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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'आर्य समाज '‍ - इतना तो हर कोई जाने

**ओउम्**

धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले 19वीं शताब्दी के भारतियों में महर्षि दयानन्द सबसे अग्रणी थे | उनका जन्म भारत के सौराष्‍ट्र प्रान्त के टंकारा नामक ग्राम में 1824 ई. में हुआ था | सन् 1860 से 1863 तक तीन वर्ष स्वामी दयानन्द जी ने मथुरा में गुरु विरजानन्द जी की पाठशाला में विद्याध्ययन किया |

अगर वेदों को किसी ने समझा तो ऋषि दयानन्द ने | योगीराज श्री अरविद का कहना है कि "जहाँ तक वेदों का प्रश्न है दयानन्द सबसे पहला व्यक्ति था जिसने वेदों के अर्थों को समझने की असली कुञ्जी को खोज निकाला | वेदों का अर्थ समझने के लिए सदियों से जिस अन्धकार में हम रास्ता टटोल रहे थे उसमें दयानन्द की दृष्टि ही इस अन्धकार को भेद कर यथार्थ सत्य पर जा पहुँची थी |"

ग्रन्थ रचना :
महर्षि दयानन्द ने लगभग चालीस लघु और बृहद् ग्रन्थों की रचना की इनमें सबसे प्रसिद्ध 'सत्यार्थ प्रकाश' है | यह ग्रन्थ वैदिक सिद्धान्तों को समझने की कुञ्जी है |

शास्त्रार्थ :
महर्षि ने अन्य मतावलम्बियों से अनेक विष्यों पर शास्त्रार्थ किये और उन्हें वेद विज्ञान का महत्व समझाया |

स्वामी दयानन्द ने देश के अनेक भागों में भ्रमण करके पाखण्ड और अन्धविश्वास को मिटाने तथा समाज को जगाने का आन्दोलन किया |

स्वदेश-प्रेम :
महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश में जोरदार शब्दों में लिखा - "कोई कितना ही कहे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है | अथवा मतमतान्तर के आग्रह रहित अपने और पराये का पक्षपात शून्य,प्रजा पर माता..पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ भी विदेशी राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं हो सकता |"

वेद विचार‌
वेद में किसी व्यक्ति, स्थान या काल का वर्णन नहीं है | वेद चार हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद | सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन चार ऋषियों को देववाणी के रूप में एक-एक वेद का प्रकाश किया | वेद ईश्वर की नित्य विद्या है | ईश्वरीय ज्ञान होने के कारण वेद ज्ञान-पूर्ण है, सर्वथा त्रिटि रहित और निर्दोष है | वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है वेद का पढ़ना, पढ़ाना और सुनना, सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है |वेद स्वतः प्रमाण है | इसका अर्थ यह है कि वेदों की बातों को सिद्ध करने के लिए किसी अन्य किसी अन्य ग्रन्थ के प्रमाण की आवश्यक्ता नहीं है | वेद मनुष्य कृत नहीं है | इसलिए वेदों में इतिहास नहीं है | स्त्री और पुरुष समान रूप से वेद पढ़ने का अधिकार रखते हैं | वेद शूद्र के लिए भी है | वैर-भाव, विरोध और भेदभाव जिन बातों से बढ़ता हो वे वेद के अनुकूल नहीं हैं |

आर्य समाज की स्थापना :
भारत देश में प्रथम आर्य समाज की स्थापना मुम्बई में चैत्र सुदी 5 सम्वत् 1932 तदनुसार 10 अप्रैल 1875 में की गई | द्वितीय आर्य समाज की स्थापना लाहोर में 1877 में खान बहादुर डाक्टर रहीम खाँ की कोठी पर की ग‍ई |

आर्य समाज की मान्यतायें
1. आर्य समाज का आधार वेद है | आर्य समाज, श्रेष्ठ व्यक्तियों का संगठन है |, जो मानव-मात्र का कल्याण करे |मनुष्य समाज से अविद्या, अन्ध विश्वास और पाखण्ड को मिटाया जाये, इससे हमारे विकास में रुकावट आती है | आर्य समाज वैचारिक क्रान्ति तथा परोपकारी संस्था है | आर्य समाज का उद्देष्य संसार का उपकार करना है, सबकी उन्नति के लिये प्रयत्न करना है | उसके लिये "अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि" करनी चाहिये |

विधान में पारित नियम :
आर्य विवाह वैधता अधिनियम, 1937 की धारा 2 के अनुसार विभिन्न जाति या धर्मों के परिवार के बच्चे यदि दोनों आर्य समाजी हैं तो उनका विवाह वैध होगा |

2. ईश्‍वर :
ईश्‍वर एक है, अनेक नहीं | वह चेतन स्वरूप है | वह सर्वव्यापक है , दयालु और न्यायकारी है, उसकी ही उपासना करनी चाहिए | ईश्‍वर का निज नाम ओउम है |

3. जीवात्मा का स्वरूप :
जीवात्मा चेतन तत्व है | इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुख, ज्ञान इसके चिन्ह हैं | जगत् में ईश्‍वर एक है ओर जीवात्मा अनेक हैं |

4. पुनर्जन्म :
कुछ मतों के अनुसार मरने के बाद जीवात्मा अपने कर्मानुसार सदैव के लिए स्वर्ग या नरक में चला जाता है, वहाँ से लौटकर नहीं आता, आर्य समाज ऐसा नहीं मानता | आर्य समाज की वेद के आधार पर यह मान्यता है कि कर्मानुसार न्यायकारी परमेश्‍वर जीवात्मा का फल भोगने के लिये पुनर्जन्म देता है |

5. त्रैतवाद :
जगत् में तीन नित सत्ताएं हैं, ईश्‍वर, जीव और प्रकृति | ईश्‍वर जगत् का निमित्त कारण है और प्रकृति उपादान कारण |

6. मुक्ति का स्वरूप :
दुःखों से छूटने को मुक्ति कहते हैं | मुक्ति में जीव का लय नहीं होता | वहाव्याहतगति से आनन्दपूर्वक सर्वत्र विचरण करता है | मुक्ति में जीव का स्थूल शरीर नहीं रहता | मुक्ति का आनन्द भोगकर मुक्ति के समय की सीमा पूरी होने पर जीव पुनः इस लोक में जन्म धारण करता है, इसी को मुक्ति से पुनरावृत्ति कहते हैं |

7. ब्रह्मचर्य :
शिक्षा प्राप्तिकाल में विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर पूर्णता से पालन करना चाहिए |

8. मूर्ति पूजा :
आर्य समाज मूर्ति कला का विरोधी नहीं है | भगवान्, चूंकि निराकार है इसलिए उसकी मूर्ति बन ही नहीं सकती, यह उसकी मान्यता है |

9.
जात-पात,दहेज-प्रथा, भ्रष्टाचार, नारी-उत्पीड़न आदि कुरीतियों को समाज से समाप्त करने से प्रेम की भावना जागृत होगी और समाज का विकास होगा |

10. पुराण :
जो ब्रह्मादि के बनाये ऐतरेय शतपथ आदि पुस्तके हैं उन्हीं को पुराण कहते हैं |

11. राक्षस :
पापी व्यक्ति जो अपने हित के लिए दूसरों को हानि पहुँचाता है, वह राक्षस है | विशेष आकृति वाले प्राणी को यथा सींग, पूँछ और लम्बे दांत ओर बाल वाले प्राणी को राक्षस नहीं कहते हैं |

12. स्वर्ग :
स्वर्ग कहीं आकाश व पाताल में बना हुआ स्थान विशेष नहीं है | स्वर्ग का अर्थ है विशेष सुख और शान्ति जो कि इसी संसार में शुभ कर्मों से मिलते हैं |

13. नरक :
अशुभ कर्मों का फल‌ दुख है कोई स्थान विशेष नरक नहीं कहलाता |

14. भूत :
किसी अदृष्य शक्ति को जो मनुष्य से चिपट कर उसे हानि पहुँचाती है भूत नहीं कहते | गुजरे हुए समय को भूतकाल कहते हैं |

15. प्रेत :
म्रतक शरीर को प्रेत कहते हैं, और उस मृतक शरीर को उठाने वालों को प्रेतहार कहते हैं |

16.
ज्ञान को धर्म के लिये प्रयोग में लाना चाहिये | मंत्रोचारण के साथ-साथ सत्य और असत्य की समझ बच्चों में छोटी उम्र में होना आवष्यक है |

17.
मानव-समाज के निर्माण‌, उत्थान तथा कल्याण के लिये नारी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है |

आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा
मन्दिर मार्ग, नई दिल्ली
के सौजन्य से "