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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (40)

स्तुति विषय

तमीडत प्रथमं यज्ञसाधं विश
आरीराहुतमृञ्जसानम् |
ऊर्जः पुत्रं भरतं सृप्रदानुं
देवा अग्नि धारयन्द्रविणोदाम् ||40||
ऋ. 1|7|3|3||

व्याख्यान -

हे मनुष्यो ! "तमीडत" उस अग्नि की स्तुति करो, कि जो "प्रथमम्" सब कार्यों से पहले वर्त्तमान और सबका मुख्य कारण‌ है, तथा "यज्ञसाधम्" सब संसार और विज्ञानादि यज्ञ का साधक (सिद्ध करनेवाला) सबका जनक है | हे "विशः" मनुष्यो । उसी को स्वामी मानकर "आरीः" प्राप्त हो‍ओ, जिसको हम दीनता से कहते हैं, विज्ञानादि से विद्वान लोग सिद्ध करते हैं और जानते हैं | "ऊर्जः, पुत्रं भरतम्" पृथिव्यादि जगत् रूप अन्न का पुत्र अर्थात् पालन करने वाला, तथा भरत अर्थात् उसी अन्न का पोषण और धारण करने वाला है | "सृप्रदानुम्" सब जगत् को चलने की शक्ति देने वाला और ज्ञान का दाता है | उसी को "देवा अग्नि धारयन्द्रविणोदाम्" देव (विद्वान लोग) अग्नि कहते हैं और धारण करते हैं | वही सब जगत् को द्रविण अर्थात् निर्वाह के सब अन्न जलादि पदार्थ और विद्यादि पदार्थों का देने वाला है | उस अग्नि परमात्मा को छोड़ के अन्य किसी की भक्ति की याचना कभी किसी को न करनी चाहिए ||40||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'