ऋषि का एकान्तवास और योग साधना : एक अदभुत् घटना

चाणोद के आश्रम से थोड़ी दूर नर्मदा के किनारे एक दिन मैं बैठा हुआ प्रक्रृ‌ति माता की शोभा को देख रहा था | नदी के उस पार से एक नाव यात्रियों से भरी हुई इस पार आ रही थी | जब इस पार आने में थोड़ी ही दूरी शेष थी, तभी अचानक तूफान आ गया| यात्री लोग चिल्लाने लगे |यात्रियों के डर के मारे हिलने डुलने के कारण घाट से थोड़ी दूर पर नदी के अन्दर पानी नाव से ऊपर उठने लगा और देखते देखते नाव‌ पानी से भर गई | नाव नीचे मिट्टी में अटक गई, नाव के ऊपर से पानी जोर से बहने लगा | तूफान व तरंगों के कारण कोई भी यात्री नीचे नही उतर सका | सबके सब चिल्लाने लगे और् माताएं छोटे छोटे शिशु, सन्तानों को अपनी अपनी छाती से जोर से चिपटाती हुई रोने लगीं | नाव के मांझी लोग पानी में कूद पड़े और नाव को खीचने लगे | लेकिन नाव मिट्टी में धंस गई थी | मैं प्रक्रृति माता के इस भयंकर द्दृष्य को अधिक देर नहीं देख सका, क्योंकि यह भयंकर करुण द्दृष्य था | माताएं सन्तानों को छोड़ना नहीं चाहती थीं | मेरी आखों में आंसू आ गये और मैं पानी में कूद पड़ा तथा "ओं बलमसि बलं महि धेहि" बोलकर नाव को खींच आधी नांव को मिट्टी से ऊपर उठा दिया | सब यात्री लोग व मांझी लोग चकित रह गये | मैने स्मरण किया : "प्रभो ! तुमने मेरे अन्दर इतनी शक्ति रखी है, यह मुझे मालुम ही नही था | इस शक्ति से तुम्हारी सेवा कैसे होगी बता दो ? यजुर्वेद के इस मन्त्र को तो मैने लड़कपन में ही पढ़ा था पर् इसका महात्म्य आज ही समझ सका | तदनन्तर मैं नदी के किनारे से शीघ्र चल पड़ा और सबकी द्दृष्टि से औझल हो गया |"

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स्वामी

स्वामी दयानन्दजी द्वारा नर्मदा के किनारे नाव को खींचने की यह कथा पूर्णतः काल्पनिक - कपोल कल्पित है । यह न तो स्वामी दयानन्दजी ने अपने 'आत्मकथन' में कहीं कही है और न ही उनके किसी प्रामाणिक जीवनचरित में दी गई है । ऐसी बातों का प्रसार न होना चाहिए । केवल प्रमाणाधारित सत्य बातों का ही वर्णन होना उचित है ।
= भावेश मेरजा

उपरोक्त

उपरोक्त घटना का वर्णन महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती जी रचित पुस्तक 'योगाभ्यास और महर्षि दयानन्द सरस्वती' के पृ. 23 से 'एकान्तवास और योग साधना' शीर्षक के अन्तर्गत किया गया है | ऐसी ही कुछ घटनाओं का वर्णन करने से पूर्व विद्वान लेखक ने लिखा है के " गुरुओं के आदेशानुसार स्वामी दयानन्द ने अपना अधिक समय योगाभ्यास और महर्षि पतंजलि के योगदर्शन के अनुशीलन में लगाया | फिर भी कुछ घटनाएं ऐसी घटीं जिनका वर्णन करना यहां स्वामी दयानन्द के ही शब्दों में, अप्रासंगिक न होगा |"

आगे इसी अध्याय के अन्त में वह लिखते हैं " यद्यपि योग विद्या की शिक्षा और अनुभव के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण देना महर्षि दयानन्द की इच्छा के प्रतिकूल था, तो भी कलकत्ते के शिक्षित, ज्ञानी और भक्‍त लोगों के एकान्तिक मनोभाव और प. ईश्‍वरचन्द्र विद्यासागर जैसे सद्‍पुरुषों के विशेष अनुरोध और आग्रह को देखकर, श्री स्वामी जी ने अपने कलकत्ता प्रवास (दिसम्बर 1872 ई. से अप्रैल 1873 ई. तक) में यह विवरण प. हेमचन्द्र चक्रवर्ती को बोलकर लिखाया था | हमारा सौभाग्य है कि आज यह विवरण प. दीनबन्धु वेदशास्त्री, तथा स्वामी सच्चिदानन्द जी योगी के पुरुषार्थ के फलस्वरूप हिदी भाषा में उपलब्ध है | एतदर्थ स्व. श्री प. दीनबन्धु वेद शास्त्री तथा स्व. स्वामी सच्चिदानन्द जी योगी तथा उनसे जुड़े हुए अनेक लोगों के हम अत्यन्त आभारी हैं, और बड़ी श्रद्धा और आदर से उनको नमन करते हैं, जिन्होंने अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी इस कार्य को अपने जीवन में पूरा करके ही दम लिया |

उपरोक्त पुस्तक 'मातुश्री धनदेवी केशवराम धर्माथ वैदिक टृस्ट (पंजीकृत) द्वारा प्रकाशित है |

Sh.Bhavesh ji, I agree with

Sh.Bhavesh ji, I agree with details given by respected Anand Bakshi ji about incident and it shows that yoga provides you with tremendous energy/power which can be utilized in doing good work as cited above done by Swami Dayanand ji.
This incident confirms extreme power gathered by practicing Yoga as well as abiding by Brahmcharya Dharma.(Saving lives of innocent people in such difficult situation is bravery work ,any ordinary person can call it miracle)
Dhanyavad
Ramesh

आदरणीय

आदरणीय श्री आनन्दजी ने सन्दर्भ सूचित किया एतदर्थ धन्यवाद | मगर किसी अप्रामाणिक पुस्तक में से ली गई बात सत्य या प्रामाणिक तो नहीं हो जाती । दयानन्दजी के जीवन तथा इतिहास के सुप्रसिद्ध विद्वान् डॉ० भवानीलाल भारतीय आदि ने इन अप्रामाणिक गाथाओं का सशक्त खण्डन किया है । ऐसी बातों को हवा देने की क्या आवश्यकता है? दयानन्दजी को महिमा मंडित करने के लिए उनका यथार्थ जीवन ही पर्याप्त है । उनके आत्मकथन के दो ही स्रोत हैं ‍ थियोसोफिस्ट वाला विवरण और दुसरा पूना‍ प्रवचन में अन्तिम प्रवचन ।
= भावेश मेरजा

आदरणीय

आदरणीय रमेश जी एवं भावेश जी

उपरोक्‍त कथन आर्यसमाज में जगृति की विद्यमानता का प्रतीक हैं | डा. भवानीलाल भारतीय जी के परम पुरुषार्थ से लिखे गये प्रमाणिक ऋषि चरित्र अवश्य ही एक प्रमाणिक ग्रन्थ हैं और उनके रहते हमें किसी भी कल्पनातीत वर्णनों से बचना ही चाहिए | फिर भी एक विचार यह भी अता है कि महर्षि के जीवन का इतना बड़ा विस्तार रहा है कि उनके बारे में सभी तथ्यों का पता लगा पाना सम्भव नहीं है | कुछ न कुछ ऐसे तथ्य अवश्य ही समय समय पर प्रगट हो सकते हैं , जो कहीं न कहीं छिपे पड़े हों | ऐसे तथ्यों के उजागर होने पर उनका परीक्षण कर , और यदि वे किसी अस्वभाविक व असम्भव बात पर आधारित नहीं हैं , तो हमें उन पर ध्यान देने से हिचकिचाना नहीं चाहिए |
उपरोक्‍त घटना में , अवश्य ही शब्दों का चयन लेखक का है, लेकिन भाव जो प्रकट होता है वह कोई अस्वभाविक अथवा असम्भव नहीं लगता है | अतः इस प्रकार के प्रसंग प्रेरणादायक होने से, प्रमाणिक्ता के अभाव में भी यदि पढ़ लिख लें तो उनमें अधिक आपत्ति नही होनी चाहिए, बस शर्त यही है कि वे असम्भव एवं अप्रकृतिक बातों के बढ़ावा देने वाले न हों , व किसी व्यर्थ की महिमा मण्डन से रहित हों |हाँ काल के व्यतीत होते होते वह किसी अस्वभाविक गाथा का रूप न लें , यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है |
यह सब लिखते हुए भी मैं आपकी उपरोक्त महत्त्वपूर्ण बातों से पूर्ण‌तया सहमत हूँ, व इसी प्रकार के मार्गदर्शन की सतत् अपेक्षा रखता हूँ |

आनन्द‌

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