Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आत्मा अविनाशी है

ओ३म् |
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् |
स सध्रीची: स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्त: ||
ऋग्वेद 1.164.31

शब्दार्थ :
अनिपद्यमानम् = अविनाशी
आ = सीधे = आगे
च = और‌
परा = उलटे, वापसी
च = भी
पथिभि: = मार्गों से
चरन्तम् = विचरण करनेवाले
गोपाम् = इन्द्रियों के स्वामी को
अपश्यम् = मैने देखा है, अनुभव किया है, जान लिया है
स = वह्
सघ्रीची: = सरल दशाओं को
स: = वही
विषूची: = विषम दशाओं को
वसान: = धारण करता हुआ
भुवनेषु+अन्त: = लोकों के बीच
आ=वरीवर्ति = पुन: पुन: आता है |

अविनाशी सीधे, आगे और् उलटे, वापसी भी, मार्गों से विचरण करनेवाले, व्यवहार करने वाले, इन्द्रियों के स्वामी को मैने देखा है, अनुभव किया है, जान लिया है | वह् इन्द्रिय स्वामी, सरल दशाओं को, और‌ वही विषम दशाओं को धारण करता हुआ लोकों के बीच पुन: पुन: आता है |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :
इस छोटे से मन्त्र में कईं बातें कही गईं हैं
(1) आत्मा को यहां गोपा कहा गया है | गोपा का अर्थ इन्द्रियों का स्वामी है अर्थात आत्मा इन्द्रियों से भिन्न है | इन्द्रियां आत्मा नहीं हैं, वरन् वह इनका स्वामी है | गोपा का अर्थ 'इन्द्रियों का रक्षक' भी होता है | इन्द्रियां तभी तक शरीर में कार्य करती हैं , जब तक आत्मा शरीर में रहता है | विचार से देखो, स्वामी के लिए वेद ने रक्षक होने का विधान कर दिया है |
(2) इन्द्रियों के आत्म पन का खण्डन कर वेद आत्मा को अनिपद्यमान = नष्ट न होने वाला बताता है | इन्द्रियां विनाशी हैं, शरीर भी विनाश को प्राप्त हो जाता है किन्तु आत्मा अनिपद्यमान = अविनाषी है अर्थात शरीर नाश के साथ आत्मा का नाश नहीं होता | इन्द्रियों के विकार से आत्मा नष्ट नहीं होता | इसी शब्द को मन में रखते हुए ब्र‌ह्मविद्या के पारंगत आचार्य याग्वल्क्य ने बड़े प्रबल शब्दों मे कहा है

अविनाशी वा अरेSयमात्माSनुच्छित्तिधर्मा | बृ0 4.5.14

अरे मैत्रयि ! यह आत्मा अविनाशी है, इसका उच्छेद कभी नही होता |
यदि आत्मा को अनित्य माना जाए तो दो बड़े भारी दोष आते हैं, आत्मा को नित्य माने बिना जिनका समाधान नहीं हो सकता | पहला तो यह कि आत्मा को अनित्य मानने का अर्थ है कि शरीर की उत्पत्ति के साथ आत्मा की भी उत्पत्ति होती है | उस अवस्था में प्रश्न‌‌ होता है - क्यों कोई दरिद्र के घर पैदा हुआ ? क्यों कोई ऐश्वर्य सम्पन्न दशा में उत्पन्न हुआ ? क्यों कोई अंगविकल उत्पन्न होता है ? क्यों किसी को सुडौल सुन्दर शरीर मिलता है | बिना कारण के भले बुरे शरीर के साथ संयोग से होने वाले सुख दुख भोगने का नाम है - अकृताभ्यागम - न किये को प्राप्त करना | दूसरा दोष है - कृतहान किए हुए का नाश | विनाशी आत्मा शरीर विनाश के साथ ही नष्ट हो जाना चाहिए | अन्त के कर्मों का फल भोगे बिना आत्मा नष्ट हो गया यह अव्यवस्था है, किन्तु संसार में सर्वत्र व्यवस्था है , अत: इस युक्ति विरुद्ध बात को मानो निराश करने के लिए ही वेद ने आत्मा को अनिपद्यमान कहा है | आत्मा को अविनाशी मानने से संसार रचना का प्रयोजन भी सिद्ध हो जाता है | आत्मा के कर्मों का फल देने के लिए यह जगत रचा गया है | जो लोग आत्मा की उत्पत्ति मानकर उसका नाश नहीं मानते, वे मानो तर्क से कोरे हैं | क्या कोई ऐसी वस्तु है जो उत्पन्न तो हो किन्तु नष्ट न होती हो ?
(3) आ च परा च पथिभिश्चरन्तम् कहकर वेद ने आत्मा की स्वतन्त्रता की घोष‌णा कर दी है | उलटे सीधे रास्तों से विचरना तभी हो सकता है जब चलने में , विचरने में स्वतन्त्रता हो | इस मन्त्र को लेकर आत्मतत्वग्यों ने आत्मा का स्थूल लक्षण माना है _ कर्त्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थ: जो करने , न करने अथवा उलटा करने में समर्थ हो | महात्मा लोग कहते हैं स्वतन्त्र: कर्त्ता = कर्त्ता उसे मानना चाहिए, जो कर्म करने में स्वतन्त्र हो |
(4) अच्छे मार्ग से चले, अच्छे कर्म करे, तो परिणाम भी अच्छा हो| बुरे आचरण का , पाप कर्म का फल भी विषम होता है | जो करता है , वही भरता है | स्वतन्त्रता का जैसा उपयोग किया जाएगा , उसका परिणाम भी वैसा ही होगा , इस बात को स सध्रीची: स विषूचीर्वसान: शब्दों के द्वारा प्रकट किया गया है |
संक्षेप में कर्म्मफलवाद का संकेत कर दिया गया है |
(5) इस बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्त: कहा गया है | वह संसारों में बार बार आता है | दूसरे शब्दों में उसे बार बार जन्म लेना प्ड़ता है | अर्थात् संसार में जब कोई प्राणी दुर्गति की अवस्था में दीखे, समझना चाहिए कि उसने स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया था | उसकी दुर्गति आकस्मिक, अहेतुक कारण के बिना नहीं है | कर्म करने में स्वतन्त्र होता हुआ आत्मा फल भोगने में परतन्त्र है |
आत्मा के सम्बन्ध में जो कुछ कहा गया है, वह युक्तियों से सिद्ध है; किन्तु वेद में अपश्यम् (मैने देख लिया है) शब्द कुछ और ही इशारा कर रहा है | वेद कहना चाहता है, आत्मा सम्बन्धी इन तत्वों को देखो, अनुभव करो , साक्षात करो , वैदिक योगी कह गये हैं -

आत्मा व‌ अरे द्रष्टव्या: श्रोतव्यो मनतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ! बृहदारण्यक 4.5.6

अरे मैत्रेयि !आत्मा का साक्षात्कार‌ करना चाहिए | दर्शन के साधन हैं - श्रवण , मनन तथा निदिध्यासन |
श्रोतव्या: श्रुतिवाक्येभ्या: = वेद वचनों के श्रवण द्वारा आत्मग्यान प्राप्त करना चाहिए | वेद् से बढ़कर आत्मग्यान कराने वाला ग्रन्थ ब्रह्माण्ड में दूसरा नहीं है |आत्मजिग्यासु को तो अवष्य वेद पढ़ना चाहिए |

मनतव्यश्चोपप्त्तिभि: = युक्तियों के द्वारा मनन करें |कहीं कोई श्रुति के नाम से अनर्गल बात ही न सुनाने लग जाए और् श्रोता भ्रम में न पड़ जाएँ , उसके लिए कहा _ मनतव्यश्चोपप्त्तिभि: = युक्तियों से मनन करें | इसी कारण तर्क विद्या को शास्त्रों में अध्यात्मविद्या कहा है |
जो मत युक्ति से भय खाते हैं, तर्क से डरते हैं वे अपने मत की असारता मानो स्वयं ही स्वीकार करते हैं | श्रवण , मनन के बाद निदिध्यासन आता है | बार बार निरन्तर वैसा आचरण निदिध्यासन कहाता है अर्थात अध्यात्म विद्या सुन छोड्ने और विचार लेने मात्र से सफल नही होती वरन् यह तो आचरण की वस्तु है |

श्रवण , मनन ,निदिध्यासनरूप साधनों का जिसने अभ्यास किया है, उसे दर्शन = आत्मदर्शन सुलभ होता है |