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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (15)

इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः | इन्द्रं वाणीरनूषत ||1||
ऋग्वेद 1|7|1||

पदार्थ - जो (गाथिनः) गान करनेवाले और (अर्किणः) विचारशील विद्वान् हैं, वे (अर्केभिः) सत्कार करने के पदार्थ सत्य भाषण शिल्पविद्या से सिद्ध किए हुए कर्म मन्त्र और विचार से (वाणीः)चारों वेद की वाणियों को प्राप्त होने के लिए (बृहत्) सबसे बड़े (इन्द्रम्) परमेश्वर (इन्द्रम्) सूर्य्य और (इन्द्रम्) वायु के गुणों के ज्ञान से (अनूषत) यथावत् स्तुति करें ||1||

भावर्थ - ईश्वर उपदेश करता है कि मनुष्यों को वेदमन्त्रों के विचार से परमेश्वर सूर्य्य और वायु आदि पदार्थों के गुणों को अच्छी प्रकार जानकर सब के सुख के लिए उनसे, प्रयत्न के साथ उपकार लेना चाहिए | ||1||

इन्द्र इद्धर्य्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा | इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ||2||
ऋग्वेद 1|7|2||

पदार्थ - जिस प्रकार यह (संमिश्लः) पदार्थों में मिलने तथा (इन्द्रः) ऐश्वर्य का हेतु स्पर्शगुणवाला वायु, अपने (सचा) सब में मिलनेवाले और (वचोयुजा) वाणी के व्यवहार को वर्त्तानेवाले (हर्य्योः) हरने और प्राप्त करनेवाले गुणों को (आ) सब पदार्थों से युक्त करता है, वैसे ही (वज्री) संवत्सर वा तापवाला (हिरण्ययः) प्रकाशस्वरूप (इन्द्रः) सूर्य्य भी अपने हरण और आहरण गुणों को सब पदार्थों में युक्त करता है ||2|

भावार्थः - इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है | जैसे वायु के संयोग से वचन श्रवण आदि व्यवहार तथा सब पदार्थों के गमन-आगमन धारण और स्पर्श होते हैं, वैसे ही सूर्य्य के योग से पदार्थों के प्रकाश और छेदन भी होते हैं ||2||

इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्य्य रोहयद्दिवि | वि गोभिरद्रिमरैयत् ||3||
ऋग्वेद 1|7|3||

पदार्थ - (इन्द्रः) जो सब संसार का बनानेवाला परमेश्वर है, उसने (दीर्घाय) निरन्तर अच्छी प्रकार (चक्षसे) दर्शन के लिये (दिवि) सब पदार्थों के प्रकाश होने के निमित्त जिस (सूर्य्यम्) प्रसिद्ध सूर्य्यलोक को (आरोहयत्) लोकों के बीच में स्थापित किया है, वह (गोभिः) जो अपनी किरणों के द्वारा (अद्रिम्) मेघ को (व्यैरयत्) अनेक प्रकार से वर्षा होने के लिये ऊपर चढ़ाकर बारंबार वर्षाता है ||3||)

भावार्थ - रचने की इच्छा करनेवाले ईश्वर ने सब लोकों में दर्शन धारण और आकर्षण आदि प्रयोजनों के लिये प्रकाशरूप सूर्य्यलोक को सब लोकों के बीच में स्थापित किया है, इसी प्रकार यह हरेक ब्रह्माण्ड का नियम है कि वह क्षण क्षण में जल को ऊपर खींच करके पवन के द्वारा ऊपर स्थापन करके बार बार् संसार में वर्षाता है, इसी से वह वर्षा का कारण है ||3||

इन्द्र वाजेषु नो Sव सहस्त्रप्रधनेषु च | उग्र उग्राभिरूतिभिः||4||
ऋग्वेद 1|7|4||

पदार्थ - हे जगदीश्वर ! (इन्द्रः) परमैश्वर्य्य देने तथा (उग्रः) सब प्रकार से अनन्त पराक्रमवान् आप(सहस्त्रप्रधनेषु) असंख्यात धन को देनेवाले चक्रवर्त्ति राज्य को सिद्ध करानेवाले (वाजेषु) महायुद्धों में (उग्राभिः) अत्यन्त सुख देनेवाली (ऊतिभिः) उत्तम उत्तम पदार्थों की प्राप्ति तथा पदार्थों के विज्ञान और आनन्द में प्रवेश कराने से हम लोगों की (अव) रक्षा कीजिए |

भावार्थ - परमेश्वर का यह स्वभाव है कि युद्ध करनेवाले धर्मात्मा पुरुषों पर अपनी कृपा करता है और आलसियों पर नहीं | इसीसे जो मनुष्य जितेन्द्रिय विद्वान पक्षपात को छोड़नेवाले शरीर और आत्मा के बल से अत्यन्त पुरुषार्थी तथा आलस्य को छोड़े हुए धर्म से बड़े बड़े युद्धों को जीत के प्रजा को निरन्तर पालन करते हैं, वे ही महाभाग्य को पाके सुखी रहते हैं ||4||

इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे | युंज वृत्रेषु वज्रिणम् ||5||
ऋग्वेद 1|7|5||

पदार्थ - हम लोग (महाधने) बड़े बड़े भारी संग्रामों में (इन्द्रम्) परमेश्वर का (हवामहे) अधिक स्मरण करते रहते हैं, और (अर्भे) छोटे छोटे संग्रामों में भी इसी प्रकार (वज्रिणम्) किरणवाले (इन्द्रम्) सूर्य्य वा जलवाले वायु का जो कि (वृत्रेषु) मेघ के अंङ्गों में (युजम्) युक्त होने वाले इनके प्रकाश और सब में गमनागमनादि गुणों के समान विद्या न्याय प्रकाश और दूतों के द्वारा सब राज्य का वर्त्तमान विदित करना आदि गुणों का धारण सब दिन करते रहें ||5||

भावार्थ - इस मन्त्र में श्लेषालंकार है | जो बड़े-बड़े भारी और छोटे-छोटे संग्रामों में ईश्वर को सर्वव्यापक और रक्षा करने वाला मान के धर्म और उत्साह के साथ दुष्टों से युद्ध करें तो मनुष्यों का अचल विजय होता है | तथा जैसे ईश्वर भी सूर्य्य और पवन के निमित्त से वर्षा आदि के द्वारा संसार का अत्यंत सुख सिद्ध किया करता है, वैसे मनुष्य लोगों को भी पदार्थों को निमित्त करके कार्य्यसिद्धि करनी चाहिये ||5||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (15)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)