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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (2)

..गतांक से आगे -

भाषार्थ - और भी इस विषय में ऋग्वेद का प्रमाण है कि -(तद्वि..) | (विषणुः) अर्थात् व्यापक जो परमेश्वर है उसका (परमं) अत्यन्त उत्तम आनन्दस्वरूप (पदं) जो प्राप्ति होने के योग्य अर्थात् जिसका नाम मोक्ष है उसको (सूरयः) विद्वान लोग (सदा पश्यन्ति) सब काल में देखते हैं | वह कैसा है कि सब में व्याप्त हो रहा है , और उसमें देश काल और वस्तु का भेद नहीं है, अर्थात् उस देश में है और इस देश में नहीं, तथा उस काल में था और इस काल में नहीं, उस वस्तु में है और इस वस्तु में नहीं, इसी कारण से वह पद सब जगह में सबको प्राप्त होता है, क्योंकि वह ब्रह्म सब ठिकाने परिपूर्ण है | इसमें यह दृष्टान्त है कि (दिवीव चक्षु राततम्) जैसे सूर्य का प्रकाश आवरणरहित आकाश में व्याप्त होता है, और जैसे उस प्रकाश में नेत्र की दृष्टि व्याप्त होती है,
इसी प्रकार परब्रह्म पद भी स्वयंप्रकाश सर्वत्र व्याप्तवान् हो रहा है | उस पद की प्राप्ति से कोई भी प्राप्ति उत्तम नहीं है | इसीलिये चारों वेद उसी की प्राप्ति कराने के लिये विशेष करके प्रतिपादन कर रहे हैं |

इस विषय में वेदान्त शास्त्र में व्यासमुनि के सूत्र का भी प्रमाण है - (तत्तु समन्वयात्) | सब वेदवाक्यों में ब्रह्म का ही विशेष करके प्रतिपादन है | कहीं कहीं साक्षात् रूप और कहीं कहीं परम्परा से |
इसी कारण‌ से वह परब्रह्म वेदों का परम अर्थ है |

तथा इस विषय में यजुर्वेद का भी प्रमाण है कि - (यस्मान्न जा..) जिस परब्रह्म से (अन्यः) दूसरा कोई भी (परः) उत्तम पदार्थ (जातः) प्रकट (नास्ति) अर्थात् नहीं है (य आविवेश भु..) जो सब विश्व अर्थात् सब जगह में व्याप्त हो रहा है (प्रजापतिः प्र..) वही सब जगत् का पालन कर्त्ता और अध्यक्ष है, जिसने (त्रीणि ज्योति ..षि..) अग्नि, सूर्य और बिजुली इन तीन ज्योतियों को प्रजा के प्रकाश होने के लिये (सचते) रचके संयुक्त किया है, और जिसका नाम (षोडशी) है अर्थात् (1) ईक्षण जो यथार्थ विचार (2) प्राण जो कि सब विश्व का धारण करने वाला (3) श्रद्धा सत्य में विश्वास (4) आकाश (5) वायु (6) अग्नि (7) जल (8) पृथिवी (9) इन्द्रिय (10) मन अर्थात ज्ञान (11)अन्न (12) वीर्य अर्थात् बल और पराक्रम (13) तप अर्थात् धर्मानुष्ठान सत्याचार (14) मन्त्र अर्थात् वेदविद्या (15) कर्म अर्थात् सब चेष्ठा (16) नाम अर्थात् दृश्य और अदृश्य पदार्थों की संज्ञा,
ये ही सोलह कला कहाती है | ये सब ईश्वर के बीच में है, इससे उसको षोडशी कहते हैं | इन षोडश कलाओं का प्रतिपादन प्रश्नोपनिषद् के छठे प्रश्न में लिखा है |

इससे परमेश्वर ही वेदों का मुख्य अर्थ है और उससे पृथक जो यह जगत् है सो वेदों का गौण अर्थ है | और इन दोनों में से प्रधान का ही ग्रहण होता है |
इससे क्या आया कि वेदों का मुख्य तात्पर्य परमेश्वर ही की प्राप्ति कराने और प्रतिपादन करने में है | उस परमेश्वर के उपदेशरूप वेदों से कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों काण्डों का इस लोक और परलोक के व्यवहारों के फलों की सिद्धि और यथावत् उपकार करने के लिये सब मनुष्य इन चार विषयों के अनुष्ठानों में पुरुषार्थ करें, यही मनुष्य देह धारण करने के फल हैं |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)