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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मनुष्य बन

ओउम् | तन्तुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् |
अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव‌ जनया दैव्यं जनम् ||

ऋग्वेद 10|53|6||

शब्दार्थ ‍ -

रजसः...................संसार का
तन्तुम्..................ताना-बाना
तन्वम्..................तनता हुआ (भी)
भानुम्...................प्रकाश के
अनु+इहि...............पीछे जा |
धिया...................बुद्धि से
कृताऩ्..................बनाये, परिष्कृत किये हुए
ज्योतिष्मतः............ज्योतिर्मय, प्रकाशयुक्त
पयः रक्ष...............मार्गों की रक्षा कर,
जोगुवाम्...............निरन्तर ज्ञान और कर्म का अनुष्ठान करनेवालों के
अनुल्बणं...............उलझनरहित
अपः....................कर्म्मों को
वयत...................विस्तृत कर | (इन उपायों से)
मनुः भव...............मनुष्य बन (और)
दैव्यम्..................देवों के हितकारी
जनम्..................जन को, सन्तान को
जनय..................उत्पन्न कर |

व्याख्या -

संसार को जिसकी आवश्यक्ता रही है और रहेगी, और इस समय भी जिसकी अत्यन्त आवश्यक्ता है, उस तत्व का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है | वेद में यदि और उपदेश न होता, केवल यही मन्त्र होता, तब भी वेद का आसन संसार के सभी मतों और सम्प्रदायों से उच्च रहता |

वेद कहता है - मनुर्भव - मनुष्य बन -

आज का संसार ईसाई बनने पर बल देता है अर्थात् ईसा का अनुकरण करने के लिए यत्नवान् है | संसार का एक बड़ा भाग बौद्ध बनने में लगा हुआ है अर्थात बुद्ध के चरणचिन्हों पर चलता हुआ
बुद्धं शरणं गच्छामि का नाद गुँजा रहा है | इसी प्रकार संसार का एक भाग मुहम्मद का अनुगमन करने में तत्पर है | महापुरुषों का अनुगमन प्रशंसनीय है; किन्तु थोड़ा सा विचार करें तो एक विचित्र दृष्य सामने आता है , एक अद्भुत तमाशा देखने को मिलता है | ईसाई ने ईसा का नाम लेकर जो कुछ अपने भाइयों के साथ किया, उसकी स्मृति ही मनुष्य को कँपा देती है | बिल्ली के बच्चे तक की रक्षा करने वाले मुहम्मद की उम्मत का इतिहास भी भाइयों के रक्त से रञ्जित है | आः ! जिसे मनुष्य कहते हैं वह मनुष्यता का वैरी हो रहा है | हमने संकीर्णता के कारण संकुचित दल बना डाले; एक दल दूसरे दल को दलने-मसलने-कुचलने पर तत्पर है | आज मनुष्य, मनुष्य का वैरी हो रहा है, अतः वेद कहता है - मनुर्भव ‍- मनुष्य बन - ईसाई, या बौद्ध या मुसलमान या किसी दूसरे सम्प्रदाय में सम्मिलित होने में वह रस कहाँ जो 'मनुष्य' बनने में है | ईसाई बनने में केवल ईसाइयों को ममत्व से देखूँगा | बौद्ध बनने से और सबको असद्धर्मीं मानूँगा | मुसलमान होकर मोमिनों को ही प्यार का अधिकारी मानूँगा, किन्तु मनुष्य बनने पर तो विश्व=सारा संसार मेरा परिवार होगा, सब पर मेरा एक समान प्यार होगा | वसुधा को कुटुम्ब माना तो सारे कुटुम्ब से प्यार होना चाहिए | कुटुम्ब में ममता का साम्राज्य होता है | विषमता का व्यवहार कुटुम्ब की एकतानता पर वज्रप्रहार है | ममता स्थिर रखने के लिए स्नेही का व्यवहार करना होता है | तभी तो वेद ने कहा -
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे (यजु. 36|18) = सबको मित्र की स्नेहसनी दृष्टि से देखें |

यहाँ वेद मनुष्यसीमा से भी आगे निकल गया है | प्यार का अधिकारी केवल मनुष्य ही नहीं रहा, वरन् सब भूत=प्राणी हो गये | यह उचित भी है, क्योंकि 'मनुष्य' शब्द का अर्थ है -
मत्वा कर्माणि सीव्यति (निरु. 3|7) जो विचार कर कर्म्म करे | कर्म्म करने से पूर्व जो भली प्रकार विचारे कि मेरे इस कर्म्म का फल क्या होगा ? किस-किस पर इसका क्या-क्या प्रभाव होगा ? यह कर्म्म भूतों के दुःख=प्राणियों की पीड़ा का कारण बनेगा या भूतहित साधेगा ?

मनुष्य यदि सचमुच मनुष्य बन जाए तो संसार सुखधाम बन जाए | देखिए, थोडा विचारिए, थोडा सा मनुष्यत्व काम में लाइए | वेद के इस उपदेश के महत्व को ह्रदयङ्गम कीजिए | धार्मिक दृष्टि से विचारें तो मनुष्य समाज के दो बड़े विभाग हो सकते हैं - ईश्वरवादी, तथा अनीश्वरवादी | सभी ईश्वरवादी ईश्वर को 'पिता' मानते हैं | वेद इससे भी आगे जाता है | वह ईश्वर को पिता के साथ माता भी मानता है यथा - त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ | अधा ते सुम्नमीमहे ||
(ऋ. 8|98|11) अर्थात् सबको ठिकाना देनेवाले ! सचमुच तू हमारा पिता है, जीवों की उत्पत्ति आदि नानाविध कर्म्म करनेवाले परमात्मन् ! तू हमारी माता है, अतः हम तेरा ह्रदय Good wishes चाहते हैं | माता-पिता की शुभाशीशः, शुभकामना सन्तान का कितना कल्याण करती है ! परमपिता दिव्य माता की भव्यभावना हमारा कितना इष्ट कर सकती है इसकी पूरी कल्पना कौन कर सकता है |

प्रभु हमारे माता-पिता हैं और हम उनकी सन्तान, किन्तु कुसन्तान, जघन्य सन्तान, अयोग्य सन्तान, विद्रोही सन्तान | हम आपस में लड़ते हैं | भाई भाई की लड़ाई ! भगवान ने कहा था - सं गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जायताम् (ऋ. 10|191|2) तुम्हारी चाल एक हो, तुम्हारा बोल एक हो, तुम्हारा विचार एक हो | हमारी चाल आज भिन्न-भिन्न ही नहीं, परस्पर विरुद्ध भी है | आज हम संवादी नहीं, विवादी हो गये हैं | आज हम 'संवाच' नही 'विवाच' हो गये हैं | इसका कारण हमारा 'वैमनस्य' =मनोभेद=मतभेद=विचारभेद है | एक चाल=संगति, एक बोल=संउक्ति के लिए 'सौमनस्य'=मन की एकता=मत की अभिन्नता=विचार की समता की आवश्यक्ता है | पिता का आदेश है, माता का संदेश है = सं गच्छध्वं , हम उसके विपरीत चलकर पिता का अधिकार, माता का प्यार कैसे पा सकते हैं ! मानव ! ठहर ! सोच तू कहाँ चला गया ? कहाँ भटक गया ?

मैं भटक गया! बहक गया! वज्र भ्रान्ति! ईश्वर ईश्वर कह रहे हो, कहाँ है ईश्वर ? जब ईश्वर ही नहीं, तब उसका माता पिता होना कैसे ? और हम सब मनुष्य भाई-भाई कैसे ?
सति कुडूये चित्रम् ! आधार होगा तो चित्र बनेगा !

अच्छा ! ईश्वर को ही जवाब ! जाने दो तुम्हारा मन ईश्वर को नहीं मानता, न सही | भगवान का मानना बड़े भाग्य की बात है | किन्तु भगवान को न मानकर भी मानव मानव का भाई है |

कैसे ? सुनो ! सावधान होकर सुनो ! तुम दो की सन्तान हो ना ? घबराने क्यों लगे ? इसमें अचम्भे की बात ही क्या है ? माता और पिता के संयोग से ही मनुष्य की उत्पत्ति होती है | अकेली स्त्री से सन्तान नहीं हो सकती | अकेले पुरुष से कुछ नहीं बनता | सृष्टि चलाने के लिए स्त्री-पुरुष, रवि-प्राण का संयोग आवश्यक है अर्थात् दो मिले तो तुम एक आये अर्थात् तुममें दो का रुधिर आया, और ये दो भी तो दो-दो की सन्तान हैं अर्थात् हममें चार का रुधिर आया | उन चार के जो और सन्तान हुई, उनमें भी उनका रुधिर आया | कहो, वे और तुम सब सपिण्ड हुए या नहीं ? तनिक और आगे चलो, वे चार आठ के सन्तान, वे आठ सोलह के, इस प्रकार ज्यों ज्यों ऊपर को जाओगे, अपने खून का सम्बन्ध बढ़ता हुआ पाओगे |

कहो, हम हुए न भाई-भाई ? बताओ, भाई-भाई का व्यवहार कैसा होना चाहिए ? क्या भाई-भाई का गला काटे, यह अच्छा है अथवा भाई के पसीने के बदले अपना खून बहाये यह अच्छा है ? भाई को भाई से भय नहीं होता | भाई को अपने से अभिन्न माना जाता है | डर होता है तो दूसरों से - द्वितियाद्वै भयं भवति - भाई को देखते ही ह्रदय हर्षित हो उठता है | आ ! सारे संसार को भाई बना | भय को भगा | सर्वत्र निर्भय-निष्कण्टक आ और जा |

कहो वेद का मनुर्भव कहना कल्याणसाधक है वा नहीं ? निस्सन्देह मनुष्य बनना संसार में शान्ति स्थापन करने का एकमात्र साधन है | सभी मनुष्य मनुष्य बन जाएँ तो यह मार-काट, यह लूट-खसोट उसी क्षण समाप्त हो जाए |

निस्सन्देह मनुष्यत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है | शङ्कराचार्य जी ने कहा - जन्तूनां नरजन्म दुर्लभम् | सचमुच नरजन्म पाना दुस्साध्य है किन्तु असाध्य नहीं | वेद इससे आगे जाता है - मनुष्य जन्म, नर-तन तो तूने प्राप्त कर लिया, 'मनुष्य भी बन' ! केवल नर-तनधारी ही न रह, नरमनधारी भी बन ! इसीलिए वेद ने कहा मनुर्भव |

यद्यपि मनुर्भव कहने में ही सब बात आ गई, किन्तु भगवती श्रुति उसके उपाय भी बता देती है | वैसे तो सारे वेद ही नरतनधारी को मनुष्य बनाने के लिए हैं, किन्तु इस मन्त्र में जो कुछ कहा है, उसपर भी यदि आचरण किया जाए तो अभीष्ट सिद्ध हो जाए |

मनुष्य बनने का पहला साधन - तन्तुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि | संसार का ताना-बाना बुनता हुआ भी तू प्रकाश का अनुसरण कर अर्थात तेरे समस्त कर्म्म ज्ञानमूलक होने चाहिएँ | अज्ञान, अन्धकार तो मृत्यु के प्रतिनिधि हैं | अन्धकार से उल्लू को प्रीति हो सकती है, मनुष्य को नहीं | मनुष्य बनने के लिए अन्धकार से परे हटना होगा | ऋषि ठीक ही कहते हैं -

तमसो मा ज्योतिर्गमय ! (शत. 14|3|1|30) = अन्धकार से हटाकर मुझे प्रकाश प्राप्त करा |

अन्धकार में कुछ नहीं सूझता; सब क्रियाएँ, चेष्टाएँ रुक जाती हैं, अतः वेद कहता है - भानुमन्विहि - प्रकाश के पीछे चल |

प्रकाश का अनुसरण करनामात्र ही प्रयाप्त नहीं है, कुछ और भी आवश्यक होता है, प्रकाश के पीछे तभी चला जा सकता है ! जब प्रकाश स्थिर हो | यदि प्रकाश विछच्द्युटा के समान चञ्चल हो तो उसका अनुसरण कैसे हो सकता है | इस आशय को लेकर वेद ने दूसरा उपाय बतलाया है -

ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् - प्रकाश के मार्गों की रक्षा कर, उनमें अपनी बुद्धि से परिष्कार कर |

संसार के सभी देशों में रोशनी बुझानेवालों के लिए दण्ड का विधान है, किन्तु संसार की गति अति विचित्र है | संसार में ऐसे भी हुए हैं और कदाचित् आज भी ऐसे मनुष्याकारधारी प्राणी हैं, जो प्रकाश का नाश करते रहे और कर रहे हैं | उन्हें क्या कहोगे, जिन्होंने सिकन्दरिया का विशाल पुस्तकालय जला दिया ? उन्हें क्या कहोगे जो वर्षों भारत के ज्ञानभण्डार से हमाम=स्नानागार गरम करते रहे ? उनका क्या नाम धरोगे जिन्होंने चित्रकूट का करोड़ो रुपयों का पुस्तकालय अग्निदेव की भेंट कर डाला ? ये सब नरतनधारी थे, किन्तु क्या ये मनुष्य नाम के भी अधिकारी थे, इसमें सन्देह है | मनुष्य बनाने का साधन नष्ट करनेवाले मनुष्य कैसे ? वे कोई मनुष्यता के वैरी थे | उनको क्या कहोगे जो आज भी ज्ञान भण्डार को जल देवता के अर्पण कर रहे हैं ? उनको क्या कहोगे, जो प्रकाश को दूसरों तक नहीं जाने देते, अपने तक रोक रखते हैं ? ये सब लाखों ज्ञानी ज्ञान अपने साथ ले जाते हैं | वह ज्ञान किस काम का ? वेद कहता है - ‍ ज्योतिष्मतः पथो रक्ष - ज्ञान मार्गों की रक्षा कर ! पूर्वजों से प्राप्त ज्ञानराशि की रक्षा कर |

मानव ! तू वायुयान में बैठकर आकाश की ओर उड़ जाता है, अन्तरिक्ष की सैर करता है | ज्ञात है यह कैसे सम्भव हो सका ? वेद के अन्तरिक्षे रजसो विमानः की बात नहीं कहूँगा और न ही कहूँगा रामायण के पुष्पक विमान की बात | आज के विमान का वर्णन सुनाउँगा | किसी भद्र के चित्त में किसी पक्षी को उड़ता देख उड़ने की समाई | उसने कृत्रिम पंख लगाकर उड़ने की ठानी | बेचारा गिर पड़ा; उसने अपना मस्तिष्क लगाया | अब सोच मानव ! यदि उस प्रथम त्यागी के ज्ञान को भुला दिया जाता तो नये सिरे से यत्न करना पड़ता; फल क्या होता ? वायुयान न बन पाता, अतः वेद का यह कहना ज्योतिष्मतः पथो रक्ष बहुत ही सारगर्भित है |

हाँ, यदि उस उड़नेवाले ने जितना यत्न किया था उतने की ही रक्षा की जाती, उसमें अपना भाग न डाला जाता, तो भी वायुयान न बन पाता | अतः वेद ने ठीक ही कहा - धियाकृतान् - प्रकाश की रक्षा अवश्य कर किन्तु उसमें अपना भाग भी डाल | अन्यथा दीपक बुझ जाएगा |

वैदिकों ने इस तत्व को समझकर प्रथम संस्कृति = वेद तथा उसके अङ्गोंपाङ्गों की रक्षा करने में प्राणपण से यत्न किया है | अतः वेद के शब्दों में कहा - नम ऋषिभ्यः पूर्वजेभ्याः |

ज्ञान का पर्यवसान कर्म्म में होता है | ज्ञान का अनुसरण करने के लिए ज्ञान के रक्षण और परिवर्धन की नितान्त आवश्यक्ता है | किन्तु ज्ञान का प्रयोजन ? 'ज्ञान ज्ञान के लिए' यह सिद्धान्त प्रमादियों का है | ज्ञान की सफलता कर्म में है | अतः वेद कहता है -

अनुल्बणं वयत जोगुवामपः = ज्ञाननुसार कर्म्म करनेवालों के उलझनरहित कर्म्मों को करो |

लोकोक्ति है - लोकोSयं कर्म्मबन्धनः कर्म्म बन्धन का कारण है | वेद कहता है कर्म्म तो अनिवार्य है उससे छूट नहीं सकते हो | अतः ऐसे कर्म्म करो जो उलझन को मिटानेवाले हों, न कि उलझन को बढ़ाने वाले | जो कर्म ज्ञानविरहित होंगे,ज्ञान के विपरीत होंगे, वे अवश्य उलझन पैदा करेंगे, अतः ऐसा न कर जिससे संसार की उलझनें और बढ़ें | तू तो पहले ही बहुत उलझा हुआ है | तुझे सूझता नहीं कि कौन सा अनुल्बण है और कौन सा उल्ब‌ण ? तुझे कोई अंगुलि पकड़कर बताये | अच्छा जहाँ तू रहता है, वहाँ कोई ब्रह्मनिष्ठ भी है या नहीं ? उन ब्रह्मनिष्ठों का व्यवहार देखना, जो सत्यप्रिय, मधुरभाषी, निष्काम, सर्वहितकारी हों | देख, वे कैसे रहते हैं ? उनका अनुसरण कर, किन्तु ज्ञान को हाथ से न जाने देना, इन साधनों के अनुष्ठान से निस्सन्देह मनुष्यता सुलभ हो जाती है | किन्तु, मनुष्यत्व के साथ वेद ने कर्त्तव्य भी लगा दिया है -

जनया दैव्यं जनम् = दैव्य जन पैदा कर |

मनुष्य को मनुष्यता की सारी सामग्री समाज से मिलती है, अतः उसे चाहिए कि वह भी समाज को कुछ दे जाए | समाज का सारा कार्य्यभार देवोँ के सहारे चलता है | प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि ऐसे सर्वहितकारी देवों का कुछ न कुछ प्रत्युपकार अवश्य करें | इस भाव को लेकर वेद ने कहा -

जनया दैव्यं जनम् -

दैव्य=देवहितकारी जन को कौन पैदा करेगा ? क्या राक्षस, दस्यु ? कभी नहीं | अतः देवजनहितकारी सन्तान उत्पन्न करने के लिए मनुष्य को स्वयं देव बनना पड़ेगा अर्थात् मनुष्य बनकर जब सन्तान उत्पन्न करने में प्रवृत होने लगे, तब उसके ह्रदय में कुकाम की कुवासना न हो, वरन् जन-समाज, नहीं नहीं, देवसमाज के हित की भावना हो |

वेद मनुष्य बनाकर चुपके से देवत्व के मार्ग पर ला खड़ा करता है | यह विशेष मनन करने की बात है |

स्वामी वेदानन्दतीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)