वह महान प्रेरक ऋषि दयानन्द !
**ओउम्**

आ गया वही निर्वाण दिवस
जगमग जब दीपावली जली
ऋषि छोड़ देह को निकल पड़ा
कर ली थी उसने तैयारी
प्रभु इच्छा को पूरा करने
की मन में थी उसने ठानी
प्रभु तूने की अद्भुत लीला
तेरी इच्छा अब पूर्ण हो
मैं चलता हूँ मेरे पीछे
ऐ आर्यो तुम सब हो जाओ
जो चाहा प्रभु ने वह किया सभी
जो बाकी उसको तुम करना
है वेद दिखाते राह तुम्हें
तुम राह पे सीधी बस चलना
इस देश का तुम उद्धार करो
इस देश को आगे ले चलना |
थी घोर तपस्या की ऋषि ने
तप का ऊँचा सौपान चुना
जब तक न प्रभु से मिल पाया
ब्रह्मचारी वह हर दर भटका
गुरु विरजानन्द दण्डी से
तब मिली अन्त में वह शिक्षा
जब पूर्ण हुई सारी शिक्षा
दक्षिणा-हित गुरु चरणों में
ले लौँग दयानन्द जा पहुँचा
गुरु ने तब अद्भुत् व्रत मांगा
ऐ दयानन्द क्या करना है
इन लौँगों का जो तुम लाए
मेरा ह्रदय तो घायल है
आँखें भर भर कर गुरु बोले
भारत माँ पड़ी बेड़ियों में
है कौन जो उसका उद्धार करे
मैं तो चाहूँ यह व्रत तुमसे
ऐ दयानन्द अपना जीवन
तुम भारत माँ पर कुर्बान करो !
चल दिया दयानन्द व्रत लेकर
गुरु दक्षिणा गुरु को देकर
पाखण्ड-खण्डिनी पताका
फहराई फिर कुम्भ मेले पर
वेदों का डंका फिर उसने
बजवा दिया भारत की भू पर
सत्यार्थ प्रकाश लिखा ऋषि ने
पाखण्ड आडम्बर भ्रम तोड़ा
सदियों से फैले अनाचार का
पूरे बल से था मुँह मोड़ा
अब सत्य ज्ञान को पाना
फिर से इस जग को सहज हुआ
वेदों का रवि फिर चमक उठा
त्तम सारे जग से दूर हटा
नव प्रभात जग पर निकली
नव ज्ञान प्रकाश फिर प्रगट हुआ |
ऋषि ने भारत की नारी को
खोए अधिकार, फिर दिला दिये
दलितों दुखिया अनाथों को
मार्ग मुक्ति के दिखा दिये
जो बन्धक बन, सदियों से बैठे
उनके बन्धन सब छुड़ा दिये
पशु पक्षी कीट पतंगों को
वनस्पति पर्वत समुद्र तरंगों को
विज्ञान ज्ञान के स्त्रोतों को
विशुद्ध ज्ञान तरंगों को
इस सृष्टि पर फैली सारी
विद्या और अविद्या को
सब भ्रम-अज्ञान से रहित किया
मानव को मानव बनने को
वेदों की राह पर चला दिया |
ऐसा ऋषि दयानन्द ! हमें
वेदों की दीपावली जला
अन्धेरी काली रातों को
जगमग जगमग कर चला गया ||
बोलो ऋषिवर दयानन्द की जय !
जय दयानन्द ! जय दयानन्द !
चहुँ दिश ऋषिवर की जय बोलो !!