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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

दीपावली का पावन सन्देश

शुभ दीपावली

मानव सृष्टि के आदि काल में ही भारतीय मनीषियों ने चार पर्वों की कल्पना की । इन पर्वों का मानव जीवन में मनोरंजक बनाने के साथ - साथ उसमें उत्साह भरने एवं भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण स्थान है ।

वर्षा ऋतु के पश्चात दीपावली का पावन पर्व आता है । वर्षा के कारण पुराने युग में आवागमन अवरुद्ध हो जाता था । इसीलिए व्यापारी वर्ग भी , जो जहाँ रहता था वही रुक जाता था । एक जगह से दूसरी जगह माल भेजना कठिन हो जाता था ।

वर्षा ऋतु के बाद व्यापार की सुविधा होने के कारण व्यापारी अपना कारोबार नये सिरे से आरम्भ करते है । अतः व्यापार आरम्भ करने की बेला स्वयं ही उत्सव की बेला बन जाती है ।

किसान भी वर्षा ऋतु में बैठे रहते है । वर्षा के बाद फसल कटाने का समय आता है । फसल निकलेगी , किसान की खेती से किसान का घर भंडार भर जाएगा । अतः यह समय अवश्य ही उत्सव की बेला है ।

इन्हीं बातों पर विचार करके भारतीय मनीषियों ने कार्तिक महीने की अमावास को दीपावली मनाए जाने का विधान किया है ।

दीपावली से पहले घर -द्वार की सफाई - पुताई - लिपाई कर ली जाती है । दीपावली की रात घर को दीप मालाओं से सजाया जाता है । ईश्वर की स्तुति , प्रार्थना , उपासना सहित हवन यज्ञ किया जाता है । धन कमाने सम्बन्धी वेद मंत्रों से आहुतियाँ डाली जाती है । मिष्ठान्न खिलाए और खाए जाते है । आतिशबाजी होती है ।

चारों और हंसी - खुशी - आमोद - विनोद का वातावरण बन जाता है ।

आधुनिक युग में दीपावली पर्व के साथ एक ऐतिहासिक घटना भी जुड़ गई है । धार्मिक क्षेत्र में क्रांति लानेवाले , भारतीय समुदाय के चहुँ मुखी उन्नति का पथ प्रशस्त करने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसी दिन सायं काल छः बजे स्वेच्छा से शरीर त्याग किया था ।

दीपावली का यह पावन पर्व हमारे जीवन में सार्थक और शुभ धन की प्राप्ति के लिए प्रेरक बने ---

महर्षि दयानंद की तरह हमें भी देश - धर्म और जाती के उत्थान के कार्य करने के लिए प्रेरक बने ---

इसी शुभ कामना के साथ ---
चिंतामणि वर्मा
मांडले
कार्तिक अमावस्या २०६६
१७ . १० . २००९