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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप(3) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *
(गतांक से आगे) -

यद्यपि मार्ग में 'भूर्यस्पष्ट कर्त्वम्' अनेक प्रकार की कर्म श्रंखलाओं को अवस्था के अनुसार अपनाना पड़ेगा | परन्तु उन सब कर्म श्रंखलाओं का रुख हमें उसी और फेरना पड़ेगा जिस और हमारे लक्ष्य का प्रकाश स्तम्भ खड़ा हुआ है | उपासक का अपना लक्ष्य है भगवान का 'उज्जवल प्रकाश' | भगवान् की विश्व कल्याण को लक्ष्य में रखकर बहने वाली कर्म गंगा को ही अपने लक्ष्य तक पहुंचने का उसने साधन बनाया है, वे सब वे ही कर्म हैं जिन्हें 'यज्ञीय कर्म' कहते हैं | यज्ञीय कर्म करने वाले अधिकारी की दृष्टि कर्म तक ही सीमित रहती है 'कर्म से फल तक पहुँचने का उसे वह अवसर ही नहीं देती' और यदि उसने ऐसा होने दिया तो उसके कर्म की भावना समाप्त हो जावेगी | इसलिए उपासक कर्म उस चतुराई से करे कि इसकी दृष्टि कर्त्तव्य तक ही सीमित रहे, कर्मफल तक न जाने पावे | इसी को कहते हैं 'योगः कर्मसु कौशलम्' यदि वह फल में ही उलझा रहा तो लोभ उसे आगे न बढ़ने देगा | और फिर उसका, कर्म की एक श्रंखला को छोड़ कर दूसरी पर पहुँचना, कठिन हो जावेगा |तृष्णा; उपासना के क्षेत्र का उपासक के लिए बिछाया गया जाल है और लोभ तृष्णा का पिता है अतः इस जाल से बचने के लिए उपासक को कर्मफल से दृष्टि को बचाना ही चाहिए | जो मनुष्य दीक्षित हो दृढ़ संकल्प को धारण कर कर्मक्षेत्र में आ खड़ा होता है उसके लिए आगे बढ़ चलना कठिन नहीं रह जाता | यद्यपि हम आगे पग रखते हुए पहली बार भय खाते हैं, सोचते हैं कि यह कर्म समुदाय कितना विशाल पर्वत शिखिर है | हम कैसे वहां पहुंचेंगे और कैसे पार जाएँगे ? ऐसा मन में सोचकर किंकर्त्तव्य विमूढ़ होकर हम खड़े ही रह जाते हैं | पर हम ज्यों ही आगे बढ़ते हैं आगे का मार्ग वह कर्म हमें स्वयं ही बताता चलता है | हमारे हाथ में एक छोटी सी लालटेन है | हम आरम्भ में खड़े सोच रहे हैं - मुझे पचास कोस जाना है | मेरी लालटेन का प्रकाश तो थोड़ी दूर तक ही पहुंचता है, भला यह इतना लम्बा मार्ग कैसे पार करूंगा | परन्तु सोचने पर भी कुछ दृड़ होकर हम आगे बढ़ना आरम्भ कर देते हैं; तो वह ही लालटेन का प्रकाश आगे बढ़ता चला जाता है और उसी प्रकाश से आगे का मार्ग भी प्रकाशित होता चला जाता है | इसी विषय को स्पष्ट करते हुए कहा गया है : -

योगो योगेन ज्ञातव्यो, योगो योगात्प्रवर्त्तते |
योSप्रमतस्तु योगेन, स योगेरमतेचिरम् ||

योग के आगे के भाग का ज्ञान योग से ही हो जाता है, और इतना ही नहीं इस वेदमन्त्र में तो और भी आगे बढ़कर कहा गया है 'तदिन्द्रो अर्थ चेतति' उस विषय का ऐश्वर्यशाली भगवान बोध कराता है | एक बार आगे बढ़ने के विचार को मन में स्थिर कर लो और और शास्त्र के उपदेश के अनुसार आगे बढ़ने का प्रयत्न आरम्भ कर दो, तो जहां मार्ग न मिलेगा अवश्य ही भगवान उसका बोध करयेंगे |हमारे अपने ही अन्तःस्थल में विराजमान भगवान का संदेश हमें अवश्य ही मिलता रहेगा और हम कर्म के विशाल पर्वत को अवश्य पार कर जावेंगे और हमारे इस कर्म श्रंखला के फल की इच्छा न करने पर भी 'यूथेन वृष्णि रेजति' सुख की वर्षा करने वाला भगवान् हमारा सम्बन्ध उस् अदभुत गुण समुदाय से करा देगा, जहां पहुंचने पर परान्त काल तक हमारे ऊपर आनन्द की वर्षा होती रहेगी | परन्तु यह निश्चित रहे कि यदि प्रभु को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हमारे अन्दर आकर्षण और बल न हुआ तो हमारे ऊपर के मनोरथ सफल न हो सकेंगे | इसी विषय को स्पष्ट करने के लिए इस सूक्त का अग्रिम मन्त्र आता है -

युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष्णा कक्ष्यप्राः |
अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ||3|| 1|10|3||

अर्थ - (सोमपा) हे शान्ति और आनन्द आदि उत्तम पदार्थों की रक्षा करने वाले (इन्द्र) ऐश्वर्यवान भगवन ! (नः) हमारी (गिराम्) वाणियों की (उपश्रुतिं) उपयुक्त ध्वनि को (चर) प्राप्त हों अर्थात स्वीकार करें ! (कक्ष्य प्राः) मन बुद्धि आदि सारे विभागों को पूर्ण करने वाले (वृषणा) आनन्द की वृष्टि के निमित्त (हरी) आप की प्राप्ति में समर्थ (केशिना) प्रकाश और आकर्षण बल से सम्पन्न दोनों प्रकार की शक्तियों से (युच्च) योग कराइए |

हमारी अध्यात्म शक्तियों के अनेक विभाग हैं उन सब में प्रधान अंग हैं मन और बुद्धि | इन अंगों के इन दोनों विभागों की न्यूनताओं को दूर कर इन में श्रेष्ठ गुणों का संचार करते हुए इन्हें पूर्ण किया जा सकता है | पूर्ण हो जाने पर ही इन में से रजोगुण और तमोगुण का संचार हो कर इन में सत्व गुण का विकास होगा | सत्वगुण का स्वरूप है |
'ज्योतिषां ज्योति' अर्थात् 'प्रकाशों का प्रकाश' | ज्ञानेन्द्रियों के प्रकाश का साधन यह मन और बुद्धि का प्रकाश ही है | इसलिए इसे प्रकाशों का प्रकाश कहा है | मन और बुद्धि सात्विक हो जाने पर ही इन में आकर्षण का बल उत्पन्न होता है | यह आकर्षण का बल जहां विश्व कल्याण भावना से भावित हो कर प्राणीवर्ग के आकर्षण में समर्थ होता है, वहां यह ही भक्ति भावना से भावित हो कर भगवान के आकर्षण का साधन भी बनता है |

भगवान से, इन्हीं दो प्रकार की शक्तियों से अपने आप को युक्त कर देनें की उपासक प्रार्थना करता है | आकर्षण का बल और प्रकाश ये ही दो आत्मा के अमूल्य रत्न है जिन्हें पाकर पाठक चमक उठता है | इस चमक को प्राप्त करने के बाद ही प्रकाश रूप भगवान् की गोद में बैठने और उसके आनन्द की वर्षा में स्नान करने का अवसर मिलता है | इसीलिए इन दो शक्तियों के लिए मन्त्र में कहा है 'वृषणा' आनन्द की वर्षा करने वाले | इन्हीं दो अमूल्य शक्तियों की मांग के लिए इस मन्त्र में भक्त भगवान से प्रार्थना कर रहा है |
'गिरामुप श्रुतिंचर' अपनी इस प्रार्थना रूप वाणी को भक्त यहाँ 'उपयुक्त ध्वनि' कह रहा है | और है भी यह उपयुक्त ध्वनि | यद्यपि भक्त अपने मन और बुद्धि में आकर्षण उत्पन्न करने का प्रयत्न स्वयं कर रहा है, परन्तु अपने भगवान् की सहायता के बिना उसका प्रयत्न भी तो उसका साध्य नहीं है | अपने भगवान् को यहां भक्त ने दो नामों से पुकारा है | वे दो नाम हैं 'सोमपा और इन्द्र' | 'सोम' अमृत का नाम है और 'इन्द्र' ऐश्वर्य के भण्डार का | भगवान अमृत का भण्डार है और सब प्रकार के 'ऐश्वर्यों' का भी | अतः भक्त ने अपने प्रभु को उन यौगिक शब्दों से ही पुकारा है जो इसकी मांगों को पूर्ण करने में उपयोगी हैं |

(क्रमशः)