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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

क्या मिलता है ह‌में आर्य‌समाज में, जो अन्य जगह नहीं मिलता है - तीसरा सत्य‌

क्या मिलता है ह‌में आर्य‌समाज में, जो अन्य जगह नहीं मिलता है
क्या हे जो आपको यहाँ मिलता है , जो अन्य कहीं नहीं मिलता है ?
वह है तीसरा नेत्र , नहीं , नहीं - तीसरा सत्य ! जो आपको अन्य‌ कहीं नहीं मिलता |

धन्यवाद करें ऋषी दयनन्द का , जिन्होंने तीसरे सत्य को जाना , पहचाना और् सबको दे डाला |
वह क्या है ? वह तीसरा सत्य क्या है ? आइये पहले देखें वह् दो सत्य जो सबको उपलब्ध हैं |

वह दो आधारभूत सत्य‌ जो अधिकतर लोगों को उपलब्ध हैं , वे हैं -

(1) मै हूँ ,मैं कुछ हूँ , अर्थात अपनी अनुभूती जिसमे चाहत है , इच्छा है |

(2) दूसरा सत्य है - प्रकृति अथवा ‌दुनिया है जो दिखती है , रूप , रस , रंग , गन्ध व स्पर्ष से जो जानी जाती है

क्या कोई ऐसा सत्य और भी है जिसे आप जानते हैं, और जो उपरोक्त दोनो सत्यों से अलग है
नहीं , नहीं , नहीं ???
कोई भगवान को मानता है तो बाकी सबकी उत्पत्ती उसी से मानता है लेकिन‌ साथ में उत्पन्न हुई वस्तुओं का अपना कोई अस्तित्व नहीं मानता , अर्थात जीव व प्रकृ‌ति का अस्तित्व, भगवान द्वारा सृष्टी की उत्पत्ति से पूर्व नहीं मानता | तो इस प्रकार‌ तो बचा केवल एक ही सत्य और् वह हुआ भगवान |
कुछ् अन्य भगवान के अस्तित्व को बिलकुल स्वीकार नहीं करते हैं , वे केवल उपरोक्त दोनो सत्यों अर्थात जीव व प्रकृति का अस्तित्व‌ ही स्वीकार करते हैं अर्थात वह केवल दो सत्य ही स्वीकार करते हैं
तो फिर आप मान गये होंगे कि अधिक से अधिक‌ केवल दो सत्यों से ही इस संसार का मानव अवगत है | केवल वैदिक धर्म से प्रेरित धर्म ही तीसरे सत्य को जानते हैं |
अत: कह सकते हैं कि एक अधूरे सत्य पर खड़ा है आज का मानव |
क्या यही कारण नहीं है जिसकी वजह से सब चल तो रहा है , पर है सब कुछ उल्टा पुलटा , सब कुछ असन्तुलित | दो पहियों की गाड़ी पर की जाने वाली सवारी की तरहँ | न जाने कब सन्तुलन खो बैठे ??? ज‌ब तक तीसरा सत्य नहीं जानोगे , आप स्थिर नहीं हो पाओगे | तीसरा सत्य वह सत्य है जो जीवन को स्थिरता देता है , आधार देता है , आनन्द देता है |
महर्षि दयानन्द ने संसार का महान उपकार किया तीनो सत्यों को फिर से उजागर कर | वह‌ तीन सत्य हैं
आत्मा ,परमात्मा व प्रकृति |

देखिए ऋषि , कितनी सुन्दरता से उसका चित्रण करते हैं -

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं मन्त्रं परि पस्वजाते
तयोरन्या: पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नयो अभि चाकशीति || ऋ 0 1.164.20

जो ब्रह्म और जीव दोनों चेतनता और पालनादि गुणों में सद्दृश , व्याप्य व्यापक भाव से संयुक्त , परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और वैसा ही अनादि , मूलरूप , कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष , अर्थात जो स्थूल होकर प्रल‌य में छिन्न भिन्न हो जाता है वह तीसरा अनादि पदार्थ है | इन तीनों के गुण कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं | इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस व्रृक्षरूप संसार में पापपुण्यरूप फलों को अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को न भोक्ता हुआ चारों और अर्थात भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाषमान हो रहा है | जीव से ईश्व‌र , ईश्वर से जीव, और दौनो से प्रकृति भिन्न स्वरूप ; तीनो अनादि हैं |

(सत्यार्थ प्रकाश - अष्टमसम्मुलास)
आज संसार के अधिक‌तर गुरु , अच्छी परिभाषाएं बनाने में उद्दत रहते हैं , लेकिन , कहीं न कहीं , तीनो सत्यों का निरादर करने के कारण ,दुविधा में पड़े दीखते हैं, और इसके फलस्वरूप, अपनी सब्दावली का प्रयोग‌ कुछ इस प्रकार से करते हैं कि कहीं उनकी पोल न खुल जाए |

तो आइए ! आर्यसमाज आपको वेदों की सीधी सरल राह पर ले जाने को उद्दत है | अपना भला कर , सारे संसार का भला करें | सत्य को पूर्ण रूप में जाने और मानें | प्रकृति , आत्मा व परमात्मा , तीनों को उचित सन्मान दें |

Moninder Singh Pandher is an

Moninder Singh Pandher is an amrit-dhaari sikh. He is descendent, devotee and disciple of great sikh gurus. All sikh gurus are descendents of Luv & Kush, sons of Lord Shri Rama. So treat Moninder Singh Pandher with compassion. Om tat sat hum.

Dear Arya This is not the

Dear Arya
This is not the proper forum on which i am giving my comments /reply to Shri Durki but as he has mentioned his comments on this forum ,i am forced to reply here.
My Reply-All Khalistani terrorists were also Amritdharis who have killed thousands of innocents Hindus all over india and abroad.They have also raped many innocents.Now do our respected Durki Ji has courage to go to the families of victims of Sardar Pandher's lust and repeat his same words.In last I can say I am shocked to see your comments.
Regards,
Naveen Arora