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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

NA DARO MRITYU SE ; AATMA AMAR HAI

न डरो मृत्यु से : आत्मा अमर है
सुधा सावंत, एम ए, बी एड

विद्यालय में पढ़ते समय एक कविता पढ़ी थी, उसकी कुछ पंक्तियां थीं :
निर्भय स्वागत करो मृत्यु का, मृत्यु एक है विश्राम स्थल।
जीव जहां से फिर चलता है, धारण कर नव-जीवन संबल।।
आगे चल कर श्रीमदभगवद् गीता का अध्ययन आरंभ किया तो पढ़ा :
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।
नवानि गृह्णाति नरोsपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि।
अन्यानि संयाति नवानि देही।।
जैसे मनुष्य फटे पुराने कपड़ो को त्याग कर दूसरे नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर को धारण करता है ।
जीवन और मरण के प्रति अब धारणा कुछ स्पष्ट होने लगी थी। यह समझ आने लगा था कि आत्मा अमर है कितुं शरीर का नाश भी एक सत्य है। इससे डरना नही चाहिए। हमें शरीर एक साधन के रूप में मिला है, इसे स्वस्थ रखते हुए हमें आत्म ज्ञान प्राप्त करना है और सच्चिदानंद ईश्वर को समझने और जानने का प्रयत्न करना है।
फिर अवसर मिला वेद मंत्रों को पढ़ने, समझने और मनन करने का। मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र पढ़ा :
ओ3म् त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्।
ऊर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माSमृतात्।।
शुद्ध, सुगंध युक्त शरीर, आत्मा व समाज के बल को बढ़ाने वाला जो रुद्र रुप ईश्वर है उसकी हम निरंतर स्तुति करें। ईश्वर की कृपा से जैसे खरबूज़ा पक कर लता के बंधन से छूट कर अमृत के समान हो जाता है वैसे ही हम लोग भी प्राण व शरीर के वियोग से छूट जाएं और मोक्ष रूप सुख से श्रद्धा रहित कभी न हों।
महा मृत्युंजय मंत्र में शुद्ध सुगंध युक्त और पुष्टिकारक रुद्र की उपासना करने की बात की गई है। यह मंत्र यजुर्वेद के तीसरे अध्याय का 60वां मंत्र है। उपमा अलंकार के द्वारा ईश्वर की ही स्तुति करने के लिए कहा गया है। परमात्मा से अलग किसी अन्य की प्रार्थना न करें, इस बात पर बल दिया गया है। जैसे खरबूज़ा पक कर, अमृत के समान हो कर दूसरों के खाने के लिए तैयार हो जाता है वैसे ही मनुष्य भी अपनी पूर्ण आयु को भोग कर ही शरीर का त्याग करें। मोक्ष प्राप्ति के लिए अनुष्ठान से, इच्छा से कभी अलग न हों।
आज कल शिव जी के भक्त त्र्यंबक का अर्थ शिव के साकार रुप से करते हैं और दावा करते हैं कि इस मंत्र के पाठ से मृत व्यक्ति में भी जीवन का संचार हो सकता है। उनका मानना है कि इसका जाप करने से हम भयानक से भयानक रोग से भी मुक्त हो सकते हैं। मृत्यु के बंधन से मुक्त हो सकते हैं। कभी कभी तो कुछ पौराणिक लोग पंडितों से मंत्र का पाठ करवाते हैं और सोचते हैं कि इसका फल उन्हें मिल जाएगा।
मैं आपको महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के मंतव्य के अनुसार बताना चाहती हूं कि सत्यार्थ प्रकाश के सातवें समुल्लास में उन्होनें ग्यारह रुद्रों की बात कही है। वे रूद्र हैं – प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और जीवात्मा। ये ग्यारह रुद्र इसलिए कहलाते हैं क्योंकि जब शरीर को छोड़ते हैं तब सगे संबंधियों को रुलाने वाले होते हैं। इस तरह यह श्वास ही हमारा त्र्यंबक है। यही हमें सुगंधि भी देता है और पुष्टिकर भी है।
वास्तव में यह श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करने, प्राणायाम पर बल देने के लिए कहा गया है। हम बीमार हो जाते हैं तो डॉक्टर भी यही कहते हैं कि साफ हवा में रहिए, गहरी सांस लीजिए, अधिक से अधिक ऑक्सीजन आपके शरीर में जाएगी तो खून साफ रहेगा और आप रोग रहित हो जाएंगे। जब शरीर स्वस्थ है तो हम एक तरह से मृत्यु के भय से मुक्त हैं। महामृत्युंजय मंत्र का यह प्रथम भाग है। मृत्यु के भय से मुक्त होने के लिए प्राणायाम करें, शरीर को स्वस्थ रखें। स्वस्थ व्यक्ति न मृत्यु के बारे में सोचता है और न ही चिंता करता है।
मंत्र का दूसरा भाग है -
ऊर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माSमृतात्।।
सामान्य अर्थ है खरबूज़े के समान जब हम पूर्ण रूप से पक जाएं, पूरी आयु प्राप्त कर लें, ज़िम्मेदारियां पूरी कर लें तो हम भी अपने को मोह माया के बंधन से अलग कर लें। संभवत: यही कारण है कि ऋषि मुनियों नें जो आश्रम-व्यवस्था आरंभ की होगी उसके पीछे यही विचार होगा कि जीवन के पहले 25 वर्ष हम विद्या-अध्ययन करें, अपने आप को जीवन के लिए तैयार करें। फिर अगले 25 वर्षों तक विवाह करके गृहस्थ आश्रम में रह कर परिवार की और समाज की सेवा करें। फिर अगले 25 वर्ष तक अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करें कि यह घरबार, गृहस्थी, वस्तुएं सब अब हमारी नहीं हैं – परिवार वालों की हैं। यह अवस्था वानप्रस्थ आश्रम की है। हम अपने को गृहस्थ आश्रम के बंधनों से मुक्त करें। धन-दौलत का मोह त्यागें। इस तरह त्याग भावना के साथ रहने पर मृत्यु के प्रति भय भी कम हो जाएगा।
बुढ़ापे में हमारी संपत्ति, हमारे बाल बच्चों का क्या होगा – इससे हम चिंतित रहते हैं और मृत्यु से डरते रहते हैं। लेकिन जब हम स्वयं पारिवारिक बंधनो से मुक्त होकर वानप्रस्थ आश्रम की राह पर निकल जाएंगे तो मन से मृत्यु का भय भी निकल जाएगा।
मंत्र में अंतिम प्रार्थना है - माSमृतात्। अर्थात आत्मा जो अमर है, जिस आत्मा के लिए कहा गया है कि न यह जन्म लेता है और न ही मरता है। शरीर के नष्ट हो जाने पर भी इसका नाश नही होता – तो इस अमृत या आत्मा के अमरत्व को जानने की इच्छा से हमें दूर मत कीजिए।
हे ईश्वर हमें शक्ति दीजिए, ज्ञान दीजिए कि हम अपनी आत्मा को जानने के लिए हर जन्म में प्रयत्नशील रहें। योगेश्वर श्री कृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद् गीता में अर्जुन से यही कहा था कि तुम अपनी आत्मा को पहचानने का प्रयत्न करो। श्री कृष्ण ने कहा:
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूय:
अजो नित्य: शाश्वतोSयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।
यह आत्मा न जन्म लेता है, न मरता है। न यही कि अब आगे कभी नही होगा। यह आत्मा तो अजन्मा है, नित्य है – हमेशा रहने वाला है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नही मरता। आत्मा के इस नित्य स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर हमें मृत्यु का भय नही रहता। हम समझ जाते हैं कि जन्म तो केवल शरीर का हुआ है और जिसने जन्म लिया है उसका अंत भी होगा। लेकिन इस शरीर में रहने वाला आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध है। जैसे सागर में लहरें उठती हैं, गिरती हैं और फिर नई लहरें बनती हैं परंतु सागर का जल वही का वही रहता है।
इस प्रकार इस मंत्र पर मनन करते समय ये तीन बातें मुख्य रूप से स्पष्ट होती हैं। पहला प्राणायाम करते हुए अपने शरीर को स्वस्थ रखें। दूसरा जैसे फल पक कर स्वयं अपने को डाली के बंधन से मुक्त कर लेता है, ऐसे ही हम भी धन-दौलत परिवार के मोह से धीरे-धीरे अपने को मुक्त करें और जीवन को समाज की भलाई के लिए लगाएं। और तीसरे अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध आत्मा को जानने के लिए हर जन्म में कोशिश करते रहें। इसी प्रकार जन्म जन्मातंर में परमपिता परमात्मा के निकट आने का प्रयास करें। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करते रहें और ईश्वर की आज्ञा के अनुसार अपने जीवन को चलाते हुए मोक्ष प्राप्त करें।
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सुधा सावंत, एम ए, बी एड
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