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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन सूक्त' पर टीका - ‍परिशिष्ट (4)

को अस्मिन् रेतो न्यदधात् तन्तुरा तायतामिति |
मेधां को अस्मिन्नध्यौहत् को वाणं को नृतो दधौ ||17||

अर्थ - (तन्तु अतायतां इति अस्मिन् रेतः कः निःअदधात्) प्रजातन्तु जारी रहे इसलिए इसमें वीर्य किसने पैदा कर दिया है ? इसमें मेधा (बुद्धि) किसने (अधि + औहत्) उन्नत कर दी है ? (कः वाणं) किसने वाणी और (कः नृतः दधौ) किसने नृत्य* का भाव रक्खा है ?

केनेमां भूमिमौर्णोत् केन पर्यभवद्दिवम् |
केनाभि मह्ना पर्वतान् केन कर्माणि पुरुषः ||18||

अर्थात् (केन इमां भूमिम् ओर्णोत्) किसने इस भूमि को ढक रक्खा है ? (केन दिवं पर्यभवत्) किसने द्युलोक को घेरा हुआ है ? (केन मह्ना पर्वतान् अभि) किसने अपनी महिमा से पर्वतों को आच्छादित कर रक्खा है ? (पुरुषः केन कर्माणि) किसकी दी हुई शक्ति से मनुष्य कर्मों को करता है |

केन पर्जन्यमन्वेति केन सोमं विचक्षणम् |
केन यज्ञं च श्रद्धाँ च केनास्मिन्निहितं मनः ||19||

अर्थः - (पर्जन्यं केन अन्वेति) बादलों को किससे (मनुष्य) प्राप्त करता है ? (विचक्षणं सोमं केन) दर्शनीय सोम को किससे पाता है ? किससे यज्ञ और श्रद्धा प्राप्त करता है ? इसमें मन किसने रख दिया है ?

केन श्रोत्रियमाप्नोति केनेमं परमेष्ठिनम् |
केनेममग्निं पुरुषः केन संवत्सरं ममे||20||

अर्थात् किसके (प्रदत्त ज्ञान) से (क्षोत्रियम्) ज्ञानी वेदज्ञ को प्राप्त करता है ? और किस (की कृपा) से परमेश्वर को प्राप्त करता है ? (पुरुषः केन इमम् अग्निम्) मनुष्य किससे इस अग्नि को पाता है ? (केन सम्वत्सरं ममे) और किससे संम्वत्सर (काल) को (पहर, घण्टा, पल आदि बना कर) मापता है ?

ब्रह्म श्रोत्रियमाप्नोति ब्रह्मर्म परमेष्ठिनम् |
ब्रह्मममर्ग्नि पुरुषे ब्रह्म संवत्सर ममे ||21||

अर्थात् (ब्रह्मश्रोत्रियम् आप्नोति) वेद (की शिक्षा) से ज्ञानी वेदज्ञ को प्राप्त करता है, वेद द्वारा ही परमात्मा को प्राप्त होता है, वेद द्वारा ही अग्नि को पाता है और वेद द्वारा ही समय की नाप तोल करता है |

..................................................................................................................................* 'उणादि कोष 4| 194 में नृति गात्रविक्षेपे' अर्थात देह चालन (शरीर को हरकत देने) के अर्थ में नृत्य शब्द प्रयुक्त हुआ है | भाषण के साथ शरीर को इस प्रकार गति देना जिससे भाषण अधिक प्रभावोत्पादक हो जावे, इसी का नाम नृत्य है | पीछे से यह शब्द अप्सराओं के नाच के अर्थ में रूढ़ हो गया | एक व्याख्याता अपने भावों को व्यक्त करने अथवा किसी बात पर बल देने के लिए जो अपने शरीर को हिलाता-जुलाता या मेज पर हाथ पटकता है वैदिक साहित्य में इस सबको नृत्य कहते हैं |

(क्रमशः)