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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन सूक्त' पर टीका - ‍परिशिष्ट (5)

केन देवां अनुक्षियति केन दैवजनीर्विशः |
केनदमन्यन्नक्षत्रं केन सत् क्षत्रमुच्यते ||22||

अर्थ - (केन देवान् अनुक्षियति) किस (के प्रदत्त ज्ञान) से देवों को अनुकूल बनाकर (अपने मध्य में) बसाता है ? (केन ब्रह्म‌ दैवजनीः विशः) किस (के प्रदत्त ज्ञान ही) से दिव्य जन रूप प्रजा को (बसाया जाता* है), (केन सत् क्षत्रं उच्यते) किससे ही उत्तम बल कहा जाता है | (केन इदं अन्यत् न क्षत्रम्) किससे यह (ज्ञान) बल से भिन्न नहीं है |

ब्रह्म‌ देवां अनु क्षियति ब्रह्म देवजनीर्विशः |
ब्रह्मेदमन्यदयन्नक्षत्रं ब्रह्म सत्क्षत्रमुच्यते ||23||

अर्थः - (ब्रह्म‌ देवान् अनुक्षिय‌ति) ब्रह्म (वेद-ज्ञान) देवों को अनुकूल बनाकर बसाता है, (ब्रह्म देवजनीः विशः) वेद (के ज्ञान) से दिव्य जन रूप प्रजा को (बसाता है) (ब्रह्म सत् क्ष‌त्रं उच्यते) ज्ञान ही को उत्तम बल कहा जाता है (ब्रह्म इदं अन्यत् न क्षत्रम्) ज्ञान बल से भिन्न नहीं है |

केनेयं भूमिर्विहिता केन द्यौरुत्तरा हिता |
केनेदमूर्ध्वं तिर्यक् चान्तरिक्षं व्यचो हितम् ||24||

अर्थः - (केन इयं भूमिः विहिता) किसने इस भूमि को विशेष रीति से रक्खा है ? (केन द्यौः उत्तरा हिता) किसने द्युलोक (समस्त प्रकाशक ग्रह) ऊपर रक्खा है ? (केन इदं अन्तरिक्षं) किसने इस अन्तरिक्ष को (ऊर्ध्व तिर्यक् व्यचः हितम्) ऊपर , तिरच्छा और फैला हुआ रक्खा है ?

ब्रह्मणा भूमिर्विहिता ब्रह्म द्यौरूत्तरा हिता |
ब्रह्मेदमूर्ध्व तिर्यक् चान्तरिक्षं व्यचो हितम् ||25|

अर्थः - पहला (24वां) मन्त्र प्रश्न रूप में था और यह (पच्चीसवां) उत्तर रूप में है | ((ब्रह्मणा भूमिः विहिता) ब्रह्म ने भूमि को विशेष रीति से रक्खा है, (ब्रह्म द्यौ उत्तरा हिता) ब्रह्म ने द्यौ ऊपर रक्खा है, (ब्रह्म इदं अन्तरिक्षं ऊर्ध्व तिर्यक् व्यचः च हितम्) ब्रह्म ने यह अन्तरिक्ष ऊपर, तिरछा और फैला हुआ रक्खा है |

मूर्धानमस्य संसीव्याथर्वा ह्रदयं च यत् |
मस्तिष्कादूर्ध्वः प्रैरय‌त् पवमानोSधि शीर्षतः ||26||

अर्थः - (अर्थवा) निश्चल (एक रस रहने वाला) (पवमानः) शुद्धस्वभाव वाला ईश्वर (अस्य मूर्द्धानं यत च ह्रदयं संसीव्य) इस मनुष्य के मस्तिष्क को और जो ह्रदय है (उससे) सीकर=मिलाकर (भेजे) जिससे (मस्तिष्कात् ऊर्ध्वः) मस्तिष्क से ऊपर और (शीर्षतः अधि) सिर से नीचे अर्थात् ह्रदय में होकर (प्रैरयत्) (जगत् में) आवे |

व्याख्या

मन्त्र में बहुत ऊँची शिक्षा दी गई है | मस्तिष्क और ह्रदय दोनों के सम्बन्ध में, कि इनको किस प्रकार रखना चाहिए, एक अच्छा आदर्श उपस्थित किया गया है | मन्त्र का भाव यह है कि ईश्वर जो एक-रस (अथर्वा) और (पवमानः) शुद्ध पवित्र है वह मस्तिष्क (बुद्धि) को ह्रदय के साथ मिलता है | तात्पर्य इसका यह है कि मनुष्य को, बुद्धि जिसका काम तर्क है और ह्रदय जिसका काम प्रेम और विश्वास है, दोनों को मिलाकर रखना चाहिए अर्थात् तर्क से सत्यासत्य का विवेक करे | जो सत्य हो उसे ह्रदय से श्रद्धा द्वारा ग्रहण कर लेना चाहिए | इस काम के लिए मस्तिष्क को (अर्थवा) निश्चल और ह्रदय को (पवमानः) पवित्र होना चाहिए | ईश्वर के दो विशेषणों में जो मन्त्र में दिए गए हैं, यही भाव निहित हैं | मन्त्र में यह भी कहा गया है कि ईश्वर मस्तिष्क (तर्क की पहुँच) से ऊपर ह्रदय में है और उत्कृष्ट प्रेम से प्राप्त होता है |

तद्वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुब्जितः |
तत्प्राणो अभि रक्षति शिरो अन्नमथा मनः ||27||

अर्थः - (तद् वै शिरः अथर्वणः देवकोशः समुब्जितः) निश्चय वह शिर निश्चल प्रभु का सुरक्षित दिव्य कोष है अर्थात् उसके दिव्य गुणों के प्रकट करने का, अपनी बनावट और कार्य प्रणाली की दृष्टि से, यह सिर अपूर्व खजाना है, (तत् शिरः प्राणः अन्नं अथो मनः अभिरक्षति) उस सिर की रक्षा प्राण, अन्न और मन करते हैं |

व्याख्या

स्पष्ट है कि प्राण अपने कार्यों, अन्न अपने रस और मन अपने प्रेम से सिर की रक्षा किया करते हैं | प्राणायाम द्वारा शिर की रक्षा होना योग की प्रारम्भिक शिक्षा है | मन को मस्तिष्क का रक्षक बतलाकर इस मन्त्र में भी पूर्व वर्णित (देखो मन्त्र 26) सिद्धांत की, मस्तिष्क और ह्रदय में मेल रहना चाहिए, पुष्टि की गई है |

(क्रमशः)

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* Knowledge is power.