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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप(2) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *
उपासक का तीसरी अवस्था में ब्रह्मा नाम होता है | यहां वह न गाता है और न केवल नाम के अर्थों का ज्ञान ही कर रहा है | यहां वह अपने जाने हुए भगवान् के एक एक गुण से अपनी आत्मा को अलंकृत करता हुआ आगे बढ़ रहा है | यह ही है इसकी वास्तविक उपासना | इसी के द्वारा अपने परम् उत्थान के लिए इसकी आत्मा का निर्माण होता है | इस उपासक की उपासना के यहां दो फल दिखालाये गये हैं | उनमें से एक यह कि उसको ब्रह्मा की उपाधी मिल गई है यह उसका एक सार्थक नाम है | 'ब्रह्म' के गुणों को धारण करने से ही उसका नाम 'ब्रह्मा' पड़ा है | और दूसरा फल है ब्रह्म विद्या के वंश कुलों अर्थात् संस्थानों का उत्थान |

(अब गतांक से आगे)
इन संस्थानों का उत्थान, 'गायत्री' और 'अर्की' इन दोनों में से किसी के भी अधिकार की वस्तु नहीं है | किसी को उठा वही सकता है जो उठ कर स्वयं खड़ा हो गया हो | ब्रह्मा के अपने कार्यक्रम में अपने उत्थान की योजना है | उसने प्रभु के गुणों से अपने आप को सजाया है | जिस प्रकार अच्छा सारथी ही रथ को उचित मार्ग पर ले जा सकता है | उसी प्रकार अच्छा ब्रह्म ज्ञानी ही ब्रह्म के जिज्ञासुओं एवं ब्रह्म संस्थानों को आगे बढ़ा सकता है | इस प्रकार के इस उपासक का फल है अपना निर्माण और पर निर्माण | उपासक का यह प्रकार ही सर्व श्रेष्ठ प्रकार है | और सब प्रकार इसी की और ले जाने के साधन हैं |

भगवान् के अनेक नाम उसके अनेक गुणों के आधार पर ही हैं | उपासक अपनी उपासना में जब भगवान के किसी नाम का उच्चारण करता है, तो उसका तत्पर्य होता है उस नाम से ध्वनित होने वाले उस गुण से अपनी आत्मा को अलंकृत करना | इस मन्त्र में भगवान को संबोधन करता हुआ उपासक भगवान के नाम का उच्चारण करता है, और वह नाम है 'शतक्रतु' | ऋषि दयानन्द नें 'शत' शब्द के 'बहुत' और 'क्रतु' शब्द के 'कर्म' और 'ज्ञान अर्थ किए हैं |

इस शब्द का उच्चारण करते ही उपासक एक विशाल क्षेत्र में पहुँच जाता है और यह कहना आरम्भ कर देता है | अहो ! मैं यह क्या विचित्र दृष्य देख रहा हूं | यह महान प्रकाश का पुञ्ज आदित्य अनेक ग्रहों और नक्षत्रों को, अपने आकर्षण के रस्से से बांधे हुए कितने वेग से गोल चक्र में चला रहा है | और इनमें से भी कोई किसी की और, कोई किसी के चारों ओर घूम रहा है ; और इन सबका यह भ्रमण भी समान गति से नहीं विषम गति से सम्पादित होता दिखाई दे रहा है | प्रभो ! आप अद्भुत हैं और अद्भुत शक्तियों के भण्डार हैं | आप के बिना इस अद्भुत कर्म चक्र का संचालक कोन हो सकता है | इन गति शील अनेक गोलों का अद्भुत निर्माण भी तो आपके ही अद्भुत कौशल का चमत्कार है | इसलिये तो आपके लिये कहा गया है "तदेजति तनैजति" वह सब को चला रहा है | परन्तु स्वयं अचल है |

हां ! तो यह सब विचित्र निर्माण और संचालन आपके अलौकिक विज्ञान की ही तो उपज है | आपके ज्ञान से बचा हुआ संसार का कोई भी तो अणु नहीं | कारण और कार्य रूप प्रत्येक तत्व आपके विज्ञान से जगमगा रहा है | फलतः आपकी दी हुई गति और आपके विज्ञान का प्रत्येक अणु में प्रसार है | इसीलिए तो भगवन ! आप विष्णु हैं, और इसीलिए तो हम उपासकों के लिए आपका आदेश है "विष्णोः कर्माणिपश्यत" व्यापक भगवान के कर्मों को देखो | प्रभो ! हम देख रहे हैं परन्तु उस दर्शन से हमें क्या लाभ ? लाभ अवश्य है, परन्तु तब ही जब 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत..समाः', (कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करो) "विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभय..सह ! अविद्यया मृत्युं तीर्त्वाविद्ययामृतमश्नुते" (जो कर्म ज्ञान दोनों को साथ साथ जानता है वह कर्म से संसार से पार होकर ज्ञान से अमर भगवान को पा लेता है) | प्रभो ! अब मैं समझ गया इसीलिए तो मैंने आप को 'शतक्रतु' नाम से पुकारा है | मैं आपकी कर्म ज्ञान सम्पदा को जानकर अब अपने आप को कर्म और ज्ञान से सम्पन्न करने का यत्न करूंगा | इस प्रकार प्रभुचिन्तन करता हुआ उपासक जब उसके कर्मों और गुणों का अनुकरण करना आरम्भ कर देता है तो उसे भगवान् की और से यह दूसरा सन्देश मिलता है मन्त्रा:-

यत्सानोः सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् |
तदिन्द्रो अर्थ चेतति युथेनवृष्णिरेजति || ऋक् 1|10|2||

अर्थ ..
यत्................जो कि
सानोः..............कर्म के एक शिखिर से
सानुम्.............कर्म के दूसरे शिखिर पर
आरुहत्...........उपासक आरूढ़ होता है
भूरि................बहुत से
कर्त्त्वम्..........कर्त्तव्य कर्मों को
अस्पष्ट............स्पर्श करता है
तत्...............इसलिए
इन्द्र..............सर्वैश्वर्यवान् परमेश्वर
अर्थम्............उसके प्राप्तव्य विषय को
चेतति............प्रकाशित करता है
वृष्णिः............सुख की वर्षा करने वाला भगवान्
यूथेन.............सुख के साधक पदार्थ समूह के द्वारा
एजति............उसे सुख की प्राप्ति कराता है |

भगवान का उपासक जब कर्म क्षेत्र में आकर खड़ा होता है और आगे बढ़ना आरम्भ करता है तो उसके सामने कितनी कठिनाइयां आकर उपस्थित होती हैं उन्हें वह ही जानता है | परन्तु सावधानता से आगे बढ़ते जाने का उसका संकल्प उसे हताश नहीं होने देता | अपने सामने आने वाली विघ्न बाधाओं को चीरते हुए आगे बढ़ते जाना ही अब उसका ध्येय बन जाता है यद्यपि, व्याधि, अकर्मण्यता, संशय, प्रमाद, आलस्य, विषयों की कामना, दृष्टि की भ्रान्ति, और लक्ष्य तक न पहुंच सकना ; ऐसे विघ्न हैं ; जो उपासक के चित्तसागर में ज्वारभाटा लाये बिना नहीं रहते | वेग से उठ‌ती हुई तरंगों के थपेड़ों से जिस प्रकार समुद्र का तरैया कभी ऊपर आता है और कभी समुद्र के गर्भ में विलीन हो जाता है ; वह ही दशा विक्षिप्त अन्तःकरण महासागर की वासना तरंगों में फंसे हुए उपासक की होती है | कभी शारीरिक‌ व्याधिएं उसे भंवर में मगरमच्छ की भान्ति ग्रसने को सन्नद्ध हो जाती हैं | कभी अकर्मण्यता की झञ्जा वायु उसे आखें मूंद कर बैठ जाने को कहती है | कभी संशय की परस्पर विरोधी तरङ्गें अपने थपेड़ों की मार से न उसे इस और बढ़ने देती है और न उस और, कभी भूलभुलैयां के भंवर उसके मार्ग को ही उससे औझल कर देते हैं, कभी बिना ही थके आलस्य रूपी शीतलता उसके अंगों को जकड़ लेती है, कभी विषयों के रत्नों की कामना उसे लक्ष्य से ही वंचित कर देती है, कभी उसकी दृष्टि में ही ऐसा भ्रम हो जाता है कि सामने होता हुआ भी किनारा उसकी आँखोँ से ओझल हो जाता है , कभी प्रयत्न करने पर भी किनारा न पाकर वह हताश होकर बैठ‌ जाता है | परन्तु विघ्नों के इस विप्लवकारी आन्दोलन की सृष्टि होने पर भी वेद उपासक को आगे बढ़ने का ही आदेश देता है | इसलिए इस वेद मन्त्र में आया है 'सानो: सानुमारुहत्'इतने वेग से चलो कि कर्म के एक शिखिर से दूसरे पर पहुंच जाओ | विघ्नबाधाओं का शिर तभी तक ऊंचा रहता है जब तक वेग से आगे बढ़ने वाला मनुष्य उनके शिर पर पैर नहीं रख देता | इसके लिए आवश्यक है 'एक लक्ष्य और एक चाल' | इसी का नाम है एक तत्त्वाभ्यास,| और इसी का नाम है एक शिखिर से दूसरे शिखिर पर आरोहण |

(क्रमशः)