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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (1)

महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत

अब वेदों के नित्यत्वविचार के उपरान्त वेदों में कौन कौन विषय किस किस प्रकार के हैं, इसका विचार किया जाता है | वेदों में अनवयरूप विषय तो अनेक हैं, परन्तु उनमें से चार मुख्य हैं - (1) एक विज्ञान अर्थात् सब पदार्थों को यथार्थ जानना, (2) दूसरा कर्म,(3) तीसरा उपासना, और चौथा ज्ञान है | 'विज्ञान' उसको कहते हैं कि जो कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों से यथावत् उपयोग लेना, और परमेश्वर से लेके तृणपर्य्य‌न्त पदार्थों का साक्षात् बोध का होना उनसे यथावत् उपयोग करना, इससे यह विषय इन चारों में भी प्रधान है, क्योंकि इसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है | सो भी दो प्रकार का है - एक तो परमेश्वर का यथावत् ज्ञान और उसकी आज्ञा का बराबर पालन करना, और दूसरा यह् है कि उसके रचे हुए सब पदार्थों के गुणों को यथावत् विचार के उनसे कार्य सिद्ध करना, अर्थात् ईश्वर ने कौन कौन पदार्थ किस किस प्रयोजन के लिये रचे हैं | और इन दोनों में से भी ईश्वर का जो प्रतिपादन है सो ही प्रधान है |

इसमें आगे कठवल्ली आदि का प्रमाण लिखते हैं - (सर्वे वेदाः.) परमपद अर्थात् जिसका नाम मोक्ष है, जिसमें परब्रह्म को प्राप्त होके सदा सुख में ही रहना, जो सब आनन्दों से युक्त, सब दुखों से रहित और सर्वशक्तिमान् परब्रह्म है, जिसके नाम (ओं) आदि हैं, उसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है | इसमें योगसूत्र का भी प्रमाण है - (तस्य..) परमेश्वर का ही ओंकार नाम है | (ओं खं.) तथा (ओमिति.) ओं और खं ये दोनों ब्रह्म के नाम हैं | और उसी की प्राप्ति कराने में सब वेद प्रवृत्त हो रहे हैं, उसकी प्राप्ति के आगे किसी पदार्थ की प्राप्ति उत्तम नहीं है, क्योंकि जगत् का वर्णन, दृष्टान्त‌ और उपयोगादि का करना ये सब परब्रह्म को ही प्रकाशित करते हैं, तथा सत्यधर्म के अनुष्ठान, जिनको तप कहते हैं, वे भी परमेश्वर की ही प्राप्ति के लिये हैं, तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के सत्याचरणरूप जो कर्म हैं वे भी परमेश्वर की ही प्राप्ति कराने के लिये हैं, जिस ब्रह्म‌ की प्राप्ति की इच्छा करके विद्वन लोग प्रयत्न और उसी का उपदेश भी करते हैं | नचिकेता और यम इन दोनों का परस्पर य‌ह संवाद है कि हे नचिकेतः ! जो अवश्य प्राप्ति करने के योग्य परब्रह्म है, उसी का मैं तेरे लिये संक्षेप से उपदेश करता हूँ | और यहाँ यह भी जानना उचित है कि अलंकाररूप कथा से नचिकेता नाम से जीव और यम से अन्तर्यामी परमात्मा को समझना चाहिये |

(तत्रापरा.) वेदों में दो विद्या हैं - एक अपरा, दूसरी परा | इनमें से अपरा यह है कि जिससे पृथिवी और तृण से लेके प्रकृतिपर्यन्त पदार्थों के गुणों के ज्ञान से ठीक ठीक कार्य सिद्ध करना होता है और दूसरी परा कि जिससे सर्वशक्तिमान ब्रह्म की यथावत् प्राप्ति होती है | यह परा विद्या अपरा विद्या से अत्यन्त उत्तम है क्योंकि अपरा का ही उत्तम फल परा विद्या है |

(क्रमशः)