Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (14)

देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुं गिरः | महामनूषत श्रुतम् ||6||
ऋग्वेद 1|6|6||

पदार्थ -

जैसे (देवयन्तः) सब विज्ञानयुक्त (गिरः) विद्वान मनुष्य (विदद्वसुम्) सुखकारक पदार्थ विद्या से युक्त (महाम्) अत्यन्त बड़ी (मतिम्) बुद्धि (श्रुतम्) सब शास्त्रों के श्रवण और कथन को (अच्छ) अच्छी प्रकार (अनूषत) प्रकाश करते हैं, वैसे ही अच्छी प्रकार साधन करने से वायु भी शिल्प अर्थात् सब कारीगरी को सिद्ध करते हैं ||6||

भावार्थ -

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | मनुष्यों को वायु के उत्तम गुणों का ज्ञान, सब का उपकार और विद्या की वृद्धि के लिये प्रयत्न सदा करना चाहिये जिससे सब व्यवहार सिद्ध हों ||6||

इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा | मन्दू समानवर्चसा ||7||
ऋग्वेद 1|6|7||

पदार्थ -

यह वायु (अबिभ्युषा) भय दूर करनेवाली (इन्द्रेण) परमेश्वर की सत्ता के साथ (सञजग्मानः) अच्छी प्रकार प्राप्त हुआ तथा वायु के साथ सूर्य्य (संदृक्षसे) अच्छी प्रकार दृष्टि में आता है, (हि) जिस कारण ये दोनों (समानवर्चसा) पदार्थों में प्रसिद्ध बलवान् है, इसी से वे सब जीवों को (मन्दू) आनन्द के देनेवाले होतेअ हैं ||7||

भावार्थ -

ईश्वर ने जो अपनी व्याप्ति और सत्ता से सूर्य्य और वायु आदि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हैं, इन सब पदार्थों के बीच में से सूर्य्य और वायु ये दोनों मुख्य हैं, क्योंकि इन्हीं के धारण आकर्षण और प्रकाश के योग से सब पदार्थ सुशोभित होते हैं | मनुष्यों को चाहिए कि पदार्थ विद्या के उपकार लेने के लिए इन्हें युक्त करें ||7||

अनवद्यैरभिद्यभिर्मखः सहस्वदर्च्चति | गणैरिन्द्रस्य काम्यैः ||8||
ऋग्वेद 1|6|8||

पदार्थ -

जो यह (मखः) सुख और पालन होने का हेतु यज्ञ है, वह (इन्द्र्स्य) सूर्य्य की (अनवद्यैः) निर्दोष (अभिद्युभि;) सब और से प्रकाशमान और (काम्यैः) प्राप्ति की इच्छा करने योग्य (गणैः) किरणों व पवनों के साथ मिलकर सब पदार्थों को (सहस्वत्) जैसे दृढ़ होते हैं वैसे ही (अर्चति) श्रेष्ठ गुण करनेवाला होता है ||8||

भावार्थ -

जो शुद्ध अत्युत्तम होम‌ के योग्य पदार्थों के अग्नि में किये हुए होम से सिद्ध किया हुआ यज्ञ है, वह वायु और सूर्य्य की किरणों की शुद्धि के द्वारा रोगनाश करने के हेतु से सब जीवों को सुख देकर बलवान् करता है ||8||

अतः परिज्मन्नागहि दिवो वा रोचनादधि | समस्मिन्नृञ्जते गिरः ||9||
ऋग्वेद 1|6|9||

पदार्थ -

जिस वायु में वाणी का सब व्यवहार सिद्ध होता है, वह (परिज्मन्) सर्वत्र गमन करता हुआ सब पदार्थों को तले ऊपर पहुँचानेवाला पवन (अतः) इस पृथिवी स्थान से जलकणों को ग्रहण करके (अध्यागहि) ऊपर पहुँचाता और फिर (दिवः) सूर्य्य के प्रकाश से (वा) अथवा (रोचनात्) जो कि रुचि को बढ़ानेवाला मेघमण्डल है उससे जल को गिराता हुआ तले पहुँचाता है, (अस्मिन्) इसी बाहर और भीतर रहनेवाले पवन में सब पदार्थ स्थिति को प्राप्त होते हैं ||9||

भावार्थ -

यह बलवान वायु अपने गमन आगमन गुण से सब पदार्थों के गमन आगमन धारण तथा शब्दों के उच्चारण और श्रवण का हेतु है ||9||

इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि | इन्द्रं महो वा रजसः||10||
ऋग्वेद 1|6|10||

पदार्थ -

हम लोग (इतः) इस (पार्थिवात्) पृथिवी के संयोग (वा) और (दिवः) इस अग्नि के प्रकाश (वा) लोकलोकान्तरों अर्थात् चन्द्र और नक्षत्रादि लोकों से भी (सातिम) अच्छी प्रकार पदार्थों के विभाग करते हुए (वा) अथवा (रजसः) पृथिवी आदि लोकों से (महः) अति विस्तारयुक्त (इन्द्रम्) सूर्य्य को (ईमहे) जानते है ||10||

भावार्थ -

सूर्य्य की किरणों पृथिवी में स्थित हुए जलादि पदार्थों को भिन्न भिन्न करके बहुत छोटे कर देती है, इसी से वे पदार्थ पवन के साथ ऊपर को चढ़ जाते हैं, क्योंकि वह सूर्य्य सब लोकों से बड़ा है ||10||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (14)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)