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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय (6/6)

Mahatma Narayan Swami ji's Brief life Sketch

सिन्ध सत्याग्रह :-

सन् 1944 ई. में सिन्ध प्रान्त की मुसलिम सरकार ने "सत्यार्थ प्रकाश" के 14 वें सम्मुलास को प्रतिबन्धित करने के नाम से पूरे सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबन्ध लगा दिया | उसका छापना और रखना भी प्रतिबन्धित हो गया | उनकी दृष्टि में 11 से 14वें सम्मुलासों में विभिन्न धर्मों की अनर्गल झूठी बातों को दिखाया गया है अर्थात् आलोचनात्मक समीक्षा है |

इस अन्याय का विरोध केवल आर्यों ने ही नहीं, अन्य धर्मावलम्बियों ने भी किया | सार्वदेशिक सभा की अन्तरंग सभा बुलाई गैइ और शान्ति पूर्वक सत्याग्रह द्वारा अपना अधिकार प्राप्त करने का निश्चय किया गया | परन्तु निषेध आज्ञा केवल दो वर्ष के लिए थी और कुछ समय बीत भी चुका था | सो प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया गया | दो वर्ष बाद जब फिर से इस पैक्ट की अवधि बढ़ा दी गई तो आर्यों का रोष और क्षोभ बढ़ना स्वभाविक था |

सार्वदेशिक सभा की अंतरंग सभा ने सत्याग्रह करने का निश्चय किया | आर्यजनों में भी अब आत्मविश्वास जाग चुका था | हैदराबाद सत्याग्रह का सफलतापूर्वक नेतृत्व करने वाले महात्मा नारायण स्वामी जी से इस सत्याग्रह का नेतृत्व सम्हालने की प्रार्थना की गैइ | महात्मा जी ने स्वीकार कर लिया | उस समय म. नारायण स्वामी जी की आयु 83 वर्ष की थी और अनेकों बिमारियों ने उन्हें घेरे रक्खा था | किन्तु यह गुरुभार आपने सहर्ष स्वीकार कर लिया |

3 नवम्बर 1946 की हैदराबाद सत्याग्रह के कुछ महारथियों को लेकर आपने कराची के लिए प्रस्थान किया | राजगुरु धुरेद्र् शास्त्री, महात्मा आनन्द स्वामी,कुंवर चांदकरण शारदा, वेदव्रत जी शास्त्री, लक्ष्मीदत्त जी दीक्षित आदि आर्य विद्वान उनके साथ थे |

सत्याग्रह का बिगुल बजते ही आर्यों में उत्साह और चेतना की लहर दौड़ गई | सत्याग्रहियों की लिस्ट बनने लगी |

सर्व प्रथम तो आपने सिध के मुख्यमंत्री को इस विषय में पत्र लिखा | यह भी लिखा कि अगर सात दिन के अन्दर हमारी शर्तें नहीं मानी गईं तो सत्याग्रह का रास्ता पकड़ा जायगा |

सत्याग्रह की आवश्यक्ता नहीं पड़ी और सत्यार्थ प्रकाश पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया | कथा प्रवचन की छूट मिल गई |

20 जनवरी 1947 को महात्मा जी वहां से वापस आ गए | उस समय शारीरिक व मानसिक परिश्रम से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो चुका था | उन्होंने आर्य समाज के अधिकारों के युद्ध में नेतृत्व सम्हाला और असह्य कष्टों को सहन किया | आयु भी निरन्तर बढ़ ही रही थी | शरीर भी शिथिल हो रहा था | हैदराबाद सत्याग्रह के बाद ही डाक्टरों ने आपको पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी थी | पर वह महारथी भीष्म की तरह, कर्त्तव्य पालन में जीवन के अन्त तक संघर्ष करने में विश्वास रखते थे |

सिन्ध सत्याग्रह उनके जीवन रूपी यज्ञ की अन्तिम आहुति सिद्ध हुई | डाक्टरों ने पेट का आपरेशन कराने का परामर्श दिया | महात्मा कृष्ण जी वान्य प्रियजन उन्हें लाहोर ले गए और कुशल डाक्टर से आप्रेशन कराया | पेट खोलने पर पता चला कि पेट का कैंसर फैल चुका है | उन्होंने उसी तरह पेट को सिल दिया |

अपने शरीर की जर्जरता को अनुभव कर महात्मा जी ने जीने की इच्छा ही त्याग दी "अब इस निकम्मे शरीर को लेकर रहने से क्या लाभ ? "

15 अक्टूबर 1947 में उनका देहान्त हो गया | आर्य समाज का एक देदीप्यमान नक्षत्र अस्त हो गया | आर्यजनों को पथ प्रदर्शन करने वाली ज्योति, उस परम ज्योति में समाहित हो गई |

उपसंहार - महात्मा नारायण स्वामी ने एक अत्यन्त साधारण परिवार में जन्म लिया था | शिक्षा भी साधारन हुई | पारिवारिअक जीवन भी आधा अधूरा रहा पर वे आसाधारण थे | उन्होंने अपनी लगन, आत्मविश्वास, चरित्र बल द्वारा सब बाधाएं लांघ लीं और और आर्य जगत् में ही नहीं, देश भर में अपने लिए एक गौरवपूर्ण, सम्माननीय स्थान बनाया | उनके विचार उच्च और पवित्र थे |

सदा सत्य पर दृड़ रहना, उनका स्वभाव था | सत्य से उत्पन्न होने वाला तेज उन्हें सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहा | उनकीत्याग, सादगी और कर्त्तव्यनिष्ठा, ने उनको सफलता के ऊंचे शिखर पर पहुंचने में सहायता दी |

सामने बाधा आने पर वे चट्टान की भांति दृढ़ता से उसका सामना करते | असत्य के लिए कठोर और दीन दुखियों के दुख से द्रवित हो जाते | उनका जीवन त्याग तपस्या का उद्धाहरण था |

वे प्रबन्धन में प्रवीण थे | मथुरा व अजमेर शताब्दियों व हैदराबाद व सिन्ध के सत्याग्रह के सुप्रबन्धन, आपकी प्रबन्ध क्षमता के जीवन्त उद्धाहरण थे, कारण यह था कि वे स्वयं भी उन नियमों का पालन करते थे, जिनकी व्याख्या करते थे |

वे एक सिद्धहस्त लेखक थे | जीवन के यौवनकाल में उन्होंने संस्काृत पढ़नी आरम्भ की और उसमें प्रवीणता प्राप्त की | वेद और उपनिषदों का अध्ययन किया | रामगढ़ तल्ला में वर्ष में तीन चार महीने वे स्वाध्याय व योगाभ्यास में बिताते थे | अनेक वैदिक ग्रन्थों का मनन करने के न्बाद आपने निम्नलिखित ग्रन्थों का लेखन किया |

1. कर्त्तव्य दर्पण |
2. विद्यार्थी जीवन रहस्य |
3. मृत्यु और परलोक |
4. प्राणायाम विधि |
5. वैदिक संध्या रहस्य |
6. योग दर्पण की टीका (योगिक क्रियाओं का पहले स्वयं अनुष्ठान किया) |
7. आत्म दर्श्स्न |
8. वेद व प्रजातन्त्रीय राज्य व्यवस्था |
9. ऋषि दयानन्द और आर्य समाज |
10. वैदिक साम्यवाद |
11. वैदिक धर्म को क्यों ग्रहण करें ?
12. ईसा का जीवन चरित्र |
13. शूद्रवर्ण के कर्त्तव्य और अधिकार |
14. संन्यासी कर्त्तव्य दर्पण |

निम्नलिखित उपनिषदों के भाष्य लिखे : -

1. ईशोपनिषद् 2. केनोपनिषद् 3. कठोपनिषद् 4. प्रश्नोपनिषद् 5. मुण्डकोपनिषद् 6. मांडूक्योपनिषद् 7. तैतरीय उपनिषद् 8. एतरेय उपनिषद् 9. छान्दोग्योपनिषद्

निम्न पैम्फ्लेट भी प्रकाशित किए : -
1. वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी आक्षेपों का उत्तर |
2. महात्मा जग्दम्बा प्रसाद का ट्रैक्ट "मैंने इसलाम क्यों क्यों ग्रहण किया" का उत्तर |
3. ला. जगन्नाथ द्वारा वेदभाष्य पर लगाए गए आक्षेपों का उत्तर |

निम्न पुस्तकों की भूमिका लिखी : -
1. निबन्ध संग्रह (सार्वदेशिक सभा द्वारा प्रकाशित) |
2. दयानन्द सिद्धान्त भाष्य |
3. यम पितृ परिचय |
4. प. प्रियरत्न जी के दो ग्रन्थ |
5. प्रिंसिपल राजेन्द्र कृष्ण कुमार मोगा के ग्रन्थ की अंग्रेजी में भूमिका |

आज हम उनके द्वारा संस्थापित हुए "आर्य वानप्रस्थ आश्रम" की हीरक जयन्ती मना रहे हैं | अर्थात् सन् 1928 में आश्रम की नींव पड़ी थी | 75 वर्षों में यह अब पूर्ण वटवृक्ष की भांति पल्लवित, पुष्पित हो रहा है | वानप्रस्थियों को अनेकों सुविधाएं उपलब्ध हैं | नियम से यज्ञ-प्रवचन योगाभयास भी हो रहे हैं | जैसा कि सदा होता है कि महान आत्मा के त्याग-तपस्या के उद्धाहरण हमारे लिए शून्य हो जाते हैं | हम महान व्यक्ति को मानते हैं पर उस व्यक्ति के आदर्शों को नहीं मानते | यह संसार का विचित्र नियम है |

उनकी जीवन..गाथा पढ़कर हम उनके पद-चिह्नों पर चलने का प्रयत्न करें | तभी हीरक जयन्ती मनाना सफल होगा | घोर अविद्या अन्धकार में भटकी हुई, दारुण दुःख से कराहती मानवता, उदीयमान सूर्य के उज्जवल प्रकाश में सुपथ पाकर, प्रसन्नता से हर्षित, उत्साही होकर लक्ष्य तक पहुंचने की आशा में फूली नहीं समाती | ज्ञान रूपी सूर्य को घेरे हुए अविद्या रूपी वृत्र (अन्धकार) का नाश करने का नारायण स्वामी का निर्देश, हमें कर्मठ बनाए रखे, यही परमपिता से "नम्र प्रार्थना है" |

आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर की

हीरक जयन्ती

के अवसर पर प्रकाशित |

प्रकाशक : -
श्री आनन्द अभिलाषी

लेखिका : -
पुष्प शोभा विद्यालंकृता

नमस्ते

नमस्ते ,श्री मान जी ,

मैं स्वामी जी की जीवनी को शुरू से ही पढ़ती आई हूँ .
स्वामी जी के परिचय हेतु बहुत -बहुत धन्यवाद .
विभा

नमस्ते

नमस्ते विभा
हमारे अत्यन्त तपस्वी एवं वेदज्ञ संन्यासी वास्तव में हमारी प्रेरणा के स्तोत्र हैं |
आनन्द‌