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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय (5)

Mahatma Narayan Swami ji's Brief life Sketch

...महात्मा जी अपने कुछ साथियों के साथ शोलापुर पहुंचे | शोलापुर में हैडक्वार्टर बनाया गया | रास्ते में बम्बई [मुम्ब‍ई] रुक कर वहां के लोगों से भी सहायता का वचन लेते आए | 29 अक्टूबर को स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी व आर्य रक्षा समिति के मन्त्री के साथ शोलापुर पहुंचे | स्टेशन पर स्वागत के बाद उन्हें एक किराए के मकान में ठहरा दिया गया | हिन्दुओं की बहुसंख्या होने पर भी लगभग सारी सरकारी नौकरियां (छोटी..बड़ी) मुसलमानों के लिए सुरक्षित थीं | योग्यता होनी भी आवश्यक नहीं थी | स्कूलों में मुसलमान मौलवी ही शिक्षक होते | वे पढ़ाते कम , धर्मप्रचार अधिक करते थे, व बच्चों का धर्म परिवर्त्तन करते | मन्दिरों, आर्यसमाजों पर "ओउम्" का झण्डा नहीं लगा सकते थे | हिन्दुओं को धार्मिक कृत्यों व नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था | 10 प्रतिशत् मुसलमानों के फन्दे में 86 प्रतिशत् हिन्दु बंधे हुए थे | कोई हिन्दू समाचार पत्र न तो प्रकाशित कर सकता था, न ही बाहर से मंगा सकता था | उन पर भी प्रतिबन्ध था | उधर जहां अंग्रेजी राज्य था वहां सब धार्मिक कृत्यों की व लिखने पढ़ने की स्वतन्त्रता थी | इसलिये हैदराबाद के आर्यों में असन्तोष पैदा हुआ और अपने अधिकार के लिये लड़ने का उत्साह भी |

(अब गतांक से आगे)

महात्मा नारायण स्वामी ने कुछ दिन रहकर स्थिति का जायजा लिया | उन्होंने देखा कि वहां के हिन्दू भी उन्हें मिलने से घबराते हैं | एक बार सबको स्थिति बतानी आवश्यक थी, सो आर्य महासम्मेलन बुलाने का निश्चय किया गया | इस सम्मेलन में सम्पूर्ण भारतवर्ष के आर्य प्रतिनिधि एकत्र हुए | इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से "सत्याग्रह" करने का निश्चय हुआ | इस प्रकार आन्दोलन की पृष्ठ भूमि तैयार की गई |

color="orange 500 सत्याग्रहियों ने उसी समय नाम लिखा दिये थे | सारे भारत से सत्याग्रहियों के जत्थे पहुँच रहे थे | 22,000 सत्याग्रहियों की सूचि तैयार हो ग‍ई | स्मरण रहे, इससे पहले हैदराबाद के आर्यों ने सत्याग्रह किया था और उस सत्याग्रह में 10-12 सत्याग्रही पुलिस की हिरासत में प्राण त्याग चुके थे | अतः जिन सत्याग्रहियों ने नाम लिखवाया, यही सोचकर कि अब प्राणों को भी न्योच्छावर करना पड़ा, तो करेंगे ||

साथ ही महात्मा नारायण स्वामी की गिरफ्तारी के बाद कौन नेतृत्व करेगा, यह श्रंखला भी तैयार की ग‍ई | इसके अतिरिक्त 51 हजार रुपये बैंक में जमा कर दिये गए कि धनाभाव से व्यवधान न पड़े |
31 जनवरी 1939 ई. को महात्मा नारायण स्वामी ने हेदराबाद शहर जाकर सत्याग्रह का श्री गणेश किया | पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और कार में बैठाकर शोलापुर की सीमा पर उतार दिया |

6 फरवरी को आपने बीस स्वयं सेवकों के साथ गुलबर्गा जाकर सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तारी दी | अदालत की औपचारिकताएं पूरी की गईं और एक वर्ष की सजा सुना दी ग‍ई | पहले कुछ दिन महात्मा जी को रस्सी बंटने का काम दिया गया | पर पन्द्रह दिन बीतते-बीतते खाने पीने की विशेष व्यवस्था कर दी ग‍ई व लिखने पढ़ने की सुविधा दे दी ग‍ई | बाद में आपके रहने की व्यवस्था अलग बंगले में कर दी गई, जहां दो सत्याग्रही भोजन आदि बनाने व दो अन्य कामों के लिए दे दिये गए | आपके साथ स्वामी स्वतन्त्रतानन्द‌ जी व अन्य एक व्यक्ति और था |

सत्याग्रह जोर पकड़ता गया | सारे भारत से सत्याग्रहियों के जत्थे हैदराबाद पहुँचने लगे | महात्मा नारायण‌ स्वामी जी सत्याग्रह के अन्त तक गुलबर्गा जेल (बंगले) में ही रहे | सत्याग्र्ह 6 महीने चला | आर्य समाज के मूर्धन्य नेता हैदराबाद में जमा हो गए | निजामशाही कुछ झुकी और समझौते को तैयार हो ग‍ई | 8 अगस्त 1939 को उनकी आर्य नेताओं की शर्तें मान ली ग‍ईं |

महात्मा नारायण स्वामी अपने साथियों के साथ रिहा हुए | सब जगह सत्याग्रहियों का शानदार स्वागत हुआ | सारे देश के हिन्दुओं में हर्षोल्लास की लहर दौड़ ग‍ई |

हैदराबाद सत्याग्रह - एक संक्षिप्त अवलोकन : -

31 जनवरी को महात्मा नायण स्वामी को सीमा पर छोड़ दिया गया | जेल जाने वाले सत्याग्रहियों का पहला जत्था गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालययों के छात्रों का था | 15 विद्यार्थियों नें दो दलों में बंटकर 2-3 फरवरी को सिकन्दराबाद में नारे लगाते हुए गिरफ्तारी दी | इसके बाद कुंवर चांद करण शारदा, श्री खुशहाल चन्द जी, महाशय कृष्ण जी, राजगुरु धुरेन्द्र शास्त्री, श्री वेदव्रत वानप्रस्थी, प. ज्ञानेन्द्र सिद्धान्तभूषण, प. बुद्धदेव विद्यालंकार, आचार्य देवेन्द्रनाथ शास्त्री, श्री चिदानन्द जी, श्री विनायक राव विद्यालंकार ने कुछ कुछ दिनों के अन्तर पर सत्याग्रहियों का नेतृत्व करते हुए गिरफ्तारी दी | इस सत्याग्रह में 12,000 से अधिक आर्यवीरों ने गिरफ्तारी दी ||

24 आर्यवीरों ने जेल में अपने प्राण त्याग दिये | सत्याग्रह से पहले 15 आर्य वीर धर्मान्ध क्रूरता के शिकार होकर अपने प्राण गंवा चुके थे |

इस सत्याग्रह में आर्यसमाज का लगभग 20 लाख रुपया खर्च हुआ | 8 मार्च 1939 को अंग्रेज सरकार के इशारे पर निजाम नें सब शर्तें मान लीं |

जेल से छूटे हुए सत्याग्रहियों का झांसी में सामुहिक अभिनन्दन हुआ | हर रेलवे स्टेशन पर लोगों की भीड़ उनके स्वागत को उमड़ रही थी | देहली में क्वींस गार्डन में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया | हजारों नर नारियों ने विजयी होकर आए सत्याग्रहियों का स्वागत किया और बलिदान देने वालों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये |

इन स्वागत समारोहों में शामिल होते हुए महात्मा जी अन्त में 28 अगस्त को आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर पहुँचे | जहां पंचपुरी की सभी संस्थाओं (गुरुकुल कांगड़ी, महाविद्यालय ज्वालापुर, आर्य वानप्रस्थ आश्रम आदि सभी संस्थाओं) की ओर से आपका स्वागत किया गया | ज्वालापुर में दो दिन रुक कर आप सीधे अपने हैडक्वार्टर रामगढ़ तल्ला के नारायण आश्रम पहुँचे | 15 सितम्बर 1939 को रामगढ़ वासियों की इच्छा, प्रेरणा, सहयोग एवं सहायता से "नारायण स्वामी स्कूल" की आधार शिला रखी ग‍ई | तत्कालीन मुख्यमन्त्री गोविन्द बल्लभ पंत ने यथा-साध्य सहायता देने का वचन दिया | सन् 1943 में स्कूल हाईस्कूल बन गया |

वे कुछ दिनों के लिए पहाड़ पर भी जाते थे | उन दिनों वहां के निवासियों के लिए कार्य करते रहते थे | पहाड़ पर उस समय अन्धविश्वास से उत्पन्न कुप्रथाएं प्रचलित थीं ऊंची और नीची जाती का भेद था | बालविवाह का आपने विरोध किया और विधवा विवाह का प्रचलन आरम्भ किया ||

गढ़वाल में मुख्यतः दो जातियां हैं बिष्ट उच्च, एवं शिल्पकार (हरिजन) | उच्च जातियां अपने धन व अधिकारों के कारण नीची जातियों पर अत्याचार करती थीं | नीची जाति का जो भी व्यक्ति आर्य बनता उसे आर्य मान लिया जाता | एक प्रथा के अनुसार शिल्पकार के वर-वधु को बिष्टों के मन्दिर व देवस्थानों के सामने डोली से उतर कर पैदल चलना पड्ता था | आर्य बने शिल्पकारों का कहना था कि जब हम मूर्ति पूजा को ही नहीं मानते तो देवालयों के सामने क्यों उतरें ?

महात्मा नारायण स्वामी के नेतृत्व में इस प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन किया गया और सफल भी हुए | इलाहाबाद कोर्ट ने एक प्रसिद्ध फैंसले में आर्यों की डोला-पालकी निकालने के अधिकार को स्वीकार कर लिया ||

इसी प्रकार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर महेश प्रसाद जी की बेटी को विश्वविद्यालय के वेद विभाग में दाखिला देने के लिए भी आपने बहुत प्रयत्न किया और कुमारी कल्याणी को दाखिला मिल जाने से अन्य इच्छुका कन्याओं के लिए भी रास्ता खुल गया |

(क्रमशः)