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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

SANGATHAN IS THE MANTRA

ओ3म्

संगच्छध्वम् संवदध्वम् संवोमनांसि जानताम्
सुधा सावंत

यह समय की पुकार है कि हम मिल कर रहें। मिलकर चलें, मिलकर बोलें और समानरूप से सोचे। ऋग्वेद के दसवें मण्डल का अंतिम सूक्त है यह संगठन सूक्त। यह पंक्ति उस सूक्त का एक भाग है। निश्चित रूप से अंत में कही गई बात पूरी बात का सार होती है। ईश्वर हमें उपदेश दे रहे हैं कि जीवन में मिल कर रहना, संगठित होकर काम करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। हम मिलकर चलें, एक सी ही बात कहें और हमारे सोचने विचारने में समानता हो, तभी हमारा काम ठीक होता है, काम में सफलता मिलती है अन्यथा हम लक्ष्य से कोसो दूर अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलापते रह जाते हैं। हम अपना स्वार्थ साधते रहते हैं और लड़ाइयां होती रहती हैं।

मंत्र में बहुत मनोवैज्ञानिक ढंग से उपदेश दिया गया है। हमारा चलना दिखाई देता है, बोलना सुनाई देता है – पर इन सब का आधार मन है – दिखाई नही देता पर प्रेरणा देने वाला, बोलने व चलने की प्रेरणा देने वाला वही है। मन इस पर नियंत्रण रखता है कि हम साथ चलें और एक सा बोलें। सैनिको के कदम-ताल चलने में क्यों अधिक बल रहता है क्योंकि अभ्यास कराते समय बोलते भी हैं दाएं-बाएं या लेफ्ट-राईट-लेफ्ट-राईट। तो इस तरह पैरो को उठाना, मुख से बोलना और मन की प्रेरणा यह सब क ही उद्देश्य के लिए काम करते हैं इसलिए शक्ति का प्रतीक बन जाते हैं।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यूं अनेक पशु पक्षी अपने अपने झुंड में रहते हैं। झुंड के अपने कुछ नियम भी होते हैं।सभी एक दूसरे की सहायता भी करते हैं। आपने देखा होगा कि पक्षी के घोंसले के पास कोई बिल्ली आ रही हो या चील कौआ आ रहा हो तो अन्य चिड़िया चीं-चीं करते हुए सतर्क हो जाती है। कहते हैं जंगल में जंगली भैंसे तो संगठित हो कर गोलाकार बना कर खड़े हो जाते हैं और शेर का भी मुकाबला करते हैं। मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है अत: वह अपने बुद्धि बल के साथ संगठित हो कर चलता है तो समाज अच्छी तरह उन्नति करता है। इसीलिए ऋषियों के माध्यम से ईश्वर हमें आदेश देते हैं –

हो सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से, जिससे बढ़े सुख-संपदा।।

आज समाज की, देश की स्थिति इससे विपरीत चल रही है। हमें पता है कि संगठन में शक्ति है – संघे शक्ति। परंतु आज नेतृत्व ऐसे लोगो के पास है जो जनता को घर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, प्रांत के नाम पर बांट रहे हैं। नेताओ का चुनाव भी उनकी योग्यता के आधार पर नही होता जाति या घर्म के नाम पर होता है। जबकि कहा जाता है –

जहां सुमति तहं संपति नाना।
जहां कुमति तहं विपति निधाना।।

जहां सब मिल कर सोचते व निर्णय लेते हैं तो वहाँ धन – सम्पति व सफलता मिलती है और जहाँ बुरे विचारो के साथ छल- कपट के साथ निर्णय लिए जाते हैं वहाँ हर तरफ से विपत्तियाँ आ जाती है, दुख भोगना पड़ता है। त्रेतायुग में जब कैकयी ने मंथरा की बुरी सलाह के अनुसार काम किया तो अपने पुत्र भरत को भी खोया, पति दशरथ को भी और नाम भी बदनाम हुआ। द्वापरयुग में मामा शकुनी के कुविचारों , कुयोजनाओं के अनुसार काम करमे पर दुर्योधन सम्पूर्ण वंश के नाश का कारण बना। अपने मानव समाज और उसकी व्यवस्था को एक मशीन की तरह मानें तो जैसे मशीन के हर पुर्ज़े का महत्व है, हर पुर्ज़े का अपना काम है। सब पुर्ज़े ठीक से अपना अपना काम कर रहे हैं तो मशीन ठीक से चलती रहती है यदि कौई एक छोटा सा पूर्ज़ा भी काम न करे तो मशीन रुक जाती है। इसी तरह मानव समाज ठीक से चलता रहे , मिलकर काम करें इसके लिए ईश्वर का आदेश है मिलकर चलो , मिलकर बोलो और एक ही तरह सोचो ताकि लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।

इस मिलकर चलने की प्रक्रिया में मनुष्य को अपना स्वार्थ छोड़ना होगा, घमण्ड छोड़ना होगा। क्योंकि, ये विरोधी विचार है, नकारात्मक चिंतन को उपजाते हैं। हम सभी दीवार के कंगूरे नही बन सकते हैं किसी को नींव का पत्थर भी बनना है। और यह भी सत्य है, कि नींव के पत्थर की मज़बूती पर ही भवन की मज़बूती निर्भर करती है। समाज में भी कोई काम छोटा या कोई बड़ा नहीं है। इसके लिए ज़रुरी है कि सब अपना काम सुव्यवस्थित ढंग से करते रहें। एक दूसरे की सहायता करते हुए आगे ढंग से करते रहें। एक दूसरे की सहायता करते हुए आगे बढ़ें। शतपथ ब्राह्मण में इस बात को बड़े सुन्दर ढंग से दर्शाया गया है। देवता व असुर प्रजापति है घमण्डी भी। भोजन सामने है। हाथ कोहनी के पास मुड़ता नही है, असुर अपने ही मुख में ग्रास डालने के कारण भोजन नहीं कर पाते है, परन्तु देवता स्वयं अपने मुख में ना डाल कर दूसरे को खिलाते है। हाथ नहीं मुड़ता तो इससे उन्हें भोजन खाने में कोई कष्ट नहीं हुआ क्योंकि सभी देवता भोजन दूसरे के मुख में डाल रहे थे। यह दृष्टान्त इसी बात को दर्शाता है कि स्वार्थ छोड़कर दूसरे को खिलाने से सब का पेट भर जाता है। लौकिक कहानियों में अंधे और लंगड़े का सहयोग भी अच्छा उदाहरण है। अंधा देख नहीं पाता चल सकता है और लगड़ा देख पाता है चल नहीं सकता। अंधे ने लगड़े को अपने कंधे पर बैठाया ।अंधा चल रहा था और लगड़ा मार्ग दिखा रहा था। दोनों ही लक्ष्य तक पहुँच गए।

कहानियां तो केवल उदाहरण है। सत्य तो यही है कि एक दूसरे की सहायता करते हुए मिलकर चलो। सारे सांसारिक सुख व सम्पत्तियाँ तुम्हारे लिए है।