ, अन्तरिक्ष, पृथिवी और स्वः = आनन्द की रचना की | बनी हुई वस्तु के बनाने वाले को कैसे पावें ? इसीलिए कठ ऋषि ने कहा -

न तत्र सूर्य्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोSयमग्निः |
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति || कठोपनिषद् 5|15

न वहाँ सूर्य्य चमकता है, न चाँद-तारे, न ही बिजुलियाँ चमकती हैं, यह अग्नि तो कहाँ से ? उसकी चमक के पीछे ही सभी चमकते हैं | उसके प्रकाश से यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है | सभी उसके प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, तो स्पष्ट है कि ये सब मिलकर उसकी बराबरी नहीं कर सकते | उसकी तुलना का कोई पदार्थ इस ब्रह्माण्ड में नहीं है | वे सब मिलकर भी सीमा वाले हैं, और वह है असीम | अतएव वह -

विश्वस्य मिषतो वशी | ऋग्वेद 10|190|2

सभी गति करनेवालों को वश में करने वाला है, नियन्त्रणकर्ता है | जड़-चेतन, स्थावर-जङ्गम, चर-अचर सभी उसके शासन में चलते हैं |

इस प्रकार उसे अप्रतर्क्य समझकर महात्मा चुप हो जाते हैं | ससीम असीम का वर्णन कैसे करें ? केवल अनुभव कर सकता है, उसका वर्णन नहीं कर सकता |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)